विकल्प
कुछ नहीं होता
जब होते हो
जीवन संग्राम में
तब करना होता है
सिर्फ परिश्रम
अति से अति तक
सामर्थ्य के परे जाकर
रखकर सत्य का ध्यान
की जुडी है
अभिलाषाएं
आकांक्षाएं
मनौतियाँ
परिवार की
तब लेना होगा स्वयं तुम्हे
अपना निर्णय
मै शायद ना रहूँ
हर बार
चलने को तुम्हारे साथ
पकड़कर तुम्हारा हाथ
किन्तु
मेरे बेटे
ध्यान रहे
सत्य का भान करना
कर्तव्य के साथ
कदाचित भी
सत्य को
तर्क के
मोहपाश में बांधना मत
क्यूंकि
कर देता है
तर्क
बेमतलब और निरर्थक
सार्थक और सात्विक सत्य को
बुध्धि के साथ
परिवार को भी याद रखना
तभी जीवन
सफल होगा
मेरे बेटे
ये मेरे जीवन का सार नहीं
अपितु सार है
जो बताया था
मुझे
मेरे पिता ने
और
शायद तुम भी समझाते हो
मेरे प्रति ऐसा
जैसा मै जनता हूँ
की मेरे पिता
मुझसे झूठ नहीं बोलेंगे ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
कुछ नहीं होता
जब होते हो
जीवन संग्राम में
तब करना होता है
सिर्फ परिश्रम
अति से अति तक
सामर्थ्य के परे जाकर
रखकर सत्य का ध्यान
की जुडी है
अभिलाषाएं
आकांक्षाएं
मनौतियाँ
परिवार की
तब लेना होगा स्वयं तुम्हे
अपना निर्णय
मै शायद ना रहूँ
हर बार
चलने को तुम्हारे साथ
पकड़कर तुम्हारा हाथ
किन्तु
मेरे बेटे
ध्यान रहे
सत्य का भान करना
कर्तव्य के साथ
कदाचित भी
सत्य को
तर्क के
मोहपाश में बांधना मत
क्यूंकि
कर देता है
तर्क
बेमतलब और निरर्थक
सार्थक और सात्विक सत्य को
बुध्धि के साथ
परिवार को भी याद रखना
तभी जीवन
सफल होगा
मेरे बेटे
ये मेरे जीवन का सार नहीं
अपितु सार है
जो बताया था
मुझे
मेरे पिता ने
और
शायद तुम भी समझाते हो
मेरे प्रति ऐसा
जैसा मै जनता हूँ
की मेरे पिता
मुझसे झूठ नहीं बोलेंगे ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''