Thursday, January 20, 2011

बस विचार है


नूतन कुछ नहीं
बस विचार है
एक अदना सा
जो बन जाता है
वट वृक्ष सा
और जोड़ने लगता है
कई पुरानी
चीजों को
और हो जाता है
आविष्कार
एक नवीन
वस्तु का

एक सूक्ष्म सा विचार
बना देता है
छोटे छोटे से
पुराने
कलपुर्जों से
एक अद्भुत सौन्दर्य

वैसे ही जैसे
ईश्वर ने
पुरानी आत्मा ,
मिटटी , जल
अग्नि , वायु
से घढ़ दिया
है तुम्हे
देकर नए विचार
और उस से भी परे
मुझे दिया हुनर
परखने का
इस विचार को
प्रेम के
सानिध्य में

समझो
ईश्वर के इस विचार का
कोई
औचित्य नहीं था
जब तक
तुमसे प्रेम का
नूतन विचार
मेरे मन में ना होता
और
रह जाता तुम्हारा सौन्दर्य
अनसुना ,, अनकहा
अगर इस तरह
एक नए विचार की
उत्पत्ति के लिए
मैंने स्वयं को
ना जलाया होता
प्रेम की अग्नि में
और ना लिखा होता
आज तुम्हे
इस तरह
खुरच खुरच कर
अपने दिल पर ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

मेरी है


सरल है सौम्य है मुझसी है मेरी है
वो सुन्दरता की मूरत है ,मेरी है

सजग है ,, सादगी में समाई है वो
विचारों का सुन्दर मंथन है ,मेरी है

अदभुत सौंदर्य की मलिका का वो
जो रूप सलोना रखती है , मेरी है

एक मनचाहा सा सपर्श है खुदा का
जो मुझे अपने मन में रखती है, मेरी है

सुलभ साधारण मधुरानी सी रंगत वाली
जो मनमंदिर की देवी है हमेशा, मेरी है

एक रूप है अनोखा मेरी आँखों में
जो ख्वाबों में रहती है मेरे , मेरी है ,, '' अजीत त्रिपाठी ''

Saturday, January 15, 2011

शब्द ,,, अर्थ ,,ज्ञान

नहीं होता
हर शब्द
एक अर्थ का मालिक
जब तक वाजिब शब्द
ना मिल जाएँ उसे
उसके जैसे

वैसे ही
जैसे
ज्ञान है अज्ञान
जब तक ना समझे कोई
ज्ञान को
ज्ञान की तरह ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी'