गर्म रोटी
तन
टूटता हुआ
हवा के झोंको से
पेट सिकुड़ता हुआ
अधिकता से भूख की
नजर एकटक
रोटी के टुकड़ों पर
जो रख आया है हरिया
बड़े साहब की थाली में
इस आस से की
आज किसी
मेज़ पर
बचेगा कुछ
और चख लेगा
की गर्म रोटी
होगी कैसी
बड़ा द्वन्द है ये
जीवन का भी
की रोज
हजारों को
सेंककर
गरमागरम रोटियां
खिलाने वाला हरिया
खुद नहीं जनता
स्वाद
मख्खन लगी
गर्म रोटी का ,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''