Thursday, March 10, 2011

गर्म रोटी

गर्म रोटी


तन
टूटता हुआ
हवा के झोंको से

पेट सिकुड़ता हुआ
अधिकता से भूख की

नजर एकटक
रोटी के टुकड़ों पर
जो रख आया है हरिया
बड़े साहब की थाली में
इस आस से की
आज किसी
मेज़ पर
बचेगा कुछ
और चख लेगा
की गर्म रोटी
होगी कैसी

बड़ा द्वन्द है ये
जीवन का भी
की रोज
हजारों को
सेंककर
गरमागरम रोटियां
खिलाने वाला हरिया
खुद नहीं जनता
स्वाद
मख्खन लगी
गर्म रोटी का ,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

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