Thursday, February 24, 2011

आज साँझ ढले


आज साँझ ढले
पलकों पर
उतरेंगे
ख्वाब तेरे
फिर मै छू लूँगा
तपते हुए
तुम्हारे अधरों को
फिर आज
ख़्वाबों में
तुम शरमाकर
सिमट जाओगी
मेरी बाहों के आगोश में
फिर आज
तुम्हारी आँखों से
मेरी आँखे बात कर लेंगी
आज फिर
दूरियां दिलों की
कुछ कम होंगी

तुम्हारे नाज नखरे
तुम्हारा रूठना
हसना मुश्कुराना
सब होगा
मेरी आँखों के अन्दर
आज सांझ ढले
जब सो जाऊँगा मै
बस दुआ करना तुम
की आज नींद आ जाये
जिस दिन से
तुम्हे
देखना चाहा है ख़्वाबों में
तब से नींद नहीं आई
सच मानो शुबह
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, अजीत त्रिपाठी ''

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