Wednesday, February 9, 2011

हंस देता था

नहीं रोऊंगा मै
आज की रात
कर लिया है किनारा मैंने
तुम्हारी
उन यादों से
उन बातों से
जो अक्सर आ जाती थी
याद मुझे
और परेशान हो जाता था मै

बल्कि आज से मै
करूँगा याद
किस तरह
मेरी उलझी हुई बातों से
तुम बिलखकर
लग जाते थे गले
और मै सुलझाते हुए तुम्हारे बाल
तुम्हे सँभालते हुए अपनी बाँहों में
तुम्हे समझाते हुए
प्यार का मतलब
तुम्हारे माथे को
हल्के से
चूमकर
हंस देता था ,,,,,,, 'अजीत त्रिपाठी ''

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