Wednesday, February 9, 2011

अर्ध विक्षिप्त


अर्ध रात्री में
अर्ध स्नान
आंशुओं से
अर्ध ज्ञान
प्रेम की परिवर्तन का
अर्ध मान
प्रेम की पराकाष्ठा का
और उस पर
अर्ध्य
अपने आराध्य को
विचारों के तांडव से
निकलती
तड़प की चिंगारियां
हसरतों की बारिश
हिज्र की रुसवाइयों से

संभालते हुए
खुद को
भिगोते हुए
लिहाफ और तकिये
सुबह के इन्तजार में
रोज सो जाता है
ये जिस्म
जिसे
आदत है
हर शुबह
करने की
अजीब हरकते
जिसे देखकर
लोग कहते हैं
कोई प्रेम मत करना
वरना हो जाओगे
इस के जैसे
प्रेम के कारन
अर्ध विक्षिप्त ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

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