कहो
क्या करोगे
जब चला जाऊँगा
ऐसे ही छोड़कर
मचलते तुम्हारे अरमानों को
पिघलते जिस्म को
तडपते होंठों को
घेरे में बाहों के
फंसे चेहरे को
और उनसे भी परे
तुम्हारे भावों और अहसासों को
चला जाऊंगा
बिना बताये
की वजह क्या
मजबूरी क्या
बस चला ही जाऊँगा
अपनी जिन्दगी से
दूर
निर्मम एकांत में
जहाँ प्रेम का भाव तो होगा
पर किसी से प्रेम नहीं
बताओ तब क्या करोगी
जान ले लुंगी तुम्हारी
................
कह दिया था हंसकर उसने
जो जान है मेरी
उस पगली को तो
पता भी नहीं
मेरी जान उसमे में
और जाने का विचार
बस छलावा है
कसने का और जोर से
उसके अहसासों
और खुशबू भरे
अंग प्रत्यंग को
अपनी बाहों में
इस बसंत फिर,.
पिछले बसंत की तरह ......... '' अजीत त्रिपाठी ''
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