द्वितीय
द्वितीय होने का भाव
तुम्हे किंचित ही भान हो शायद
की
किस तरह कचोटता रहता है
मन में
मस्तिष्क के तारों में
कैसे चुभता रहता है
ये भाव की
जीवन की विराट पारी
जिसमे
स्वयं और तुम्हारे लिए
एक ही था मै
किन्तु
वास्तविकता में
हमेशा ही द्वितीय रहा हूँ
माता पिता
जिनका अकेला था मै
पता नहीं किस खेत से
देख आए कोई ऐसा
जिसके जैसा मै बन नहीं पाया
और तुम
पता नहीं क्या चाहिए था तुम्हे
तुम्हारी नई पसंद से ज्ञात हुआ मुझे
की मै था ही नहीं कहीं
तुम्हारी खुशरंग दुनिया में
किन्तु सुनो
तुम तो सिर्फ एक थी
मेरी दुनिया के लिए
और उसमे ,
सिर्फ मै था तुम्हारे लिए
फिर क्यूँ ये द्वितीय होना
हमेशा सालता रहता है
चुभता रहता है मन में
वो कौन सा अक्स था
जो माँ बाप देखना चाहते थे मुझमे
और वो कौन सा शख्स है
जो तुम्हे मुझमे नहीं मिला
बताना जरूर
कम से कम मै
इस में
तो प्रथम रहूँ
की द्वितीय होने के बाद भी
पुनह दूँ
अपनी जिन्दगी की परीक्षा
ज्ञात कर अपनी कमजोरी
और गलतियाँ
ताकि आ सकूँ
अंतिम पड़ाव पर प्रथम
और
सो जाऊं शुकून से
अंतिम बार चिर निद्रा में
इस भाव से
की प्रथम आया हूँ मै
अंतिम प्रयास में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
द्वितीय होने का भाव
तुम्हे किंचित ही भान हो शायद
की
किस तरह कचोटता रहता है
मन में
मस्तिष्क के तारों में
कैसे चुभता रहता है
ये भाव की
जीवन की विराट पारी
जिसमे
स्वयं और तुम्हारे लिए
एक ही था मै
किन्तु
वास्तविकता में
हमेशा ही द्वितीय रहा हूँ
माता पिता
जिनका अकेला था मै
पता नहीं किस खेत से
देख आए कोई ऐसा
जिसके जैसा मै बन नहीं पाया
और तुम
पता नहीं क्या चाहिए था तुम्हे
तुम्हारी नई पसंद से ज्ञात हुआ मुझे
की मै था ही नहीं कहीं
तुम्हारी खुशरंग दुनिया में
किन्तु सुनो
तुम तो सिर्फ एक थी
मेरी दुनिया के लिए
और उसमे ,
सिर्फ मै था तुम्हारे लिए
फिर क्यूँ ये द्वितीय होना
हमेशा सालता रहता है
चुभता रहता है मन में
वो कौन सा अक्स था
जो माँ बाप देखना चाहते थे मुझमे
और वो कौन सा शख्स है
जो तुम्हे मुझमे नहीं मिला
बताना जरूर
कम से कम मै
इस में
तो प्रथम रहूँ
की द्वितीय होने के बाद भी
पुनह दूँ
अपनी जिन्दगी की परीक्षा
ज्ञात कर अपनी कमजोरी
और गलतियाँ
ताकि आ सकूँ
अंतिम पड़ाव पर प्रथम
और
सो जाऊं शुकून से
अंतिम बार चिर निद्रा में
इस भाव से
की प्रथम आया हूँ मै
अंतिम प्रयास में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
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