Monday, May 2, 2011

चल बसी है


निश्चित
वो मुस्कुराई होगी
देखकर जाते हुए
मुझको
हारकर समाज के पूर्वाग्रहों से
निभाने अपनी वो जिम्मेदारियां
जिन्हें मै निभा लेता
उसके साथ भी
पूरी शिद्दत से ,, दिल लगाकर

बस
जाने क्यूँ तब डर गया था
की कहीं समाज में रहना
दूभर ना हो जाए
बहनों को ब्याह लूँगा की नहीं
माँ मंदिर फिर जा पायेगी की नहीं
पिता का सर ऊंचा रहेगा की नहीं

ये रुतबा रहेगा की नहीं
ये हसियत कहीं गिरेगी तो नहीं

पता नहीं किन खोखले आदर्शों पर
बलिदान कर दी मैंने
अपनी खुशियाँ
और तुम्हारा जीवन

फिर भी दुःख इस बात का नहीं
की इन सबके लिए तुमसे दूर हुआ
अचरज तो इसका है
की
इन्ही बातों में आकर
बस गया किसी और के साथ

हे मेरे भगवान् मुझे माफ़ कर

मुझे पता है
मेरे हर काम पर खुश होने वाली
मेरे गृहस्ती बसते देख
ख़ुशी से
चल बसी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, '' अजीत त्रिपाठी ''

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