Monday, May 2, 2011

महिला ससक्तिकरण


क्यूँ
आखिर क्यूँ नहीं समझता
तुम्हारा लाडला

पिता दहक रहा था
बेचारी माँ पर
जिसका बेटा
किसी से प्यार करता था

आखिर क्यूँ
समझाती नहीं
की रुतबा है गली में मेरा
लोग झुक कर सलाम करते हैं
पंडित ही पंडित जी का गुणगान करते हैं

आखिर क्यूँ
नहीं समझता ये
की नीच जात की
छोरी अगर ले आया ये
तो कौन थमेगा
मेरी जवान बेटी का हाथ
कैसे मुह दिखाऊंगा मै
भरे समाज में

आखिर क्यूँ नहीं है
मेरे अपने खून को
मेरी इज्ज़त का ख़याल
प्यार करने की हिमाकत कैसे की इसने

अगर ये जिद पे अड़ा रहा तो
मौत ही है अंतिम उपचार मेरे पास
क्या चाहता है ये ,,
की मर जाऊं मै
अपनी नाक कटवाने के बाद ,

नहीं पिता जी,,
मुझे माफ़ करो

जैसे आप कहोगे वैसा ही करूँगा,,,

फिर सामजिक बन्धनों में फंस गया है कोइ

अरे समाज के ठेकेदारों
जो कहते रहते हो
की पुरुषों का समाज है ये
नारी की भी स्वतंत्रता चाहिए हैं

देख लो ,,
पुरुषों के समाज में
पुरूष ही आज़ाद नहीं
पुरूष ही सशक्त नहीं
और आप बात करते हो
महिला ससक्तिकरण की ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी'


एक छोटा सा चलचित्र देखने के बाद,,,,,,,,,,,,,,,,, इसे लिखा है तो पूर्णरूपें वही है ये ,

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