Sunday, May 29, 2011
मिल जाती थी जिन्दगी
कल शुबह
मिलेंगे शायद
वहीँ
अक्सर जहाँ
मिल जाती थी
जिन्दगी मुझे
तेरी आँखों से बहती हुई
चंचलता में
मिलता था शुकून जहाँ
तुम्हारी बाहों में
और कुछ दर्द
सीने में ,,
की शुबह
बीत जाएगी
और चले जाओगे ,,,
कल मिलोगे
तो शायद
मिल जायेगी
फिर जिन्दगी
जब
भर लूँगा तुम्हे
बाहों में
या
चूम लूँगा गाल पर
या
सो जाऊँगा
रखकर गोद में सर
या
कह दूंगा दिल की बात तुमसे
समझ नहीं आता
की बन क्या से क्या गए
हर लफ्ज ,, हर पल ,, हर सांस
जिन्दगी
तुम ही शामिल हो ,,
तो ऐसा करना
की मत ढकना
हाथों से अपना चेहरा
भले ही शरमा जाओ
बस देखने देना
मुझे
खुद को जिन्दगी
ताकि देख सकूँ
तुम्हारे चेहरे पर
की कितनी हसीं लगती है
जिन्दगी
जब चाँद से चेहरे में
छुपी बैठी रहती है ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
शुबह तुम्हारे लिए,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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