निशब्द
नितांत एकांत में
मन बावरा
झुलस उठता है
करता है
चीत्कार
व्याकुल होकर
खोकर पुरानी बातों में
याद कर
वो निर्मम रातें
वो भीगी आँखें
वो संतप्त मन
वो पिपासित
तप्त तन
वो भाव
नैराश्य का
छेड़ देता है
राग
की
कुछ हासिल नहीं
सिवाए
अजनबी यादों के
जिनका हिस्सा बस हूँ मै
अजब द्वन्द है
की सिर्फ हिस्सा हूँ
उन यादों का
जिनकी
बुनियाद मै हूँ ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
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