लौट आया हूँ
एक अरसे बाद
उसी मकान में
जहाँ तुमने कह दिया था
की अब बस
बहुत हुआ
नहीं होगा
वैसा जैसा
चाहते हो तुम
और मै नादान
मान बैठा तुम्हारी
ये बात भी
की नहीं मिलोगी
तुम्हे मनाने का
अंतिम प्रयास भी
ना हुआ मुझसे
बस चला गया
और चलता रहा एक अरसे तक
और आज आया हूँ तो
सदी से सूनी पड़ी
दीवारें चीखने लगी हैं
मन आहत हुआ जा रहा है
इतने चीत्कार
कब मैंने छोड़े यहाँ
जो मुझे इस तरह से चिड़ा रहे हैं
की अचानक
सड़े दरवाजे से
झाँक उठा एक ख़त
जाने किसने भेजा होगा
दरवाजा खोलने को हुआ
की
समूचा गिर पड़ा
खवाबों के आशियाने सा
जाने कितने और ख़त थे
तुम्हारी खुशबू से भरे हुए
पड़े हुए सूने आँगन में
जहाँ बरसों तक
कोई आया ही ना था
बूढा डाकिया डाल जाता था
हर रोज तुम्हारा ख़त
जिसमे होता था
मान मनुहार
की लौट आऊं मै
तुम्हारी बाहों में
खेलने को तुम्हारे बालों से
भरने को तुम्हारा दामन
खुशियों से
और मै तो
वहां था ही नहीं
अचानक ही आँख भर उठी है
देखो
तुमने ही किया था मुझे
ऐसा
की तुम्हारी हर बात मान जाया करता था
उस अंतिम बार में
तुमने ही तो कहा था
की अब और नहीं तुम्हारा साथ
फिर क्या करता मै
उस जगह ,, जहाँ होकर ,,
तुम मेरी नहीं हो सकती
इस से अच्छा तो एकांत ही है
सुनो
अगर तुम्हे मान ही जाना था
तो
कर देती बस एक इशारा
उसी दिन
जब बड़ी देर तक रोते हुए
निकला था मै
इस जगह से
जहाँ मै आज खड़ा हूँ
रोते हुए
तुम्हारे उन खतों के साथ
जो आज
मेरे पास होकर भी
लग रहे हैं
की
ये मुझ तक पहुंचे ही नहीं
जैसे नहीं पहुंचा
तुम्हारा प्रेम मुझ तक
मेरा होते हुए भी ,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी '''
Wednesday, July 6, 2011
Tuesday, July 5, 2011
नव श्रृष्टि
अन्धकार
निरंतर नहीं है
वस्तुतः है ये
सिर्फ एक बिम्ब
जो बन गया है
रौशनी के
पलक में छुपते ही
हटना ही इसका
एकमात्र विकल्प है
बस करना है
तुम्हे स्वयं पर विश्वास
की हर स्वाश के साथ
ये अन्धकार कम होगा
अन्यथा
तुम्हारी साँसों की गर्मी
जलाकर इसे
दिव्य ज्योति सी बनेगी
बस रखना है तुम्हे विस्वास
की
तुम्हारी सामर्थ्य
तुम्हारा मनोबल
तुम्हारा पुरुषार्थ
तुम्हारा ध्यान
सर्वेष्ठ को पाने का
सर्वोत्तम साध्य है
बस इसी धेय से
आगे बढ़ मानव
नव श्रृष्टि
उजालों के सागर के साथ
इन्तजार में खड़ी है '' अजीत त्रिपाठी ''
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