नव श्रृष्टि
अन्धकारनिरंतर नहीं हैवस्तुतः है येसिर्फ एक बिम्बजो बन गया हैरौशनी केपलक में छुपते हीहटना ही इसकाएकमात्र विकल्प हैबस करना हैतुम्हे स्वयं पर विश्वासकी हर स्वाश के साथये अन्धकार कम होगाअन्यथातुम्हारी साँसों की गर्मीजलाकर इसेदिव्य ज्योति सी बनेगीबस रखना है तुम्हे विस्वासकीतुम्हारी सामर्थ्यतुम्हारा मनोबलतुम्हारा पुरुषार्थतुम्हारा ध्यानसर्वेष्ठ को पाने कासर्वोत्तम साध्य हैबस इसी धेय सेआगे बढ़ मानवनव श्रृष्टिउजालों के सागर के साथइन्तजार में खड़ी है '' अजीत त्रिपाठी ''
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