Tuesday, July 5, 2011

नव श्रृष्टि



अन्धकार
निरंतर नहीं है
वस्तुतः है ये
सिर्फ एक बिम्ब
जो बन गया है
रौशनी के
पलक में छुपते ही
हटना ही इसका
एकमात्र विकल्प है
बस करना है
तुम्हे स्वयं पर विश्वास
की हर स्वाश के साथ
ये अन्धकार कम होगा
अन्यथा
तुम्हारी साँसों की गर्मी
जलाकर इसे
दिव्य ज्योति सी बनेगी

बस रखना है तुम्हे विस्वास
की
तुम्हारी सामर्थ्य
तुम्हारा मनोबल
तुम्हारा पुरुषार्थ
तुम्हारा ध्यान
सर्वेष्ठ को पाने का
सर्वोत्तम साध्य है

बस इसी धेय से
आगे बढ़ मानव
नव श्रृष्टि
उजालों के सागर के साथ
इन्तजार में खड़ी है '' अजीत त्रिपाठी ''

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