Friday, August 12, 2011

कल शाम से ही


कल शाम से ही
झगड़ रही हो
की क्या सोचता रहता हूँ
तुम्हारे सिवा
ऐसे ही
अकेले मैं बैठकर
और मै थक गया हूँ
बताते बताते
की कुछ नहीं
तुम्हारे सिवा
समझा करो
और क्या है
जिसे सीने से लगाकर
ख़ुशी की तरह
दर्द में भी हंसने की वजह जैसा
समझ सकूँ मै
तुम्हारे सिवा

देखो
सुन लो
जो लड़ रही हो ना इस तरह शाम से ही
तो कल रात
ख्वाब में भी नहीं आई तुम
वजह तुम ही हो
,,
मैंने तो देखा है
अपने अंतर्मन में
हमेशा
तुम्हे ही
मुस्कुराते हुए
तो
तुम ही बताओ
कैसे आओगी
मेरे ख़्वाबों में
जबकि तुम
कल शाम से ही
झगड़ रही हो ,,,,,,, '' अजीत त्रिपाठी ''

Tuesday, August 9, 2011

मै अजीत त्रिपाठी



कर्म विहीन ,,
कर्तव्य विहीन
नितांत एकांत में
ढूँढता हूँ
प्रतिउत्तर
एक अवांछित प्रश्न का
की कौन हूँ मै

जबकि पढ़ लिए वेड और पुराण
गीता और कुरआन भी
सभी ने बताया भी है
की ''मै'' कुछ नहीं
एक भ्रम मात्र है
होने का
यहाँ तो चराचर में
सभी हैं प्रायोजित
उस परमसत्ता से
किसी एक
सार्थक कर्म के लिए
किन्तु इस बात से भी
संतुष्ट नहीं हूँ
मै ''अजीत त्रिपाठी

ढूँढता हूँ
उत्तर
की प्रयोजन क्या है
मेरे होने का
और हर बार
हार जाता हूँ
उस परम सत्ता से
जो अनकहे ही
सुना जाती है
की '' मै '' को ढूँढना
मेरा प्रयोजन नहीं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''