मै अजीत त्रिपाठी
कर्म विहीन ,,
कर्तव्य विहीन
नितांत एकांत में
ढूँढता हूँ
प्रतिउत्तर
एक अवांछित प्रश्न का
की कौन हूँ मै
जबकि पढ़ लिए वेड और पुराण
गीता और कुरआन भी
सभी ने बताया भी है
की ''मै'' कुछ नहीं
एक भ्रम मात्र है
होने का
यहाँ तो चराचर में
सभी हैं प्रायोजित
उस परमसत्ता से
किसी एक
सार्थक कर्म के लिए
किन्तु इस बात से भी
संतुष्ट नहीं हूँ
मै ''अजीत त्रिपाठी
ढूँढता हूँ
उत्तर
की प्रयोजन क्या है
मेरे होने का
और हर बार
हार जाता हूँ
उस परम सत्ता से
जो अनकहे ही
सुना जाती है
की '' मै '' को ढूँढना
मेरा प्रयोजन नहीं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
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