Saturday, March 3, 2012
विभाजित
समुन्दर की गीली रेत सी तुम
आ जाती हो
सम्पूर्ण मेरी बांह में
फिर सूख जाती है
धीरे धीरे
तुम्हारे प्रेम की नमी
तुम होना चाहती हो दूर
मेरा होने के भाव से
फिर सूखकर फिसलने लगती हो
मेरी बाहों से
मै ताकता रहता हूँ
रोकता हूँ
पर नहीं संभलती तुम
बस चली जाती हो
कहीं और ,,
किसी और से मिलने .
क्यूँ ,,,
बताओ
क्यूँ,,
सूख गई
तुम्हारे प्रेम की नमी
क्यूँ,,,,,,,,
मै तनहा रह गया
क्या इसीलिए रहती थी
तुम मेरी बाहं में तुम
की फिसल जाओ
किसी दिन
किसी और के लिए
और कह दो सख्त अंदाज में
की ''अजीत''
तुम्हारे नसीब में नहीं मै
जाओ , विरक्त ही रहो दुनिया में
मै बस तुम्हारी नहीं ,,
तो शुबह ''
बताओ
जब यही होना था
हमारे रिश्ते का ..
तो अब तक रिश्ता
निभाया क्यूँ था
मेरी हुई क्यूँ थी
मुझे अपना बनाया क्यूँ था
क्यूँ हमारे नाम जोड़कर
आज मुझे
विभाजित कर दिया
बताओ शुबह''
बस बता दो मुझे,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
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