Monday, October 4, 2010

मौन स्वीकृति


बहुत हुआ
ये प्रणय निवेदन
और ये करुण रुदन
तुम्हारी बेरुखी पर

यूँ मौन रहकर
स्वीकृति का भाव भी
तब दिखे
जब रूह के और पास
आ जाऊं मै
या तुम लग जाओ
छतनार सी
मेरे सीने पर
और आ जाओ
मेरी रूह के करीब

शायद तब दिख जाएँ
भाव अनकहे से
लिपटे हुए
तुम्हारे बालों से
या सिमटते हुए
तुम्हारे अहसासों से
मेरे सीने में

शायद तुम्हारी
बंद होती आँखों से
या शायद
तुम्हारी डबडबाई
भरी आँखों से
कोई मोती गिरे
और कह जाए
की लज्जा है तुम में
तुम मुझ सा
यूँ सर-ऐ-महफ़िल
नहीं पकड़ सकते
हाथ मेरा

तब शायद मै समझ जाऊं
और ढूंड लाऊं
एकांत हमारे लिए
जहाँ तुम
और सिर्फ तुम रहो
नितांत अकेले
और समझ जाओ तुम

की तुम्हारे
मौन के आगे
कितना निरीह
निसहाय
और अकेला हूँ मैं
और कितना जरूरी है
यूँ
एक मौन स्वीकृति के लिए
निश्वास
भाव सहित
स्वीकृति का चिन्ह

जो हो
बिलकुल मौन
और मिले
शायद तुम्हारे बालों से
आँखों से
आलिंगन से
मौन रहकर
मौन कर के मुझे

मेरे प्रणय निवेदन की
मेरे जीवन के लिए
तुम्हारे प्रेम की
तुम्हारे साथ की
मौन स्वीकृति ............ ''अजीत त्रिपाठी''

Sunday, October 3, 2010

निर्मम निर्वात


खामोश आँखें
बेचैन दिल ,, धड़कन रुकी हुई

एक उलझन , एक कशमकश
खुद को तलाशने की खुद में
तनहा वजूद को यादों में लपेटे

बाँहों से गिरती आरजू की लकीर
और इनसे बनता
स्वयं में स्वयं सा
स्वा निर्मित , सहृदयी
शोक संतप्त जीवन का
जीवन को जीने का तुम्हारे बिना
साँसों के बीच का
निर्मम निर्वात ,,... ''अजीत त्रिपाठी

Saturday, October 2, 2010

मै चुप हो जाता हूँ

क्या जरूरी है
हर वक़्त इजहार करना
जुबान से
जबकि आँखे
बोलती ही रहती हैं

वो हर बात
जो मै कहना चाहता हूँ
पर कह नहीं पाता
की कहीं
उमंग में कुछ गलत ना कह जाऊं
तुम्हारे आँखों को
सागर कहते कहते
कह ना दू
कहीं मधुशाला
या तुम्हारे होंठो के बोलों को
उनकी छुवन को
कह दूँ प्याला

तुम्हारे गेसुओं को
कह ना दूँ कभी
अपने प्रेम पाश से इतर
एक बंधन खुद का
तुम्हे भाहों में भरने के
मोहक अंदाज को
सिर्फ जिस्मानी ना कह दूँ
तुम्हारे नाज को नखरे को
कहीं कोई बोझ ना कह दूँ
तुम्हारी हंसी
और होंठों के बीच जुड़ते से तिल को
कहीं अपनी बेचारगी का सबब ना कह दूँ

कहीं कुछ ऐसा ना कह जाऊं
मिलन की बेला को
की नाराज हो जाओ तुम

सुनो
मनाना नहीं आता मुझे
पहली बार
प्यार हुआ है ना
बस इसलिए चुप रहता हूँ
और कुछ कहने से पहले ही
चूम लेता हूँ
की शायद मिल जाए
जवाब तुम्हे
मेरी खामोशी से ही
मेरी बोलती आँखों से
तुम समझ जाओ
की क्या है मुझमे
जो तुम्हे चाहता है
और क्या है तुममे
जो बांधे रखता है मुझे
तुम में

तुम उन्मुक्त यौवन
की सूरा सरिता
क्यूँ मै डूबा रहता हूँ
तुम्हारे ही खयालात में
शायद तुम समझ जाओ
शायद समझोगी
इसलिए सब कहता हूँ मै
आँखों से
और होंठों को सी लेता हूँ
तुम्हारे होंठो से
और
चुप हो जाता हूँ

शायद
सारे अरमान निकालकर
सारे अहसास लिखकर
तुम्हारे होंठों पर
मै चुप हो जाता हूँ ..................... ''अजीत त्रिपाठी ''

Friday, October 1, 2010

मुझे मनाने आओगे ना


अनजाने से दर्द की प्यास बुझाओगे ना
मेरे सिरहाने मुझे मनाने आओगे ना

एक बाल-सुलभ है दिल मेरा
तुम बिन रिक्त है दिल मेरा
एक प्रेम कुटी बनवाओगे
तुम मुझसे मिलने आओगे ना

मै प्रेम पथिक परवाज रहूँ
तुम सरल सौम्य आगाज़ रहो
तुम सुरा बनो जब यौवन की
तुम मेरे दिल में छाओगे ना

तुम बनना मेरी परम मित्र
तुम मेरा आधा रूप रहो
जब कोमल प्रेम गुलाब बनो
तुम मेरा दिल महकाओगे ना

तुम जीवन दर्शन बन जाना
तुम मेरा जीवन बन जाना
तुम रहना दुर्लभ दुनिया को.. पर
तुम मेरा दिल महकाओगे ना

जब तनहा रहूँगा मै प्रियतम
तुम मुझे गले से लगाओगे ना ,, ''अजीत त्रिपाठी''

मुझे मनाने आओगे ना


अनजाने से दर्द की प्यास बुझाओगे ना
मेरे सिरहाने मुझे मनाने आओगे ना

एक बाल-सुलभ है दिल मेरा
तुम बिन रिक्त है दिल मेरा
एक प्रेम कुटी बनवाओगे
तुम मुझसे मिलने आओगे ना

मै प्रेम पथिक परवाज रहूँ
तुम सरल सौम्य आगाज़ रहो
तुम सुरा बनो जब यौवन की
तुम मेरे दिल में छाओगे ना

तुम बनना मेरी परम मित्र
तुम मेरा आधा रूप रहो
जब कोमल प्रेम गुलाब बनो
तुम मेरा दिल महकाओगे ना

तुम जीवन दर्शन बन जाना
तुम मेरा जीवन बन जाना
तुम रहना दुर्लभ दुनिया को.. पर
तुम मेरा दिल महकाओगे ना

जब तनहा रहूँगा मै प्रियतम
तुम मुझे गले से लगाओगे ना ,, ''अजीत त्रिपाठी''