Saturday, October 2, 2010

मै चुप हो जाता हूँ

क्या जरूरी है
हर वक़्त इजहार करना
जुबान से
जबकि आँखे
बोलती ही रहती हैं

वो हर बात
जो मै कहना चाहता हूँ
पर कह नहीं पाता
की कहीं
उमंग में कुछ गलत ना कह जाऊं
तुम्हारे आँखों को
सागर कहते कहते
कह ना दू
कहीं मधुशाला
या तुम्हारे होंठो के बोलों को
उनकी छुवन को
कह दूँ प्याला

तुम्हारे गेसुओं को
कह ना दूँ कभी
अपने प्रेम पाश से इतर
एक बंधन खुद का
तुम्हे भाहों में भरने के
मोहक अंदाज को
सिर्फ जिस्मानी ना कह दूँ
तुम्हारे नाज को नखरे को
कहीं कोई बोझ ना कह दूँ
तुम्हारी हंसी
और होंठों के बीच जुड़ते से तिल को
कहीं अपनी बेचारगी का सबब ना कह दूँ

कहीं कुछ ऐसा ना कह जाऊं
मिलन की बेला को
की नाराज हो जाओ तुम

सुनो
मनाना नहीं आता मुझे
पहली बार
प्यार हुआ है ना
बस इसलिए चुप रहता हूँ
और कुछ कहने से पहले ही
चूम लेता हूँ
की शायद मिल जाए
जवाब तुम्हे
मेरी खामोशी से ही
मेरी बोलती आँखों से
तुम समझ जाओ
की क्या है मुझमे
जो तुम्हे चाहता है
और क्या है तुममे
जो बांधे रखता है मुझे
तुम में

तुम उन्मुक्त यौवन
की सूरा सरिता
क्यूँ मै डूबा रहता हूँ
तुम्हारे ही खयालात में
शायद तुम समझ जाओ
शायद समझोगी
इसलिए सब कहता हूँ मै
आँखों से
और होंठों को सी लेता हूँ
तुम्हारे होंठो से
और
चुप हो जाता हूँ

शायद
सारे अरमान निकालकर
सारे अहसास लिखकर
तुम्हारे होंठों पर
मै चुप हो जाता हूँ ..................... ''अजीत त्रिपाठी ''

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