Wednesday, April 14, 2010

कविता की तरह


कविता की तलाश में
हर शुबह उठता हूँ मै
एक कविता जिसमे तुम हो
जो सिर्फ तुम्हारी हो
तुम्हारे चलने से लेकर
तुम्हारे रुकने तक
सब कुछ कविता मय हो

कविता के आधार से लेकर भाव तक
बस तुम्हारी बात हो

और रहो तुम मेरी कविता बनकर
मेरे तकिये की नीचे पन्नो पर
या रहो कविता बनकर
लिपटी ,, छतनार सी
मेरे सीने पर

पर सुनो अगर ना बन सको मेरी तो
उसकी ही बनना
जो तुम्हारी आँख को संदल कहे
जो तुम्हारी जुल्फ को दुनिया कहे
जो तुम्हारी अंगड़ाई को ताज कहे
जो तुम्हारी बाहों को
दुनिया का आगाज़ कहे

सुनो तुम रहो किसी की भी
पर कविता बनकर ही रहना
कविता होना तुम्हारा दायित्व है

चाहे मेरे सफल प्रेम के वर्णन से
या मेरे किंचित भाग्य की कल्पना से
बस तुम्हे कविता ही होना है

ताकि दुनिया जानती रहे
की ''अजीत'' की भी एक कविता है
चाहे लिखी हुई हो मेरी
या तस्वीर में दिखे
मेरी बाँहों में
सिमटी हुई,,

कविता की तरह ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

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