धुन्धलकी यादों से
उनकी परछाइयों से
अभी जागकर देखा है मैंने ,,
आँखे सुर्ख लाल थी मेरी
दिल जार जार कर जल रहा था मेरा
तुम्हारे ना होने से
मादकता तुम्हारे होने की
झलक रही थी अब भी
मेरी आँखों से
तुम्हारे प्रेम की ऊष्मा
भटक रही है
अब भी मेरी आँखों में
टपकते हुए मेरे आंसुओं से
बीते हुए लम्हों में
तुम्हे भरने को अपनी बाहों
के अहसास
अभी भी तडपा जाते हैं मुझको
तो आज सुबह
उठकर ही
मैंने जलाई है
अपने ख्वाबों की चिता
और उसमे रख दिए हैं
तुम्हारी याद के कुछ ख़त
जो जल जाएँ
और कोई आखिरी निशानी भी
याद ना रहे मुझको
जिस से मैं जलता रहूँ
रात भर
तकिये के आगोश में .........
तुम्हारी याद में ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
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