क्या जरूरी है
हर वक़्त इजहार करना
जुबान से
जबकि आँखे
बोलती ही रहती हैं
वो हर बात
जो मै कहना चाहता हूँ
पर कह नहीं पाता
की कहीं
उमंग में कुछ गलत ना कह जाऊं
तुम्हारे आँखों को
सागर कहते कहते
कह ना दू
कहीं मधुशाला
या तुम्हारे होंठो के बोलों को
उनकी छुवन को
कह दूँ प्याला
तुम्हारे गेसुओं को
कह ना दूँ कभी
अपने प्रेम पाश से इतर
एक बंधन खुद का
तुम्हे भाहों में भरने के
मोहक अंदाज को
सिर्फ जिस्मानी ना कह दूँ
तुम्हारे नाज को नखरे को
कहीं कोई बोझ ना कह दूँ
तुम्हारी हंसी
और होंठों के बीच जुड़ते से तिल को
कहीं अपनी बेचारगी का सबब ना कह दूँ
कहीं कुछ ऐसा ना कह जाऊं
मिलन की बेला को
की नाराज हो जाओ तुम
सुनो
मनाना नहीं आता मुझे
पहली बार
प्यार हुआ है ना
बस इसलिए चुप रहता हूँ
और कुछ कहने से पहले ही
चूम लेता हूँ
की शायद मिल जाए
जवाब तुम्हे
मेरी खामोशी से ही
मेरी बोलती आँखों से
तुम समझ जाओ
की क्या है मुझमे
जो तुम्हे चाहता है
और क्या है तुममे
जो बांधे रखता है मुझे
तुम में
तुम उन्मुक्त यौवन
की सूरा सरिता
क्यूँ मै डूबा रहता हूँ
तुम्हारे ही खयालात में
शायद तुम समझ जाओ
शायद समझोगी
इसलिए सब कहता हूँ मै
आँखों से
और होंठों को सी लेता हूँ
तुम्हारे होंठो से
और
चुप हो जाता हूँ
शायद
सारे अरमान निकालकर
सारे अहसास लिखकर
तुम्हारे होंठों पर
मै चुप हो जाता हूँ ..................... ''अजीत त्रिपाठी ''
हर वक़्त इजहार करना
जुबान से
जबकि आँखे
बोलती ही रहती हैं
वो हर बात
जो मै कहना चाहता हूँ
पर कह नहीं पाता
की कहीं
उमंग में कुछ गलत ना कह जाऊं
तुम्हारे आँखों को
सागर कहते कहते
कह ना दू
कहीं मधुशाला
या तुम्हारे होंठो के बोलों को
उनकी छुवन को
कह दूँ प्याला
तुम्हारे गेसुओं को
कह ना दूँ कभी
अपने प्रेम पाश से इतर
एक बंधन खुद का
तुम्हे भाहों में भरने के
मोहक अंदाज को
सिर्फ जिस्मानी ना कह दूँ
तुम्हारे नाज को नखरे को
कहीं कोई बोझ ना कह दूँ
तुम्हारी हंसी
और होंठों के बीच जुड़ते से तिल को
कहीं अपनी बेचारगी का सबब ना कह दूँ
कहीं कुछ ऐसा ना कह जाऊं
मिलन की बेला को
की नाराज हो जाओ तुम
सुनो
मनाना नहीं आता मुझे
पहली बार
प्यार हुआ है ना
बस इसलिए चुप रहता हूँ
और कुछ कहने से पहले ही
चूम लेता हूँ
की शायद मिल जाए
जवाब तुम्हे
मेरी खामोशी से ही
मेरी बोलती आँखों से
तुम समझ जाओ
की क्या है मुझमे
जो तुम्हे चाहता है
और क्या है तुममे
जो बांधे रखता है मुझे
तुम में
तुम उन्मुक्त यौवन
की सूरा सरिता
क्यूँ मै डूबा रहता हूँ
तुम्हारे ही खयालात में
शायद तुम समझ जाओ
शायद समझोगी
इसलिए सब कहता हूँ मै
आँखों से
और होंठों को सी लेता हूँ
तुम्हारे होंठो से
और
चुप हो जाता हूँ
शायद
सारे अरमान निकालकर
सारे अहसास लिखकर
तुम्हारे होंठों पर
मै चुप हो जाता हूँ ..................... ''अजीत त्रिपाठी ''
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