तुम नादान हो शायद
या मै समझने लगा हूँ
स्वयं को
स्वयं से विस्तृत
विस्तृत
ऐसी मनोस्थिति
जहाँ आकर
ज्ञान नहीं होता
की प्रेम क्या
व्याकुलता क्या
और क्या है
व्याकुलता
अक्सर तुम समझ लेती हो
आलिंगन बध्ध होकर
की यही इति है प्रेम की
या
यही है
मेरी कामुक
पिपासा जो शांत हो जाती है
तुम्हे भरकर
अंजुलियों में
और होकर करबध्ध
तुम्हारे अनुपम सौन्दर्य के लिए
किन्तु रुको
वो आलिंगन बध्ध
प्रणाम की मुद्रा
तुम्हारे यौवन को नहीं
अपितु है
ईश्वर को धन्यवाद
उसकी इस अनुपम कृति के लिए
जिसकी आँखों में मैंने देखा था
अपने लिए
प्रेम अपनत्व और वात्सल्य
जीवन के विविध रूप
एक अंश में समेटे हुए
और तब से ही प्रयत्न शील
हूँ मै
फिर देखने के लिए वही भाव
एक प्यास सा है ये मुझमे
कामुकता से परे
व्याकुलता बनकर
किन्तु
तुमने खो दिया है
मुझे पाकर
अपना वो अद्भुत सौन्दर्य
जो जिस्म के अन्दर था
जिसके लिए लालायित था मै
जिसकी छुवन तक पहुँचाना
जीवन का मर्म था
प्रेम जिस से था मुझे
अब तुम आलिंगन बध्ध होकर
इति कर लेती हो
अपने प्रेम प्रदर्शन की
सच मानो
मैंने जिया है तुम्हे
मेरी पिपासा ,,
कामुकता नहीं
अपितु है
एक व्याकुलता
इस उम्र में आकर
पाना और देखना
वही वात्सल्य
वही अपनापन
वही प्रेम
जो खो दिया है
तुमने
एक उम्र गुजारकर
मेरी बाहों में
इस निश्चिंतता में
की
नहीं जाऊँगा मै तुमसे परे
किन्तु याद रखो
मोक्ष और संतुष्टि
व्याकुलता के संतुष्ट होने में ही है
अब तुम पर है प्रिये
मैंने कह दिया है
या तो
प्रेम को कामुकता से अलग कर
प्रदर्शित करो
नयनो से वही भाव
या भेज दो मुझे
वैराग्य में
ढूँढने अपनी व्याकुलता
और उसका समाधान
एक बार अलग होकर
करने दो फिर मुझे प्रयत्न
तुम्हे पाने का
उसी रूप में
जिसमे पा लिया था मैंने
अपने लिए
साथी का अपनापन
उन्मुक्त और अनंत प्रेम साथी का
और अंतिम
किन्तु स्थायी वात्सल्य
और ममत्व ,,
जिससे शांत हो एक बार
मेरी व्याकुलता ,,
''''''''''''''''''''''''''''' ;;अजीत त्रिपाठी '';;;;;;;;;
या मै समझने लगा हूँ
स्वयं को
स्वयं से विस्तृत
विस्तृत
ऐसी मनोस्थिति
जहाँ आकर
ज्ञान नहीं होता
की प्रेम क्या
व्याकुलता क्या
और क्या है
व्याकुलता
अक्सर तुम समझ लेती हो
आलिंगन बध्ध होकर
की यही इति है प्रेम की
या
यही है
मेरी कामुक
पिपासा जो शांत हो जाती है
तुम्हे भरकर
अंजुलियों में
और होकर करबध्ध
तुम्हारे अनुपम सौन्दर्य के लिए
किन्तु रुको
वो आलिंगन बध्ध
प्रणाम की मुद्रा
तुम्हारे यौवन को नहीं
अपितु है
ईश्वर को धन्यवाद
उसकी इस अनुपम कृति के लिए
जिसकी आँखों में मैंने देखा था
अपने लिए
प्रेम अपनत्व और वात्सल्य
जीवन के विविध रूप
एक अंश में समेटे हुए
और तब से ही प्रयत्न शील
हूँ मै
फिर देखने के लिए वही भाव
एक प्यास सा है ये मुझमे
कामुकता से परे
व्याकुलता बनकर
किन्तु
तुमने खो दिया है
मुझे पाकर
अपना वो अद्भुत सौन्दर्य
जो जिस्म के अन्दर था
जिसके लिए लालायित था मै
जिसकी छुवन तक पहुँचाना
जीवन का मर्म था
प्रेम जिस से था मुझे
अब तुम आलिंगन बध्ध होकर
इति कर लेती हो
अपने प्रेम प्रदर्शन की
सच मानो
मैंने जिया है तुम्हे
मेरी पिपासा ,,
कामुकता नहीं
अपितु है
एक व्याकुलता
इस उम्र में आकर
पाना और देखना
वही वात्सल्य
वही अपनापन
वही प्रेम
जो खो दिया है
तुमने
एक उम्र गुजारकर
मेरी बाहों में
इस निश्चिंतता में
की
नहीं जाऊँगा मै तुमसे परे
किन्तु याद रखो
मोक्ष और संतुष्टि
व्याकुलता के संतुष्ट होने में ही है
अब तुम पर है प्रिये
मैंने कह दिया है
या तो
प्रेम को कामुकता से अलग कर
प्रदर्शित करो
नयनो से वही भाव
या भेज दो मुझे
वैराग्य में
ढूँढने अपनी व्याकुलता
और उसका समाधान
एक बार अलग होकर
करने दो फिर मुझे प्रयत्न
तुम्हे पाने का
उसी रूप में
जिसमे पा लिया था मैंने
अपने लिए
साथी का अपनापन
उन्मुक्त और अनंत प्रेम साथी का
और अंतिम
किन्तु स्थायी वात्सल्य
और ममत्व ,,
जिससे शांत हो एक बार
मेरी व्याकुलता ,,
''''''''''''''''''''''''''''' ;;अजीत त्रिपाठी '';;;;;;;;;
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