Monday, November 22, 2010

रूप गर्विता


निसंकोच कहो
पर याद रखो
भाव निर्मल हों
मन की कुटिलता
जीवन को व्यर्थ कर देती है
इर्ष्या की अग्नि
तुम्हे ही जलाएगी
यद्यपि तुम्हे यकीन ना हो
किन्तु
जो तुम्हारा विचार है
मेरे प्रति
महज आकर्षण है
विलासिता है
तुम मुझे भोग्य
समझते हो
या चरण रज में समेटना चाहते हो
निर्विकार हो कहो

बड़े ही सपष्ट भाव
से कहा था उसने
मेरे प्रणय निवेदन पर

मै आवाक था
निशब्द जड़ सा
खड़ा हुआ ,,
वहां पर ,,

किंचित ही इर्ष्या हो मुझे
उसे रूप उसके रंग से
शायद ही समझा हो
मैंने भोग्य उसे
मै तो प्रेम ही करता था

वैसे ही
जैसे कोई
ईश्वरीय तत्व से
जुड़ना चाहता था
मै भी उस से जुड़ना चाहता था

तुमसे प्रेम नहीं
कहते हुए
उलटे पावँ चला आया था मै

उस रूप गर्विता से प्रेम कैसा
जिसे इन आँखों में
प्रेम की जगह
विलासिता दिखती हो

इन अधरों की लपलपाहट
महज
कुछ कहने की
चंचलता न लगकर
भोगने की अभिलाषा लगती हो

संदेह से शुरू हुआ प्रेम
टूटे हुए माला सा होगा
मैंने सुना है कहीं

बस चला आया हूँ
यही सोचते सोचते
किसने समझाया है उसे
भोग और विलास का अर्थ
किसने कहा ,,
ये संभव है
सिर्फ स्त्री रूप के साथ

हमारी उजाड़ बीहड़
पुरानी कहानियों ने
या आईने ने
जिसमे स्वयम का
चलायमान रूप देखा हो उसने
और समझ लिया हो खुद को
रूप वान
और बन गई हो
रूप गर्विता ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

No comments:

Post a Comment