Monday, November 22, 2010

''अजीत'' मै कौन हूँ


मै कौन हूँ
स्वयं नहीं पता मुझे
एक बेबाक सा
बेजुबान सा
इंसान ही हूँ

आप समझ लेते हो
की लिखने वाला है कोई

किन्तु दोस्तों
सच कहूँ
तो लिखता नहीं हूँ मै
ना ही कभी लिखता था मै

पहले एक नाजनी
बैठ जाती थी
पलकों में
तो लिख जाता था कुछ
उसके रूप श्रृंगार पर
कभी उसके नाज पर
कभी उसके प्यार पर

और अभी भी चल जाती है
कलम
एक अरसे बाद
देखकर
की गिर रही है वो
पलकों से
आंसू बनकर
एक दर्द की तरह
और वो दर्द उतर आता है
मेरी तहरीर में

मेरे लिखने में उतना ही प्यार था
जितना मुझे उस से प्यार है
और उतना ही दर्द है
जितना दर्द अब मुझ में है

सच मानो
प्रेम और दर्द
इसके इतर
कुछ नहीं लिखा है मैंने

और शायद लिखूं भी ना
कलियाँ फूल
तब तक ही हसीं थे
जब तक दे देता था
एक गुलाब हंसकर उसे
और छुपा लेती थी वो उसे
अपने सीने के मानिंद
किसी किताब में

और अब
गुलाब ही चुभ जाता है

बड़ी कशमकश में हूँ
समझ नहीं आता क्या रह गया हूँ

आप समझ लेना
और बता देना .

की .


क्या आगाज़ था मेरा क्या अंजाम होना है
किसके नाम का हूँ मै किसके नाम होना है

मेरी बेचारगी क्या है मेरी बरबादियाँ क्या हैं
मेरी आवारगी क्या,, क्या इलज़ाम होना है /........ ''अजीत त्रिपाठी '''

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