मेरी आँखों का तारा है
यही सुनते सुनते बड़ा हुआ
माँ है ,,, झूट भी नहीं बोलती
और उसके सच
परे कर देते हैं
सभी शंकाओं को
एक दिन उसने भी कह दिया था
हंसी ठिठोली में
गुलाबों से घिरे बाग़ में
बहुत सुन्दर हो ,, जवान हो
आँखें तुम्हारी
सब बोलती रहती हैं
कोई भी मर मिटेगी तुम पर
सोच में पड़ गया था
इतना ही सुन्दर था मै
की कोई भी मिल जाए
तो वो ही क्यूँ नहीं
क्यूँ नहीं समझ पाती
वो बोलती आँखों को
सोचता रह जाता हूँ मै
अक्सर
की सब होने के बाद भी
अकेला क्यूँ हूँ मै
और वो जो
किसी के लायक भी
कह देती है मुझे
अपने लायक क्यूँ नहीं समझती
सोचता रह जाता हूँ मै ,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी '' .
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