Thursday, December 16, 2010

उम्र के इस पड़ाव में

अब नहीं है
कुछ लिखने ko
पास मेरे
तुम्हारे प्यार और मेरे दर्द को
बहुत लिख चूका हूँ मै
और खा चूका हूँ
अपना दिल बेचकर
बहुत सी रोटियां
बहुत नाम कमा लिया था
बहुत धन भी जोड़ लिया है
पर किस काम का ये

तुम नहीं तो
कोई आगे जुड़ भी नहीं पाया
और ना ही है
मेरे पास कोई अंश मेरा
जो जिए
वो जिन्दगी मेरी
जो मै जी नहीं पाया

और अब भी मै
किसी को जल्द
अपना बना नहीं पाता

पेड़ पत्ते , तालाब . नदी , वन
फूल , खुशबू , चितवन
इन पर तो लिखना भी नहीं आता मुझे

और अब तुम्हारी याद भी धुंधली है
उम्र के इस पड़ाव में
की लिख ही दूँ मै फिर एक बार
सच की कितनी खूबसूरत हो तुम
या
कितनी खूबसूरत थी तुम उस वक़्त
या
कितना सम्पूर्ण था मै
तुम्हारे होने से
उस वक़्त
या कितना अकेला हूँ मै
तुम्हारे बिना
इस वक़्त ,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

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