ise likhne ke baad mai hi nahi padh paya ise
pahle kahani likhna chahta tha
fir kavita ki shakl de di,, to ab ye naa kahani hai naa kavita hai,, bas ek yatharth hai
ek kadwa sach,,
माँ बाप की लाडली थी
किन्तु थे
चेहरे पे अजीब से
चेचक के दाग
और काला रंग
बड़ी अजीब दुर्दशा थी
उर्वशी की
नाम को तो
रूपसी थी
किन्तु यथार्थ में
रूप था ही नहीं
पर यौवन
और उसकी पूर्नाता की महत्वकांक्षा
अन्दर थी समाहित कही
अहसास जगमग थे उसमे कहीं
हर बार कोई आ जाता था
मेहमाँ बनकर घर में
और देख लेता था लड़की
पर बदसूरती ,, और उसपर
चन्द सितारों से चेचक के दाग
किसी की पसंद नहीं बन पाई वो
पर गर्व था उसमे
और बन गई वो माँ बाप का बेटा
कुछ कमाने लगी
और व्यस्त रखकर खुद को
भूलने लगी अपने आप को ,,,,,,,,
................................................
दंगे भड़क चुके हैं सहर में
रेडिओ बज रहा है
शाम होने को है
सभी भाग रहे हैं अपने अपने घर
उर्वशी भी भागी जा रही है
मैदान के बीचों बीच
सोचकर अजीब सी बातें
की सुनाई देती है
अजीब सी आवाजें
पुरुषों की साथ चलते हुए
कुछ तेज करते हुए चल अपनी
दुपट्टे को सँभालते हुए
भागी जा रही है वो
अनिश्चय के दर से
की अचानक पकड़ लिया किसी ने उसका उसका हाथ
और अचानक ही
एक समूह
भूखे भेडियों का
टूट चूका था उस पर
मान को मर्यादा को
हर रहा था एक समूह
दर्द और व्याकुलता
साफ़ था उर्वशी के चेहरे पर
पर अचानक
एक चेहरा
जो मान मर्दन कर रहा था उसका
देखकर
अजीब सी सोच में पड़ गई
फिर जो हुआ
उसका ध्यान नहीं दिया उसने
कुछ पल गुजरे
और अपनी बेआबरू कमीज के साथ
सोचती जा रही थी
उर्वशी
वो आखिरी चेहरा
जो कुछ ही दिन पहले
दिन के उजाले में
उसके अपने सानिध्य के
लायक नहीं समझ रहा था
कैसे रात के अँधेरे में
जन्मजात सा
उसमे समां रहा था
अजीब सी ख़ुशी थी उर्वशी को
इस दुर्दशा के बाद भी
की उसका यौवन
व्यर्थ नहीं
वो दिन के उजाले में ही
कुरूप है
किन्तु रात होते ही
अँधेरे में
वो काबिल है किसी के भी ................. ''अजीत त्रिपाठी ''
pahle kahani likhna chahta tha
fir kavita ki shakl de di,, to ab ye naa kahani hai naa kavita hai,, bas ek yatharth hai
ek kadwa sach,,
माँ बाप की लाडली थी
किन्तु थे
चेहरे पे अजीब से
चेचक के दाग
और काला रंग
बड़ी अजीब दुर्दशा थी
उर्वशी की
नाम को तो
रूपसी थी
किन्तु यथार्थ में
रूप था ही नहीं
पर यौवन
और उसकी पूर्नाता की महत्वकांक्षा
अन्दर थी समाहित कही
अहसास जगमग थे उसमे कहीं
हर बार कोई आ जाता था
मेहमाँ बनकर घर में
और देख लेता था लड़की
पर बदसूरती ,, और उसपर
चन्द सितारों से चेचक के दाग
किसी की पसंद नहीं बन पाई वो
पर गर्व था उसमे
और बन गई वो माँ बाप का बेटा
कुछ कमाने लगी
और व्यस्त रखकर खुद को
भूलने लगी अपने आप को ,,,,,,,,
........................................
दंगे भड़क चुके हैं सहर में
रेडिओ बज रहा है
शाम होने को है
सभी भाग रहे हैं अपने अपने घर
उर्वशी भी भागी जा रही है
मैदान के बीचों बीच
सोचकर अजीब सी बातें
की सुनाई देती है
अजीब सी आवाजें
पुरुषों की साथ चलते हुए
कुछ तेज करते हुए चल अपनी
दुपट्टे को सँभालते हुए
भागी जा रही है वो
अनिश्चय के दर से
की अचानक पकड़ लिया किसी ने उसका उसका हाथ
और अचानक ही
एक समूह
भूखे भेडियों का
टूट चूका था उस पर
मान को मर्यादा को
हर रहा था एक समूह
दर्द और व्याकुलता
साफ़ था उर्वशी के चेहरे पर
पर अचानक
एक चेहरा
जो मान मर्दन कर रहा था उसका
देखकर
अजीब सी सोच में पड़ गई
फिर जो हुआ
उसका ध्यान नहीं दिया उसने
कुछ पल गुजरे
और अपनी बेआबरू कमीज के साथ
सोचती जा रही थी
उर्वशी
वो आखिरी चेहरा
जो कुछ ही दिन पहले
दिन के उजाले में
उसके अपने सानिध्य के
लायक नहीं समझ रहा था
कैसे रात के अँधेरे में
जन्मजात सा
उसमे समां रहा था
अजीब सी ख़ुशी थी उर्वशी को
इस दुर्दशा के बाद भी
की उसका यौवन
व्यर्थ नहीं
वो दिन के उजाले में ही
कुरूप है
किन्तु रात होते ही
अँधेरे में
वो काबिल है किसी के भी ................. ''अजीत त्रिपाठी ''
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