मै सत्य नहीं
असत्य भी नहीं
निजता भी नहीं
स्वार्थ भी नहीं
बस एक यथार्थ हूँ मै
तू
साधारण मनुज
जीवन कहकर मुझे
कर लेता है
इतिश्री
अपने कर्तव्यों से
मानकर
की है भाग्य यही
किन्तु मै भाग्य नहीं
कर्म का भोग्य हूँ
भोग और प्रसाद हूँ मै
कर्मठता का
मै स्वतंत्रता नहीं
एक भाव हूँ
स्वातंत्र्य का
जिसे खोजना लक्ष्य है
जीव मात्र का
रस से , सुरस से
प्रेम से , पीड़ा से
प्रकृति से , पूर्णता से
परमात्मा ,, आत्मा से
परे हूँ मै
किन्तु सारगर्भित भी हूँ
इन्ही से मै
हे मनुज
मै जीवन हूँ
मृत्यु के पाश से मुक्त
किन्तु व्याकुल
मृत्यु के प्रतीक्षा में
परन्तु
उस से पहले
भोगने हैं तुझे
सारे कर्म सारे कर्तव्य
और करना है
निर्वहन
अपने दायित्यों का
उसके पहले
ना मै सार्थक हूँ तेरे लिए
ना तू परम भोग है मेरा
उस परम सत्ता के प्रति
जिसके प्रति
कर्तव्य है मेरा
की मै जीवन
तुझे
साधारण मनुज से
इंसान बनाऊं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
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