Wednesday, March 4, 2009

हम शौक-ऐ-मौजूं हैं तेरी तरफदारी नहीं करते
दरिया हैं बहते रहते हैं तेरी वफादारी नहीं करते

सौ रंग है ज़माने के एक अपना भी बना रखा है
बेतकल्लुफी से जीते हैं हम अदाकारी नहीं करते

इश्क का फलसफा यही है तुझे या मुझे जफा
तो तू ही कर हम तो ये गुनाहगारी नहीं करते

ठीक है कोई बात थी जिस से खुश रहे हम तुम
अब बार बार तो उसे याद कर हम अय्यारी नहीं करते

हमने की है वफ़ा तो तो हमें कुछ नसीब हो सनम
खुद्दार हैं हम ,हम किसी की कभी बेगारी नहीं करते

रोज मुद्दतों सा बीत जाता है तेरी यादों में दिन
और ख्वाब में तुझे देखने की हम तैयारी नहीं करते

उस पल का हिसाब भी हमें याद है जान-ऐ-अजीत
सब याद रखते हैं काम में हम मक्कारी नहीं करते ,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
सनम इस तरह से मेरे दिल के पास ना हो
गर चला जाऊँ मै, तो भी तू उदास ना हो

जो भी अरमान है तेरे निकाल ले अब आज ही
तमन्नाएँ पूरी कर ले अपनी, अधूरी प्यास ना हो

मै ही हरजाई सही, तू वफादार सही अब तक
भूल जाना मुझे ,मुझसे तुम्हे कोई आस ना हो

माना ,मै आऊंगा ही तुम्हे याद ,मुझे पता है
रो लेना तुम सनम खुलकर, जब कोई पास ना हो

ये तुम्हारी गलती थी , मुझसे प्यार करना
अब संभालना दिल को इसमें कोई अहसास ना हो

इस दुनिया में बहुत से ख्वाब बिकते हैं मेरे
पर अब कोई भी हसीं सपना ,तुम्हे रास ना हो

''अजीत'' तुमने किया ,मुझसे आया ना प्यार करना
बहुत सुन चूका हूँ मै ,अब ये इश्क की बकवास ना हो ,,, ''अजीत त्रिपाठी''
इश्क में परवाने सा जल जाने दो
कुछ तमन्नाओं को मचल जाने दो

मै तुम्हारा हूँ ,तुम निराश मत हो
हुश्न का क्या उसे यूँ ही ढल जाने दो

रोज ही ख़्वाबों में मिल लेंगे हम
वक़्त जाता है तो निकल जाने दो

खुद में हम एक आग का दरिया hain
hushn का क्या उसे पिघल जाने दो

आज मत रोको कुछ कह लेने दो
दिल के ज़ज्बात तुम में संभल जाने दो ,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी'
आज उन नजरों से कत्ल होने के हालत बहुत हैं
हैं जिन्दा जो ,उनके जिन्दगी से सवालात बहुत हैं

कौन रहेगा मायूस अब ,खिड़की खोल दी है उन ने
बचने की कोई जगह नहीं है ,यहाँ हवालात बहुत है

किसको हक है की गुजार ले ,अपनी राते तनहा
वो नहीं तो क्या ,उनके यहाँ ,खयालात बहुत हैं

सूखे लब ,खामोश आँखे और बातें ज़फा की उनकी
किसको है शुकून अब इनके लिए तो रात बहुत हैं

सादगी ,समर्पण ,हया और वो निराली अदा उनकी
याद करने को ऐ दिल ,हमारी सारी मुलाकात बहुत हैं

आज फिर बेनूर है वो चाँद पूनम का ,सिसक रहा है
आज तो उनकी बारी है ,चाँद को शाम-ऐ-रात बहुत है

दुनिया ऐसे ही उस खुदा को ,अजूबा कहती फिर रही है
हमारे लिए वो खुदा ही सही ,अजूबे बाकी के सात बहुत हैं

पर ये सबका हुआ ''अजीत''का भी हाल सुन ऐ शोख
तुमसे प्यार है ,तुम्हारे लिए ,दिल में , ज़ज्बात बहुत हैं ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
आज तेरे हसीं अहसासों को मार डाला हमने
दिल में बसी थीं ,उन साँसों को मार डाला हमने

एक ग़ज़ल थी तेरे नाम की हम में कब से jaan
jo छलकते थे उन ज़ज्बातों को मार डाला हमने

आवारा मंजर और शहर में वो मेरे तेरा जलवा
पर तेरे संग की हसीं रातों को मार डाला हमने

वो कहकहे ,अब की ये वीरानियाँ ,ये खामोशी
तेरी आँखों की मीठी बातों को मार डाला हमने

बेबसी खुद से खुद को अलग कर ,तेरा करने की
दिल के दिल से सारे रिश्ते नातों को मार डाला हमने

गुनाहगार हम हैं अपने किसी और का सिला क्या
खुद को संभालने के सारे वादों को मार डाला हमने

जिनके सदके उम्र गुजारने का ख्वाब देखा था कभी
तेरी उन अनजान सी मुलाकातों को मार डाला हमने ,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
उसकी निगाहों ने हमें परेशानी में डाल रखा है
अजीब सी सादगी ने हमें हैरानी में डाल रखा है

आईने सी फितरत है मेरी ,,टूट जाता हूँ अक्सर
पर मेरे हसीं खुदा ने मुझे पलकों में सम्भाल रखा है

बहुत दिन हुए अब तन्हाई में नींद नहीं आती मुझको
सो खुद पे छाओं करने उन जुल्फों का एक बाल रखा है

शायद है, किसी को देखा हो, उसने प्यार से ,अजीब hai
न जाने कैसी है ,किस मूरत में ,,खुद को ढाल रखा है

अजीब बात है की मेरी धड़कन ,वो सुन नहीं पाती
अपने पागल दिल को उस दिल में हमने पाल रखा है

पर सितम भी अजीब है उसका कुछ कहती नहीं वो
बस मुस्कुराहटों का अपने पास एक हसीं जाल रखा है

कोई बात नहीं प्रेम पर्व इन्तजार में बीत गया ''अजीत''
तो जश्न या जुदाई को हमने ,,अब अगले साल रखा है ,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
हम शौक-ऐ-मौजूं हैं तेरी तरफदारी नहीं करते
दरिया हैं बहते रहते हैं तेरी वफादारी नहीं करते

सौ रंग है ज़माने के एक अपना भी बना रखा है
बेतकल्लुफी से जीते हैं हम अदाकारी नहीं करते

इश्क का फलसफा यही है तुझे या मुझे जफा
तो तू ही कर हम तो ये गुनाहगारी नहीं करते

ठीक है कोई बात थी जिस से खुश रहे हम तुम
अब बार बार तो उसे याद कर हम अय्यारी नहीं कराते

हमने की है वफ़ा तो तो हमें कुछ नसीब हो सनम
खुद्दार हैं हम ,हम किसी की कभी बेगारी नहीं करते

रोज मुद्दतों सा बीत जाता है तेरी यादों में दिन
और ख्वाब में तुझे देखने की हम तैयारी नहीं करते

उस पल का हिसाब भी हमें याद है जान-ऐ-अजीत
सब याद रखते हैं काम में हम मक्कारी नहीं करते ,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
ab to mujhe mujhsa hi rahne do tum
kuch apne nadaan dil ki bhi kahne do tum

tumhara pyar mera hi tha ek umar tak
ab ye judaai bhi tumhari mujhe sahne do tum

mat roko aanshuon ko mere aaj sanam
kuch aag ko dil ki inke sang bahne do tum

hajar baar marne se to jeena hi achcha yahan
khwaabon ke har aashiyane ko dhahne do tum

mukaddar ki baat hai ki fir niraash hain ham
ab isi haal me khush hain hamen rahne do tum

koi zabt nahi hai tere jaane ka hamen ab bhi
tum aai thi isi baat se hamen machalane do tum

jaroorat nahi hai fir julfe bikherane ki tumko
ham gire hain hamko khud se sambhalane do tum

ek dua hai bas aakhiri tumse ,,maan lo ''ajit''
door rahkar muskurakar hamen khush rahne do tum ,,,,,,,,,, ''AJIT TRIPATHI''
तुमने आज सर-ऐ-बज्म हमको तरसाया बहुत है
अपने ही अल्फाजों से हमको तड़पाया बहुत है

मेरी आँखों की वफ़ा और उस पे तेरा वो सितम
भरी महफ़िल आज तुमने हमको आजमाया बहुत है

कभी दूर थे तो कभी ख़्वाबों में हमारे पास रहे तुम
हमारे अहसासों में आकर हमको भरमाया बहुत है

हमारी गलती है इसमें कहाँ सब आपका असर है
साहिबा जुल्फों को आपने आज बिखराया बहुत है

मत करो वफ़ा की बातें पर जफा भी तो न karo
kai बार हमने ये आपको समझाया बहुत है

उसके पहलु से जो निकले जहाँ ने घेर लिया हमको
कुछ किस्से सच्चे झूठे हमने सबको बतलाया बहुत है

घर के हिस्से में जो आई हमारे वो दीवार टूटी सी
तेरी तस्वीर समझकर सीने से हमने लगाया बहुत है

आज भी यकीन नहीं आता उसकी जफा का ''अजीत''
हमने तो अपनी वफ़ा से उसका क़र्ज़ चुकाया बहुत है ,,,,,,,, अजीत त्रिपाठी''
बहा दी है तेरी यादों की कहानी शराब में
मिटा दी है अब डुबोकर जवानी शराब में

किसको नशा है यहाँ प्यालों से जाम से
न बची है जहाँ में तेरी कहानी शराब में

अपना क्या राख है फिजाओं में बह चले
वैसे ही जैसे मिल गया है पानी शराब

तेरा वजूद वो तेरी खुशबू वो तेरी बातें
रह न गई है तुझ बिन रवानी शराब में

आज भी पिला दे कोई तेरी कसम से मुझे
शायद बची हो तेरी कोई निशानी शराब में

तुम नहीं तो गम है किस बात का अब ''अजीत''
जिन्दगी है अपनी अब तो ,आनी- जानी शराब में ,, ''अजीत त्रिपाठी''
आपस की बात है .आपस में हो
गई रात भर याद रही . शुबह को खो

गई बहुत दिनों से मेरे ख्वाब में जागी
थी मेरी बाँहों में आते ही , ख़ुशी से सो गई

शायद कोई गम था ,घर का उसको
हंसती रही देखकर मुझे, फिर रो गई

कोई आ गया था बीच ,,हमारे प्यार के
तो वो दूर गई और ,,, वहीँ की हो गई

अभी भी इन्तजार में रहता हूँ हर वक़्त
पर आई नहीं वो ,,जबसे यहाँ से वो

गई कुछ उसके थे , कुछ मेरे थे वादे उससे
दो घरों की इज्ज़त थी ,,दोनों को धो गई

फलसफा यही था की ,वो मेरी परछाई
मेरी भी रही ,किसी और की भी ,हो गई

किसने कहा हिचकियाँ आती हैं ''अजीत''वो
आई नहीं ख्वाब में भी ,जबसे वो गई ...... ''अजीत त्रिपाठी''