Wednesday, March 4, 2009

आपस की बात है .आपस में हो
गई रात भर याद रही . शुबह को खो

गई बहुत दिनों से मेरे ख्वाब में जागी
थी मेरी बाँहों में आते ही , ख़ुशी से सो गई

शायद कोई गम था ,घर का उसको
हंसती रही देखकर मुझे, फिर रो गई

कोई आ गया था बीच ,,हमारे प्यार के
तो वो दूर गई और ,,, वहीँ की हो गई

अभी भी इन्तजार में रहता हूँ हर वक़्त
पर आई नहीं वो ,,जबसे यहाँ से वो

गई कुछ उसके थे , कुछ मेरे थे वादे उससे
दो घरों की इज्ज़त थी ,,दोनों को धो गई

फलसफा यही था की ,वो मेरी परछाई
मेरी भी रही ,किसी और की भी ,हो गई

किसने कहा हिचकियाँ आती हैं ''अजीत''वो
आई नहीं ख्वाब में भी ,जबसे वो गई ...... ''अजीत त्रिपाठी''

No comments:

Post a Comment