Wednesday, March 4, 2009

उसकी निगाहों ने हमें परेशानी में डाल रखा है
अजीब सी सादगी ने हमें हैरानी में डाल रखा है

आईने सी फितरत है मेरी ,,टूट जाता हूँ अक्सर
पर मेरे हसीं खुदा ने मुझे पलकों में सम्भाल रखा है

बहुत दिन हुए अब तन्हाई में नींद नहीं आती मुझको
सो खुद पे छाओं करने उन जुल्फों का एक बाल रखा है

शायद है, किसी को देखा हो, उसने प्यार से ,अजीब hai
न जाने कैसी है ,किस मूरत में ,,खुद को ढाल रखा है

अजीब बात है की मेरी धड़कन ,वो सुन नहीं पाती
अपने पागल दिल को उस दिल में हमने पाल रखा है

पर सितम भी अजीब है उसका कुछ कहती नहीं वो
बस मुस्कुराहटों का अपने पास एक हसीं जाल रखा है

कोई बात नहीं प्रेम पर्व इन्तजार में बीत गया ''अजीत''
तो जश्न या जुदाई को हमने ,,अब अगले साल रखा है ,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

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