आज तेरे हसीं अहसासों को मार डाला हमने
दिल में बसी थीं ,उन साँसों को मार डाला हमने
एक ग़ज़ल थी तेरे नाम की हम में कब से jaan
jo छलकते थे उन ज़ज्बातों को मार डाला हमने
आवारा मंजर और शहर में वो मेरे तेरा जलवा
पर तेरे संग की हसीं रातों को मार डाला हमने
वो कहकहे ,अब की ये वीरानियाँ ,ये खामोशी
तेरी आँखों की मीठी बातों को मार डाला हमने
बेबसी खुद से खुद को अलग कर ,तेरा करने की
दिल के दिल से सारे रिश्ते नातों को मार डाला हमने
गुनाहगार हम हैं अपने किसी और का सिला क्या
खुद को संभालने के सारे वादों को मार डाला हमने
जिनके सदके उम्र गुजारने का ख्वाब देखा था कभी
तेरी उन अनजान सी मुलाकातों को मार डाला हमने ,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
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