Wednesday, March 4, 2009

आज उन नजरों से कत्ल होने के हालत बहुत हैं
हैं जिन्दा जो ,उनके जिन्दगी से सवालात बहुत हैं

कौन रहेगा मायूस अब ,खिड़की खोल दी है उन ने
बचने की कोई जगह नहीं है ,यहाँ हवालात बहुत है

किसको हक है की गुजार ले ,अपनी राते तनहा
वो नहीं तो क्या ,उनके यहाँ ,खयालात बहुत हैं

सूखे लब ,खामोश आँखे और बातें ज़फा की उनकी
किसको है शुकून अब इनके लिए तो रात बहुत हैं

सादगी ,समर्पण ,हया और वो निराली अदा उनकी
याद करने को ऐ दिल ,हमारी सारी मुलाकात बहुत हैं

आज फिर बेनूर है वो चाँद पूनम का ,सिसक रहा है
आज तो उनकी बारी है ,चाँद को शाम-ऐ-रात बहुत है

दुनिया ऐसे ही उस खुदा को ,अजूबा कहती फिर रही है
हमारे लिए वो खुदा ही सही ,अजूबे बाकी के सात बहुत हैं

पर ये सबका हुआ ''अजीत''का भी हाल सुन ऐ शोख
तुमसे प्यार है ,तुम्हारे लिए ,दिल में , ज़ज्बात बहुत हैं ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

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