अब नहीं है
कुछ लिखने ko
पास मेरे
तुम्हारे प्यार और मेरे दर्द को
बहुत लिख चूका हूँ मै
और खा चूका हूँ
अपना दिल बेचकर
बहुत सी रोटियां
बहुत नाम कमा लिया था
बहुत धन भी जोड़ लिया है
पर किस काम का ये
तुम नहीं तो
कोई आगे जुड़ भी नहीं पाया
और ना ही है
मेरे पास कोई अंश मेरा
जो जिए
वो जिन्दगी मेरी
जो मै जी नहीं पाया
और अब भी मै
किसी को जल्द
अपना बना नहीं पाता
पेड़ पत्ते , तालाब . नदी , वन
फूल , खुशबू , चितवन
इन पर तो लिखना भी नहीं आता मुझे
और अब तुम्हारी याद भी धुंधली है
उम्र के इस पड़ाव में
की लिख ही दूँ मै फिर एक बार
सच की कितनी खूबसूरत हो तुम
या
कितनी खूबसूरत थी तुम उस वक़्त
या
कितना सम्पूर्ण था मै
तुम्हारे होने से
उस वक़्त
या कितना अकेला हूँ मै
तुम्हारे बिना
इस वक़्त ,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
Thursday, December 16, 2010
वो पगली
मै रुका रहता हूँ ,
अक्सर वहीँ ,
जहाँ मिल जाती थीं ,
नजरें उस से ,
और वो मुस्कुरा देती थी .,
अब भी रहता हूँ ,
इन्तजार में , मै,
की निकलेगी कभी ,
फिर मिलेंगी नजरें
और , वो मुस्कुरा देगी
और
इसी पश-ओ-पेश में
मेरे ख्यालों में ,
मेरे पागलपन पर,
वो पगली ,
मुस्कुरा देती है ..,,''अजीत त्रिपाठी''
अक्सर वहीँ ,
जहाँ मिल जाती थीं ,
नजरें उस से ,
और वो मुस्कुरा देती थी .,
अब भी रहता हूँ ,
इन्तजार में , मै,
की निकलेगी कभी ,
फिर मिलेंगी नजरें
और , वो मुस्कुरा देगी
और
इसी पश-ओ-पेश में
मेरे ख्यालों में ,
मेरे पागलपन पर,
वो पगली ,
मुस्कुरा देती है ..,,''अजीत त्रिपाठी''
Monday, December 13, 2010
उर्वशी
ise likhne ke baad mai hi nahi padh paya ise
pahle kahani likhna chahta tha
fir kavita ki shakl de di,, to ab ye naa kahani hai naa kavita hai,, bas ek yatharth hai
ek kadwa sach,,
माँ बाप की लाडली थी
किन्तु थे
चेहरे पे अजीब से
चेचक के दाग
और काला रंग
बड़ी अजीब दुर्दशा थी
उर्वशी की
नाम को तो
रूपसी थी
किन्तु यथार्थ में
रूप था ही नहीं
पर यौवन
और उसकी पूर्नाता की महत्वकांक्षा
अन्दर थी समाहित कही
अहसास जगमग थे उसमे कहीं
हर बार कोई आ जाता था
मेहमाँ बनकर घर में
और देख लेता था लड़की
पर बदसूरती ,, और उसपर
चन्द सितारों से चेचक के दाग
किसी की पसंद नहीं बन पाई वो
पर गर्व था उसमे
और बन गई वो माँ बाप का बेटा
कुछ कमाने लगी
और व्यस्त रखकर खुद को
भूलने लगी अपने आप को ,,,,,,,,
................................................
दंगे भड़क चुके हैं सहर में
रेडिओ बज रहा है
शाम होने को है
सभी भाग रहे हैं अपने अपने घर
उर्वशी भी भागी जा रही है
मैदान के बीचों बीच
सोचकर अजीब सी बातें
की सुनाई देती है
अजीब सी आवाजें
पुरुषों की साथ चलते हुए
कुछ तेज करते हुए चल अपनी
दुपट्टे को सँभालते हुए
भागी जा रही है वो
अनिश्चय के दर से
की अचानक पकड़ लिया किसी ने उसका उसका हाथ
और अचानक ही
एक समूह
भूखे भेडियों का
टूट चूका था उस पर
मान को मर्यादा को
हर रहा था एक समूह
दर्द और व्याकुलता
साफ़ था उर्वशी के चेहरे पर
पर अचानक
एक चेहरा
जो मान मर्दन कर रहा था उसका
देखकर
अजीब सी सोच में पड़ गई
फिर जो हुआ
उसका ध्यान नहीं दिया उसने
कुछ पल गुजरे
और अपनी बेआबरू कमीज के साथ
सोचती जा रही थी
उर्वशी
वो आखिरी चेहरा
जो कुछ ही दिन पहले
दिन के उजाले में
उसके अपने सानिध्य के
लायक नहीं समझ रहा था
कैसे रात के अँधेरे में
जन्मजात सा
उसमे समां रहा था
अजीब सी ख़ुशी थी उर्वशी को
इस दुर्दशा के बाद भी
की उसका यौवन
व्यर्थ नहीं
वो दिन के उजाले में ही
कुरूप है
किन्तु रात होते ही
अँधेरे में
वो काबिल है किसी के भी ................. ''अजीत त्रिपाठी ''
pahle kahani likhna chahta tha
fir kavita ki shakl de di,, to ab ye naa kahani hai naa kavita hai,, bas ek yatharth hai
ek kadwa sach,,
माँ बाप की लाडली थी
किन्तु थे
चेहरे पे अजीब से
चेचक के दाग
और काला रंग
बड़ी अजीब दुर्दशा थी
उर्वशी की
नाम को तो
रूपसी थी
किन्तु यथार्थ में
रूप था ही नहीं
पर यौवन
और उसकी पूर्नाता की महत्वकांक्षा
अन्दर थी समाहित कही
अहसास जगमग थे उसमे कहीं
हर बार कोई आ जाता था
मेहमाँ बनकर घर में
और देख लेता था लड़की
पर बदसूरती ,, और उसपर
चन्द सितारों से चेचक के दाग
किसी की पसंद नहीं बन पाई वो
पर गर्व था उसमे
और बन गई वो माँ बाप का बेटा
कुछ कमाने लगी
और व्यस्त रखकर खुद को
भूलने लगी अपने आप को ,,,,,,,,
........................................
दंगे भड़क चुके हैं सहर में
रेडिओ बज रहा है
शाम होने को है
सभी भाग रहे हैं अपने अपने घर
उर्वशी भी भागी जा रही है
मैदान के बीचों बीच
सोचकर अजीब सी बातें
की सुनाई देती है
अजीब सी आवाजें
पुरुषों की साथ चलते हुए
कुछ तेज करते हुए चल अपनी
दुपट्टे को सँभालते हुए
भागी जा रही है वो
अनिश्चय के दर से
की अचानक पकड़ लिया किसी ने उसका उसका हाथ
और अचानक ही
एक समूह
भूखे भेडियों का
टूट चूका था उस पर
मान को मर्यादा को
हर रहा था एक समूह
दर्द और व्याकुलता
साफ़ था उर्वशी के चेहरे पर
पर अचानक
एक चेहरा
जो मान मर्दन कर रहा था उसका
देखकर
अजीब सी सोच में पड़ गई
फिर जो हुआ
उसका ध्यान नहीं दिया उसने
कुछ पल गुजरे
और अपनी बेआबरू कमीज के साथ
सोचती जा रही थी
उर्वशी
वो आखिरी चेहरा
जो कुछ ही दिन पहले
दिन के उजाले में
उसके अपने सानिध्य के
लायक नहीं समझ रहा था
कैसे रात के अँधेरे में
जन्मजात सा
उसमे समां रहा था
अजीब सी ख़ुशी थी उर्वशी को
इस दुर्दशा के बाद भी
की उसका यौवन
व्यर्थ नहीं
वो दिन के उजाले में ही
कुरूप है
किन्तु रात होते ही
अँधेरे में
वो काबिल है किसी के भी ................. ''अजीत त्रिपाठी ''
Tuesday, December 7, 2010
मै सत्य नहीं
मै सत्य नहीं
असत्य भी नहीं
निजता भी नहीं
स्वार्थ भी नहीं
बस एक यथार्थ हूँ मै
तू
साधारण मनुज
जीवन कहकर मुझे
कर लेता है
इतिश्री
अपने कर्तव्यों से
मानकर
की है भाग्य यही
किन्तु मै भाग्य नहीं
कर्म का भोग्य हूँ
भोग और प्रसाद हूँ मै
कर्मठता का
मै स्वतंत्रता नहीं
एक भाव हूँ
स्वातंत्र्य का
जिसे खोजना लक्ष्य है
जीव मात्र का
रस से , सुरस से
प्रेम से , पीड़ा से
प्रकृति से , पूर्णता से
परमात्मा ,, आत्मा से
परे हूँ मै
किन्तु सारगर्भित भी हूँ
इन्ही से मै
हे मनुज
मै जीवन हूँ
मृत्यु के पाश से मुक्त
किन्तु व्याकुल
मृत्यु के प्रतीक्षा में
परन्तु
उस से पहले
भोगने हैं तुझे
सारे कर्म सारे कर्तव्य
और करना है
निर्वहन
अपने दायित्यों का
उसके पहले
ना मै सार्थक हूँ तेरे लिए
ना तू परम भोग है मेरा
उस परम सत्ता के प्रति
जिसके प्रति
कर्तव्य है मेरा
की मै जीवन
तुझे
साधारण मनुज से
इंसान बनाऊं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
Thursday, December 2, 2010
पापा ,,
पापा ,,
आपने सोचा ही नहीं
कितना दर्द होगा
आपके बिना
कितना अकेले होंगे हम
आपने सोचा ही नहीं
आज सुबह बिस्तर फिर
अजीब सी परेशानी में है
आज शाम फिर
अजीब सी हैरानी में है
कोई कह ही नहीं रहा है
शुबह उठने को जल्दी से
या शाम को
खेलने से मना करने को
पढने को
पापा
आपका हंसमुख चेहरा
वो शुबह को जाते वक्त की
हिदायतें
वो शाम को आते वक़्त की शिकायतें
हमेशा याद आती है
अब जब आप नहीं हैं
तो समझ आता है
की कितनी
जरूरी थी
आपकी डांट
आपकी फटकार
आज भाई तैयार होता है
आपकी तरह
जाने को काम पर
और याद करा जाता है
किस तरह
बरसते थे आप
माँ पर
की तैयार
क्यूँ नहीं है
कपडे और जूते अब तब तक
पापा आप बहुत याद आते हो
जब कोई कह देता है
कौन क्या करता है घर में
जैसे आज अजीत ने कह दिया
बताओ सीमा
क्या करते हैं
तुम्हारे पापा
पापा आप तो चले गए हैं
इस दुनिया के पार
पर क्या सोचा आपने
हम सभी भाई बहन हैं
आपकी निशानी
माँ को
कितने प्यारे हैं
आपकी ही तरह
फिर भी
आप क्यूँ चले गए
माँ को छोड़ कर
भगवान् के पास
जो आपको
भगवान् से भी
ज्यादा पसंद करती थी
जो आपको
भगवान् से भी बड़ा
भगवान् मानती थी ,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी;;
आपने सोचा ही नहीं
कितना दर्द होगा
आपके बिना
कितना अकेले होंगे हम
आपने सोचा ही नहीं
आज सुबह बिस्तर फिर
अजीब सी परेशानी में है
आज शाम फिर
अजीब सी हैरानी में है
कोई कह ही नहीं रहा है
शुबह उठने को जल्दी से
या शाम को
खेलने से मना करने को
पढने को
पापा
आपका हंसमुख चेहरा
वो शुबह को जाते वक्त की
हिदायतें
वो शाम को आते वक़्त की शिकायतें
हमेशा याद आती है
अब जब आप नहीं हैं
तो समझ आता है
की कितनी
जरूरी थी
आपकी डांट
आपकी फटकार
आज भाई तैयार होता है
आपकी तरह
जाने को काम पर
और याद करा जाता है
किस तरह
बरसते थे आप
माँ पर
की तैयार
क्यूँ नहीं है
कपडे और जूते अब तब तक
पापा आप बहुत याद आते हो
जब कोई कह देता है
कौन क्या करता है घर में
जैसे आज अजीत ने कह दिया
बताओ सीमा
क्या करते हैं
तुम्हारे पापा
पापा आप तो चले गए हैं
इस दुनिया के पार
पर क्या सोचा आपने
हम सभी भाई बहन हैं
आपकी निशानी
माँ को
कितने प्यारे हैं
आपकी ही तरह
फिर भी
आप क्यूँ चले गए
माँ को छोड़ कर
भगवान् के पास
जो आपको
भगवान् से भी
ज्यादा पसंद करती थी
जो आपको
भगवान् से भी बड़ा
भगवान् मानती थी ,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी;;
तुम्हे खोकर
जला दिया है
वो कागज़ का पुलिंदा
जिसे कहते थे
तुम प्रेम पत्र
दिल की धड़कन
तुम्हारी छुवन
तुम्हारी तडपन
जो याद दिलाते थे
गम में मुझे
की कितना खुश थी
तुम मुझे पाकर
और अब याद दिलाते हैं
कितना उदास हूँ मै
तुम्हे खोकर
''अजीत त्रिपाठी ''
वो कागज़ का पुलिंदा
जिसे कहते थे
तुम प्रेम पत्र
दिल की धड़कन
तुम्हारी छुवन
तुम्हारी तडपन
जो याद दिलाते थे
गम में मुझे
की कितना खुश थी
तुम मुझे पाकर
और अब याद दिलाते हैं
कितना उदास हूँ मै
तुम्हे खोकर
''अजीत त्रिपाठी ''
सोचता रह जाता हूँ मै
मेरी आँखों का तारा है
यही सुनते सुनते बड़ा हुआ
माँ है ,,, झूट भी नहीं बोलती
और उसके सच
परे कर देते हैं
सभी शंकाओं को
एक दिन उसने भी कह दिया था
हंसी ठिठोली में
गुलाबों से घिरे बाग़ में
बहुत सुन्दर हो ,, जवान हो
आँखें तुम्हारी
सब बोलती रहती हैं
कोई भी मर मिटेगी तुम पर
सोच में पड़ गया था
इतना ही सुन्दर था मै
की कोई भी मिल जाए
तो वो ही क्यूँ नहीं
क्यूँ नहीं समझ पाती
वो बोलती आँखों को
सोचता रह जाता हूँ मै
अक्सर
की सब होने के बाद भी
अकेला क्यूँ हूँ मै
और वो जो
किसी के लायक भी
कह देती है मुझे
अपने लायक क्यूँ नहीं समझती
सोचता रह जाता हूँ मै ,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी '' .
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