Thursday, February 24, 2011

आज साँझ ढले


आज साँझ ढले
पलकों पर
उतरेंगे
ख्वाब तेरे
फिर मै छू लूँगा
तपते हुए
तुम्हारे अधरों को
फिर आज
ख़्वाबों में
तुम शरमाकर
सिमट जाओगी
मेरी बाहों के आगोश में
फिर आज
तुम्हारी आँखों से
मेरी आँखे बात कर लेंगी
आज फिर
दूरियां दिलों की
कुछ कम होंगी

तुम्हारे नाज नखरे
तुम्हारा रूठना
हसना मुश्कुराना
सब होगा
मेरी आँखों के अन्दर
आज सांझ ढले
जब सो जाऊँगा मै
बस दुआ करना तुम
की आज नींद आ जाये
जिस दिन से
तुम्हे
देखना चाहा है ख़्वाबों में
तब से नींद नहीं आई
सच मानो शुबह
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, अजीत त्रिपाठी ''

Sunday, February 20, 2011

द्वितीय .......... अंतिम प्रयास में


द्वितीय
द्वितीय होने का भाव
तुम्हे किंचित ही भान हो शायद
की
किस तरह कचोटता रहता है
मन में
मस्तिष्क के तारों में
कैसे चुभता रहता है
ये भाव की
जीवन की विराट पारी
जिसमे
स्वयं और तुम्हारे लिए
एक ही था मै
किन्तु
वास्तविकता में
हमेशा ही द्वितीय रहा हूँ

माता पिता
जिनका अकेला था मै
पता नहीं किस खेत से
देख आए कोई ऐसा
जिसके जैसा मै बन नहीं पाया
और तुम
पता नहीं क्या चाहिए था तुम्हे
तुम्हारी नई पसंद से ज्ञात हुआ मुझे
की मै था ही नहीं कहीं
तुम्हारी खुशरंग दुनिया में
किन्तु सुनो
तुम तो सिर्फ एक थी
मेरी दुनिया के लिए
और उसमे ,
सिर्फ मै था तुम्हारे लिए
फिर क्यूँ ये द्वितीय होना

हमेशा सालता रहता है
चुभता रहता है मन में
वो कौन सा अक्स था
जो माँ बाप देखना चाहते थे मुझमे
और वो कौन सा शख्स है
जो तुम्हे मुझमे नहीं मिला
बताना जरूर

कम से कम मै
इस में
तो प्रथम रहूँ
की द्वितीय होने के बाद भी
पुनह दूँ
अपनी जिन्दगी की परीक्षा
ज्ञात कर अपनी कमजोरी
और गलतियाँ
ताकि आ सकूँ
अंतिम पड़ाव पर प्रथम
और
सो जाऊं शुकून से
अंतिम बार चिर निद्रा में
इस भाव से
की प्रथम आया हूँ मै
अंतिम प्रयास में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Friday, February 18, 2011

मुश्किल


मुश्किल
जायज़ है
खड़े होने में
खुद के पैरों पर

पर
सोचने वाली बात है
की
खड़े होकर
विवश समाज में
एक
भला चंगा आदमी
झुक जाता है
घुटनों के बल
लेट जाता है
पेट जमीं पर रख
और
रखकर सर
किसी दबंग के
कदमो पर
सजा पाकर
स्वाभिमान से
खड़े होने की ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Wednesday, February 9, 2011

हंस देता था

नहीं रोऊंगा मै
आज की रात
कर लिया है किनारा मैंने
तुम्हारी
उन यादों से
उन बातों से
जो अक्सर आ जाती थी
याद मुझे
और परेशान हो जाता था मै

बल्कि आज से मै
करूँगा याद
किस तरह
मेरी उलझी हुई बातों से
तुम बिलखकर
लग जाते थे गले
और मै सुलझाते हुए तुम्हारे बाल
तुम्हे सँभालते हुए अपनी बाँहों में
तुम्हे समझाते हुए
प्यार का मतलब
तुम्हारे माथे को
हल्के से
चूमकर
हंस देता था ,,,,,,, 'अजीत त्रिपाठी ''

अर्ध विक्षिप्त


अर्ध रात्री में
अर्ध स्नान
आंशुओं से
अर्ध ज्ञान
प्रेम की परिवर्तन का
अर्ध मान
प्रेम की पराकाष्ठा का
और उस पर
अर्ध्य
अपने आराध्य को
विचारों के तांडव से
निकलती
तड़प की चिंगारियां
हसरतों की बारिश
हिज्र की रुसवाइयों से

संभालते हुए
खुद को
भिगोते हुए
लिहाफ और तकिये
सुबह के इन्तजार में
रोज सो जाता है
ये जिस्म
जिसे
आदत है
हर शुबह
करने की
अजीब हरकते
जिसे देखकर
लोग कहते हैं
कोई प्रेम मत करना
वरना हो जाओगे
इस के जैसे
प्रेम के कारन
अर्ध विक्षिप्त ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Saturday, February 5, 2011

इस बसंत फिर,



कहो
क्या करोगे
जब चला जाऊँगा
ऐसे ही छोड़कर
मचलते तुम्हारे अरमानों को
पिघलते जिस्म को
तडपते होंठों को
घेरे में बाहों के
फंसे चेहरे को

और उनसे भी परे
तुम्हारे भावों और अहसासों को

चला जाऊंगा
बिना बताये
की वजह क्या
मजबूरी क्या
बस चला ही जाऊँगा
अपनी जिन्दगी से
दूर
निर्मम एकांत में
जहाँ प्रेम का भाव तो होगा
पर किसी से प्रेम नहीं

बताओ तब क्या करोगी

जान ले लुंगी तुम्हारी
................
कह दिया था हंसकर उसने
जो जान है मेरी
उस पगली को तो
पता भी नहीं
मेरी जान उसमे में
और जाने का विचार
बस छलावा है
कसने का और जोर से
उसके अहसासों
और खुशबू भरे
अंग प्रत्यंग को
अपनी बाहों में
इस बसंत फिर,.
पिछले बसंत की तरह ......... '' अजीत त्रिपाठी ''