Friday, February 18, 2011

मुश्किल


मुश्किल
जायज़ है
खड़े होने में
खुद के पैरों पर

पर
सोचने वाली बात है
की
खड़े होकर
विवश समाज में
एक
भला चंगा आदमी
झुक जाता है
घुटनों के बल
लेट जाता है
पेट जमीं पर रख
और
रखकर सर
किसी दबंग के
कदमो पर
सजा पाकर
स्वाभिमान से
खड़े होने की ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Wednesday, February 9, 2011

हंस देता था

नहीं रोऊंगा मै
आज की रात
कर लिया है किनारा मैंने
तुम्हारी
उन यादों से
उन बातों से
जो अक्सर आ जाती थी
याद मुझे
और परेशान हो जाता था मै

बल्कि आज से मै
करूँगा याद
किस तरह
मेरी उलझी हुई बातों से
तुम बिलखकर
लग जाते थे गले
और मै सुलझाते हुए तुम्हारे बाल
तुम्हे सँभालते हुए अपनी बाँहों में
तुम्हे समझाते हुए
प्यार का मतलब
तुम्हारे माथे को
हल्के से
चूमकर
हंस देता था ,,,,,,, 'अजीत त्रिपाठी ''

अर्ध विक्षिप्त


अर्ध रात्री में
अर्ध स्नान
आंशुओं से
अर्ध ज्ञान
प्रेम की परिवर्तन का
अर्ध मान
प्रेम की पराकाष्ठा का
और उस पर
अर्ध्य
अपने आराध्य को
विचारों के तांडव से
निकलती
तड़प की चिंगारियां
हसरतों की बारिश
हिज्र की रुसवाइयों से

संभालते हुए
खुद को
भिगोते हुए
लिहाफ और तकिये
सुबह के इन्तजार में
रोज सो जाता है
ये जिस्म
जिसे
आदत है
हर शुबह
करने की
अजीब हरकते
जिसे देखकर
लोग कहते हैं
कोई प्रेम मत करना
वरना हो जाओगे
इस के जैसे
प्रेम के कारन
अर्ध विक्षिप्त ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Saturday, February 5, 2011

इस बसंत फिर,



कहो
क्या करोगे
जब चला जाऊँगा
ऐसे ही छोड़कर
मचलते तुम्हारे अरमानों को
पिघलते जिस्म को
तडपते होंठों को
घेरे में बाहों के
फंसे चेहरे को

और उनसे भी परे
तुम्हारे भावों और अहसासों को

चला जाऊंगा
बिना बताये
की वजह क्या
मजबूरी क्या
बस चला ही जाऊँगा
अपनी जिन्दगी से
दूर
निर्मम एकांत में
जहाँ प्रेम का भाव तो होगा
पर किसी से प्रेम नहीं

बताओ तब क्या करोगी

जान ले लुंगी तुम्हारी
................
कह दिया था हंसकर उसने
जो जान है मेरी
उस पगली को तो
पता भी नहीं
मेरी जान उसमे में
और जाने का विचार
बस छलावा है
कसने का और जोर से
उसके अहसासों
और खुशबू भरे
अंग प्रत्यंग को
अपनी बाहों में
इस बसंत फिर,.
पिछले बसंत की तरह ......... '' अजीत त्रिपाठी ''

Thursday, January 20, 2011

बस विचार है


नूतन कुछ नहीं
बस विचार है
एक अदना सा
जो बन जाता है
वट वृक्ष सा
और जोड़ने लगता है
कई पुरानी
चीजों को
और हो जाता है
आविष्कार
एक नवीन
वस्तु का

एक सूक्ष्म सा विचार
बना देता है
छोटे छोटे से
पुराने
कलपुर्जों से
एक अद्भुत सौन्दर्य

वैसे ही जैसे
ईश्वर ने
पुरानी आत्मा ,
मिटटी , जल
अग्नि , वायु
से घढ़ दिया
है तुम्हे
देकर नए विचार
और उस से भी परे
मुझे दिया हुनर
परखने का
इस विचार को
प्रेम के
सानिध्य में

समझो
ईश्वर के इस विचार का
कोई
औचित्य नहीं था
जब तक
तुमसे प्रेम का
नूतन विचार
मेरे मन में ना होता
और
रह जाता तुम्हारा सौन्दर्य
अनसुना ,, अनकहा
अगर इस तरह
एक नए विचार की
उत्पत्ति के लिए
मैंने स्वयं को
ना जलाया होता
प्रेम की अग्नि में
और ना लिखा होता
आज तुम्हे
इस तरह
खुरच खुरच कर
अपने दिल पर ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

मेरी है


सरल है सौम्य है मुझसी है मेरी है
वो सुन्दरता की मूरत है ,मेरी है

सजग है ,, सादगी में समाई है वो
विचारों का सुन्दर मंथन है ,मेरी है

अदभुत सौंदर्य की मलिका का वो
जो रूप सलोना रखती है , मेरी है

एक मनचाहा सा सपर्श है खुदा का
जो मुझे अपने मन में रखती है, मेरी है

सुलभ साधारण मधुरानी सी रंगत वाली
जो मनमंदिर की देवी है हमेशा, मेरी है

एक रूप है अनोखा मेरी आँखों में
जो ख्वाबों में रहती है मेरे , मेरी है ,, '' अजीत त्रिपाठी ''

Saturday, January 15, 2011

शब्द ,,, अर्थ ,,ज्ञान

नहीं होता
हर शब्द
एक अर्थ का मालिक
जब तक वाजिब शब्द
ना मिल जाएँ उसे
उसके जैसे

वैसे ही
जैसे
ज्ञान है अज्ञान
जब तक ना समझे कोई
ज्ञान को
ज्ञान की तरह ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी'