Tuesday, June 28, 2011

मेरे बेटे ,,


विकल्प
कुछ नहीं होता
जब होते हो
जीवन संग्राम में
तब करना होता है
सिर्फ परिश्रम
अति से अति तक
सामर्थ्य के परे जाकर
रखकर सत्य का ध्यान
की जुडी है
अभिलाषाएं
आकांक्षाएं
मनौतियाँ
परिवार की

तब लेना होगा स्वयं तुम्हे
अपना निर्णय
मै शायद ना रहूँ
हर बार
चलने को तुम्हारे साथ
पकड़कर तुम्हारा हाथ

किन्तु
मेरे बेटे
ध्यान रहे
सत्य का भान करना
कर्तव्य के साथ
कदाचित भी
सत्य को
तर्क के
मोहपाश में बांधना मत
क्यूंकि
कर देता है
तर्क
बेमतलब और निरर्थक
सार्थक और सात्विक सत्य को

बुध्धि के साथ
परिवार को भी याद रखना
तभी जीवन
सफल होगा

मेरे बेटे
ये मेरे जीवन का सार नहीं
अपितु सार है
जो बताया था
मुझे
मेरे पिता ने

और
शायद तुम भी समझाते हो
मेरे प्रति ऐसा
जैसा मै जनता हूँ
की मेरे पिता
मुझसे झूठ नहीं बोलेंगे ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

Sunday, May 29, 2011

मिल जाती थी जिन्दगी




कल शुबह
मिलेंगे शायद
वहीँ
अक्सर जहाँ
मिल जाती थी
जिन्दगी मुझे
तेरी आँखों से बहती हुई
चंचलता में

मिलता था शुकून जहाँ
तुम्हारी बाहों में
और कुछ दर्द
सीने में ,,
की शुबह
बीत जाएगी
और चले जाओगे ,,,

कल मिलोगे
तो शायद
मिल जायेगी
फिर जिन्दगी
जब
भर लूँगा तुम्हे
बाहों में
या
चूम लूँगा गाल पर
या
सो जाऊँगा
रखकर गोद में सर
या
कह दूंगा दिल की बात तुमसे

समझ नहीं आता
की बन क्या से क्या गए
हर लफ्ज ,, हर पल ,, हर सांस
जिन्दगी
तुम ही शामिल हो ,,

तो ऐसा करना
की मत ढकना
हाथों से अपना चेहरा
भले ही शरमा जाओ

बस देखने देना
मुझे
खुद को जिन्दगी
ताकि देख सकूँ
तुम्हारे चेहरे पर
की कितनी हसीं लगती है
जिन्दगी
जब चाँद से चेहरे में
छुपी बैठी रहती है ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

शुबह तुम्हारे लिए,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Sunday, May 8, 2011

क्यूँ पूछते हो कौन हो


इस तरह क्यूँ मौन हो ,,
क्यूँ पूछते हो कौन हो

मन निछावर तुम पे है
तन पे तेरा नाम है
और ये जीवन भी मेरा
सिर्फ तेरे नाम है

आज तुझ पे वार दूँ
कल भी तुझको प्यार दूँ
तोड़कर मै रश्म सारी
आ नया संसार दूँ

व्यर्थ की चिंता तुझे है
व्यर्थ ही परेशान है
मै तेरे आगोश में हूँ
तू मेरा भगवान् है

क्यूँ भला तू रो रही है
क्यूँ ये आँहों का सिला
रख ले मुझे आँख में
साँसों से साँसें मिला

जब कभी कोई बात हो
सूनी सूनी रात हो
याद करना तुम मुझे
जब आँख से बरसात हो

मै हूँ तत्पर हर समय
हर घडी हर पल यहाँ
जो भी कहना हो कहो
चाहे यहाँ चाहे वहां

बस याद भर इतना रखो
ना पूछना मै कौन हूँ

मै कुछ नहीं तेरे बिना
तेरे सिवा कुछ भी नहीं
बस इसलिए मै मौन हूँ
मत पूछ की मै कौन हूँ ,,,,,,,,,,,, अजीत त्रिपाठी '''

Monday, May 2, 2011

मोहबत किस काम की

अगर तुम सी नहीं तो मोहबत किस काम की
अगर तुम्हारे साथ नहीं तो संगत किस काम की

कोई खुशबू नहीं होती गुलाब में भी मेरे यहाँ
गर तेरे पहलू में नहीं तो सोहबत किस काम की

किसी की आरजू ,हर्ज़ है, जो कर ले कोई यहाँ
गर तेरी ही नहीं, तो जुस्तजू किस काम की

मयकदे की मस्ती, तेरे होंठो की तपिश जैसी
गर वो भी नहीं हो ,तो मयकशी किस काम की

जिन्दगी की गली तेरे बालों सी घनी होनी है
गर हस्ती तू नहीं तो जिन्दगी किस काम की

''अजीत'' दिल लगाना शौक हो या महज ख्याल
दिल लगी तुझसे नहीं तो दिल्लगी किस काम की ,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

किसी से प्यार करते हो

किसी से प्यार करते हो
जिन्दगी खराब करते हो

आँखों ही आँखों में देखो
शरबत-ऐ-शराब करते हो

रोज देखते हो आसमां में
आफ़ताब, माहताब करते हो

छिपे रहते हो बाँहों में उनकी
खुद को गुलाब करते हो

''अजीत' बेमानी है जिन्दगी
उन्हें क्यूँ नाराज करते हो ,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

महिला ससक्तिकरण


क्यूँ
आखिर क्यूँ नहीं समझता
तुम्हारा लाडला

पिता दहक रहा था
बेचारी माँ पर
जिसका बेटा
किसी से प्यार करता था

आखिर क्यूँ
समझाती नहीं
की रुतबा है गली में मेरा
लोग झुक कर सलाम करते हैं
पंडित ही पंडित जी का गुणगान करते हैं

आखिर क्यूँ
नहीं समझता ये
की नीच जात की
छोरी अगर ले आया ये
तो कौन थमेगा
मेरी जवान बेटी का हाथ
कैसे मुह दिखाऊंगा मै
भरे समाज में

आखिर क्यूँ नहीं है
मेरे अपने खून को
मेरी इज्ज़त का ख़याल
प्यार करने की हिमाकत कैसे की इसने

अगर ये जिद पे अड़ा रहा तो
मौत ही है अंतिम उपचार मेरे पास
क्या चाहता है ये ,,
की मर जाऊं मै
अपनी नाक कटवाने के बाद ,

नहीं पिता जी,,
मुझे माफ़ करो

जैसे आप कहोगे वैसा ही करूँगा,,,

फिर सामजिक बन्धनों में फंस गया है कोइ

अरे समाज के ठेकेदारों
जो कहते रहते हो
की पुरुषों का समाज है ये
नारी की भी स्वतंत्रता चाहिए हैं

देख लो ,,
पुरुषों के समाज में
पुरूष ही आज़ाद नहीं
पुरूष ही सशक्त नहीं
और आप बात करते हो
महिला ससक्तिकरण की ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी'


एक छोटा सा चलचित्र देखने के बाद,,,,,,,,,,,,,,,,, इसे लिखा है तो पूर्णरूपें वही है ये ,

तुम्हारे इन्तजार में


अगर
कर सको मेरे लिए तो
रुक जाना
वहीँ
जहाँ पर
मैंने
एक उम्र गुजारी है
इस इन्तजार में की
तुम कहोगे आकर
की नहीं बन सकते मेरे
कहीं और है वो
जो मन में है तुम्हारे
किसी और के हो तुम

और इसीलिए जा रहे हो
तुम मेरी जिन्दगी से
दूर बहुत दूर

सुनो कभी मिले वक़्त
तो कह देना
फकत इतना ही
उस जगह से
जहाँ गुजारी है
मैंने एक उम्र
तुम्हारे इन्तजार में, ,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''