Monday, May 2, 2011

मोहबत किस काम की

अगर तुम सी नहीं तो मोहबत किस काम की
अगर तुम्हारे साथ नहीं तो संगत किस काम की

कोई खुशबू नहीं होती गुलाब में भी मेरे यहाँ
गर तेरे पहलू में नहीं तो सोहबत किस काम की

किसी की आरजू ,हर्ज़ है, जो कर ले कोई यहाँ
गर तेरी ही नहीं, तो जुस्तजू किस काम की

मयकदे की मस्ती, तेरे होंठो की तपिश जैसी
गर वो भी नहीं हो ,तो मयकशी किस काम की

जिन्दगी की गली तेरे बालों सी घनी होनी है
गर हस्ती तू नहीं तो जिन्दगी किस काम की

''अजीत'' दिल लगाना शौक हो या महज ख्याल
दिल लगी तुझसे नहीं तो दिल्लगी किस काम की ,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

किसी से प्यार करते हो

किसी से प्यार करते हो
जिन्दगी खराब करते हो

आँखों ही आँखों में देखो
शरबत-ऐ-शराब करते हो

रोज देखते हो आसमां में
आफ़ताब, माहताब करते हो

छिपे रहते हो बाँहों में उनकी
खुद को गुलाब करते हो

''अजीत' बेमानी है जिन्दगी
उन्हें क्यूँ नाराज करते हो ,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

महिला ससक्तिकरण


क्यूँ
आखिर क्यूँ नहीं समझता
तुम्हारा लाडला

पिता दहक रहा था
बेचारी माँ पर
जिसका बेटा
किसी से प्यार करता था

आखिर क्यूँ
समझाती नहीं
की रुतबा है गली में मेरा
लोग झुक कर सलाम करते हैं
पंडित ही पंडित जी का गुणगान करते हैं

आखिर क्यूँ
नहीं समझता ये
की नीच जात की
छोरी अगर ले आया ये
तो कौन थमेगा
मेरी जवान बेटी का हाथ
कैसे मुह दिखाऊंगा मै
भरे समाज में

आखिर क्यूँ नहीं है
मेरे अपने खून को
मेरी इज्ज़त का ख़याल
प्यार करने की हिमाकत कैसे की इसने

अगर ये जिद पे अड़ा रहा तो
मौत ही है अंतिम उपचार मेरे पास
क्या चाहता है ये ,,
की मर जाऊं मै
अपनी नाक कटवाने के बाद ,

नहीं पिता जी,,
मुझे माफ़ करो

जैसे आप कहोगे वैसा ही करूँगा,,,

फिर सामजिक बन्धनों में फंस गया है कोइ

अरे समाज के ठेकेदारों
जो कहते रहते हो
की पुरुषों का समाज है ये
नारी की भी स्वतंत्रता चाहिए हैं

देख लो ,,
पुरुषों के समाज में
पुरूष ही आज़ाद नहीं
पुरूष ही सशक्त नहीं
और आप बात करते हो
महिला ससक्तिकरण की ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी'


एक छोटा सा चलचित्र देखने के बाद,,,,,,,,,,,,,,,,, इसे लिखा है तो पूर्णरूपें वही है ये ,

तुम्हारे इन्तजार में


अगर
कर सको मेरे लिए तो
रुक जाना
वहीँ
जहाँ पर
मैंने
एक उम्र गुजारी है
इस इन्तजार में की
तुम कहोगे आकर
की नहीं बन सकते मेरे
कहीं और है वो
जो मन में है तुम्हारे
किसी और के हो तुम

और इसीलिए जा रहे हो
तुम मेरी जिन्दगी से
दूर बहुत दूर

सुनो कभी मिले वक़्त
तो कह देना
फकत इतना ही
उस जगह से
जहाँ गुजारी है
मैंने एक उम्र
तुम्हारे इन्तजार में, ,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

बुनियाद मै हूँ



निशब्द
नितांत एकांत में
मन बावरा
झुलस उठता है
करता है
चीत्कार
व्याकुल होकर
खोकर पुरानी बातों में
याद कर
वो निर्मम रातें
वो भीगी आँखें
वो संतप्त मन
वो पिपासित
तप्त तन

वो भाव
नैराश्य का
छेड़ देता है
राग
की
कुछ हासिल नहीं
सिवाए
अजनबी यादों के
जिनका हिस्सा बस हूँ मै

अजब द्वन्द है
की सिर्फ हिस्सा हूँ
उन यादों का
जिनकी
बुनियाद मै हूँ ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

चल बसी है


निश्चित
वो मुस्कुराई होगी
देखकर जाते हुए
मुझको
हारकर समाज के पूर्वाग्रहों से
निभाने अपनी वो जिम्मेदारियां
जिन्हें मै निभा लेता
उसके साथ भी
पूरी शिद्दत से ,, दिल लगाकर

बस
जाने क्यूँ तब डर गया था
की कहीं समाज में रहना
दूभर ना हो जाए
बहनों को ब्याह लूँगा की नहीं
माँ मंदिर फिर जा पायेगी की नहीं
पिता का सर ऊंचा रहेगा की नहीं

ये रुतबा रहेगा की नहीं
ये हसियत कहीं गिरेगी तो नहीं

पता नहीं किन खोखले आदर्शों पर
बलिदान कर दी मैंने
अपनी खुशियाँ
और तुम्हारा जीवन

फिर भी दुःख इस बात का नहीं
की इन सबके लिए तुमसे दूर हुआ
अचरज तो इसका है
की
इन्ही बातों में आकर
बस गया किसी और के साथ

हे मेरे भगवान् मुझे माफ़ कर

मुझे पता है
मेरे हर काम पर खुश होने वाली
मेरे गृहस्ती बसते देख
ख़ुशी से
चल बसी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, '' अजीत त्रिपाठी ''

Thursday, March 10, 2011

गर्म रोटी

गर्म रोटी


तन
टूटता हुआ
हवा के झोंको से

पेट सिकुड़ता हुआ
अधिकता से भूख की

नजर एकटक
रोटी के टुकड़ों पर
जो रख आया है हरिया
बड़े साहब की थाली में
इस आस से की
आज किसी
मेज़ पर
बचेगा कुछ
और चख लेगा
की गर्म रोटी
होगी कैसी

बड़ा द्वन्द है ये
जीवन का भी
की रोज
हजारों को
सेंककर
गरमागरम रोटियां
खिलाने वाला हरिया
खुद नहीं जनता
स्वाद
मख्खन लगी
गर्म रोटी का ,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''