Tuesday, September 28, 2010

हमारे बीच


अनगढ़ सी
अनोखी से
सुरमई , सजीली आँखें
जो छुपा ले जाती है
हर भाव
जो जुड़ा हो मुझसे
और कह देती है
ऐसा कुछ नहीं
हमारे बीच

और कहते कहते
चूम लेती है
गाल के एक कोने पर
या काट देती है
कान पर
या बना देती है
एक निशान
अपने नाख़ून से
मेरे सीने पर

अनकहे से ये भाव ही
सम्पूर्णता हो जाते हैं तब
जब लगता है
कुछ मिले सुनने को ,,
और सुनाई देने लगती है
तेज धड़कने
और भड़कती हुई सांस ,,
दिखाई देती हैं
बंद होती बिल्लोरी आँखें
सिमटता हुआ
तुम्हारा जिस्म
गोल घेरे में
मेरी बाहों के

उसी वक़्त
मै समझ जाता हूँ
आज फिर
बड़े नाज़ से
तुम अठखेलियाँ करोगे
मुझ पर
और फिर कह दोगे
उसी अल्हड़ता से ,

सुनो
गलत मत समझना
ऐसा कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,

पर सुनो
तुम्हारा वो झूट भी सच होता है
उस वक़्त कुछ नहीं होता
हमारे बीच
ना कोई दीवार
ना कोइ नियम
और हवा भी नहीं
जो अलग कर दे हमें
मिलन के उस
पल से

तुम सच मै
सच कहती हो
कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

Monday, September 20, 2010

तुम हो


तुम हो
एक द्रण संकल्पित आस मेरी, एक गहरी निराशा भी
ह्रदय की सच्ची वेदना और मेरा तमाशा भी

तुम हो
खुशियाँ भी पीर भी पिपासा भी नीर भी
उंचाई भी गहराई भी
सच भी हो और एक सच्चाई भरमाई भी

तुम हो
इन आँखों में पलता अक्स और इसकी तलाश भी
मुझसे दूर होती जमीन पास आता आकाश भी

तुम हो
सितारों की चमक और उनमे छुपा अँधियारा भी
फूलों की डगर हो काँटों का गलियारा भी

तुम हो
सूरज का तेज भी चाँद की ठंडक भी
बचपन की अल्हड़ता जवानी का मंडप भी

तुम हो
मीठा सा संगीत मेरा दर्द भरी ग़ज़ल भी
दो बाहों का घर मेरा और ताजमहल भी

तुम हो
रास्ता भी मंजिल भी चलना जो चाहे वो दिल भी
सामने नहीं शामिल भी मुमकिन नहीं और हासिल भी

तुम हो
बा-असर भी बे-असर भी बेफिक्र और बा-फिकर भी
मंजिल हो रास्ता भी निश्चय भी अगर मगर भी

शर्माती सी शर्म मेरी खुलती हुयी कुछ बातें भी
अंगडाई सी उठती सुबह भी तन्हाई की रातें भी

संतोष हो तुम साथ हो तुम और डरता हुआ अकेलापन भी
तुम सहारा की प्यास और समंदर सा अपनापन भी

तुम हो
मेरी इबादतों की पवित्रता उनमे छुपा थोडा स्वार्थ भी
कुछ मांग लेना खुदा से कुछ मेरा यथार्थ भी

तुम हो
श्रृंगार सादगी का बेसिंगार अल्हड सुन्दरता भी
मेरे मन का प्यार और उसमे छुपी नीरवता भी

तुम हो
इस दुनिया का आनंद जन्नत की मुलाक़ात भी
सवाल करती खुद में और मेरे सवालात भी

तुम हो
खाली सी फुर्सत मेरी और व्यस्त से लम्हे भी
मेरा साथ मेरे बाद और मुझसे पहले भी

तुम हो
खिलखिलाती सी हंसी मेरी मेरा करुण रुदन भी
तुम मेरी आज़ादी का आगाज पाबन्दी का चलन भी

तुम हो
लड़ता मेरा वजूद मुझसे और मेरी मुझसे सुलह भी
मर जाने की हिम्मत हो और जीने की वजह भी

तुम हो
इस दिल का खालीपन और उसकी सम्पूर्णता भी
मेरे अहसासों का सूनापन और उनकी सम्पन्नता भी

तुम हो
आस मेरी ,प्यास मेरी, जान मेरी ,जहान मेरी
ईमान मेरा ,भगवान् मेरी
तमन्ना और तरुनता भी
तुम चाँद ,तुम दुनिया , मेरे होने की वजह
मेरी सादगी ,दीवानगी, मेरी अल्हड़ता भी

तुम हो
मेरा तन मन धन , मान सम्मान, मेरा दुलार भी
मेरी हंसीखुशी ,मेरी हस्ती ,मेरा हासिल मेरा प्यार भी ,,,,,,,,, , ''अजीत त्रिपाठी''

Thursday, September 16, 2010

कल याद तुम्हारी आई थी

कुछ सहमे सहमे जज्बे थे
कुछ महफ़िल में भी रुतबे थे
कुछ किस्से नए पुराने थे
कुछ ख़ामोशी तन्हाई थी .

कल याद तुम्हारी आई थी ,


कुछ चेहरे में शरमाहट थी
कुछ रिश्तों की गर्माहट थी
कुछ सीने में था जलता हुआ
कुछ रिश्तों की अगुवाई थी ,

कल याद तुम्हारी आई थी ,


कुछ घर भी अपना अपना था
कुछ मीठा सा वो सपना था
कुछ दिल की धड़कन भड़की थी
कुछ अनदेखी पुरवाई थी ,

कल याद तुम्हारी आई थी .


कुछ मीठी मीठी बातें थी
कुछ भीगी भीगी रातें थी
कुछ दिल के अरमा मचले थे
कुछ मौसम ने आग लगाईं थी ,

कल याद तुम्हारी आई थी .


कुछ सर्द भरी रवानी थी
कुछ दर्द भरी जवानी थी
कुछ साँसे उलझी उलझी थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी .

कल याद तुम्हारी आई थी .


कुछ कहना शायद चाह रहे थे
कुछ तुमको अपना मान रहे थे
कुछ रोती रोती दुनिया थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी ,

कल याद तुम्हारी आई थी ,


कुछ तू मेरी , मै तेरा था
कुछ अपना रैन बसेरा था
कुछ बातें सुनी सुनाई थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी
कल याद तुम्हारी आई थी .


कल याद तुम्हारी आई थी ............ ''अजीत त्रिपाठी''

माफ़ करना


माफ़ करना
जिन्दगी की भागमभाग में
भागता ही रहा
समझ ही नहीं पाया
कभी भी
तुम्हारी उर्वर आँखों की
नीरवता में बसा स्नेह
तुम्हारे कोमल मन का प्यार
तुम्हारे स्पर्श की गर्मी
तुम्हारे अहसासों की नरमी

कभी महसूस ही ना कर पाया
उन फूलों की खुशबू
जो दबे रह गए हैं कहीं
किताबों में वर्क से

कभी जान ही नहीं पाया
ख़ामोशी तुम्हारी
और उन अनकही बातों के
अद्भुत अर्थ को मै

बस चलता ही रहा
चलता ही रहा
और आज जब रुका
तो देखता हूँ
इतना पाकर भी
अकेला हूँ मै
ख़ुशी नहीं ,, गम नहीं
बस मै ही हूँ यहाँ
हम नहीं
आगे बढ़ने की
निर्मम हवस में
पीछे कुछ छूट ही नहीं पाया
जो इस पड़ाव में आकर
कुछ तसल्ली दे
जो रख ले
गोद में सर और कह दे कुछ
बड़े प्यार से
किसी से कोई तकरार नहीं अब
किसी से कोई प्यार नहीं
रह गया है तो
बस एक खालीपन और अकेलापन
स्वनिर्मित ,,
स्वयम के लिए
जीवन को गुजारने का अकेले ही
तुम्हारे दिए उन गुलाबों सा
जो दबे रह गए हैं
तुम्हारे दिल की किताब में
जो कभी पढ़ी ही ,, नहीं मैंने ,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

Monday, September 6, 2010

मेरी सुबह

मेरी सुबह
थोड़ी अलसाई सी
थोड़े नखरों से भरी
थोड़ी शर्म भी है
थोड़ी नादान सी है
मुझसे परेशान सी है

मेरी सुबह
गिरा लेती है
एक लट माथे पर
उसे यकीन है
यही लट है जो
खींच लेती है मुझे
उसकी तरफ
और चूम लेता हूँ मै
उसके चाँद से मुखड़े को ,

मेरी सुबह
रोज कह देती है कुछ
कुछ ऐसा जो सही नहीं
और मै हो जाता हूँ
नाराज उस से
तब वो हंस देती है
और कह देती है
की नाराज होकर ही
ज्यादा पास आ जाता हूँ मै

मेरी सुबह
जरा बौराई सी है
ख़्वाबों की अंगडाई सी है
जीवन धारा है मेरी
जीवन की पुरवाई सी है

मेरी सुबह
मेरी है
मै उसका हूँ
उसके नाज मेरे हैं
उसके नखरे मेरे हैं
मेरा प्यार उसका है
और मेरा गुस्सा
ये तो बस मिथक है
ऐसे ही
कसकर पकड़ लेने का
उसकी बाहों को
और बहाना है
उसे भर लेने का
बाहों में
और कहने का धीरे से
इस बार तो गले लगे है
अगली बार दो पड़ भी जायेंगे
और वो हंस देती है
जानती है
की ये बस बहाना है
उसे गले लगाने का

जाने मुझे कितना समझती है
मेरी सुबह
और सिमट जाती है मुझमे
हर सुबह
मेरी सुबह ,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

Sunday, September 5, 2010

मुझे भूल जाना तुम


अब के मिलना मुझसे और मुझे भूल जाना तुम
बस हमें याद रखना ,और मुझे भूल जाना तुम



बहुत बरस हुए नहीं रोये हैं खुशियों में हम
छुपा लेना आचल में और मुझे भूल जाना तुम

तुमको पता है नाराज नहीं हूँ तुमसे , मगर सुनो
प्यार से मना लेना चूमकर और मुझे भूल जाना तुम

मै ऐसे ही रह जाता हूँ बिना कहे बहुत कुछ ,तो
मेरी आँखों में पढ़ लेना और मुझे भूल जाना तुम

यकीन हो तो साथ चलो इस सफ़र-ऐ-मोहबत में
हमसफ़र मेरे ही रहना और मुझे भूल जाना तुम

वक़्त बेवक्त का नशा है, ग़ज़ल का लिखना यूँ
खुद को पढना मेरी आँखों में और मुझे भूल जाना तुम

तुमसे खुशियाँ और तुमसे ही दुनिया है मेरी ''अजीत''
समेट लेना मुझे खुद में और मुझे भूल जाना तुम ,,, ''अजीत त्रिपाठी''

इसीलिए नहीं लिखता मै


अक्सर बात हो जाती है
की नज़्म नहीं लिखता मै
परन्तु कथा ये है की
मेरी नज्मो की व्यथा ही कुछ और है
मै लिखना चाहता हूँ कुछ
पर सिमट जाता हूँ तुम में आकर

तुम्हारा प्यार
तुम पर ऐतबार
और अब तुम्हारा इन्तजार
स्थाई तत्व हैं
मेरी नज़्म के,
पर इसमें ऐसा कुछ नहीं
जो दूसरों ने
किसी के लिए
महसूस ना किया हो
हर पल कोई ,, कहीं तो जलता है
मेरे जैसे ही ,, कोई तो पलता है

तो मेरी नज़्म भी कहीं
कही सुनी ना हो जाए
इसलिए नहीं लिखता मै,,

और शायद वो हुनर आया ही नहीं मुझमे
तुम थी तो रोज लिख देता था
एक ग़ज़ल तुम पर
पर अब वो भी नहीं लिख पाता

तो अब कोशिश करता हूँ की
एक कविता लिखूं
वो जिसमे तुम्हारा नाम ना हो
पर मुमकिन कहाँ ये भी
बिना तुम्हारे
रूप विहीन , गुण विहीन
सारगर्भित नहीं किसी के प्रेम में
किसी के आलिंगन की शर्म नहीं
किसी के निश्छल प्रेम का मर्म नहीं ,,

तो सुनो ,,
बिन तुम्हारे
मेरी कविता का श्रृंगार कहाँ से होगा
जब तुम ही नहीं रहोगी उसमे
तो किसी को उस से प्यार क्या होगा

बस इसीलिए नहीं लिखता मै ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

आज फिर




आज फिर

कुछ सपने टूटे हैं
कुछ अपने रूठें है
कुछ नमी है आँखों में
कुछ कमी हैं बातों में

आज फिर
रात रोती रही
बात होती रही
कुछ ख्वाब अलग से आये थे
कुछ याद हमें वो आये थे

आज फिर
दिन गुजरता नहीं
सफ़र कटता नहीं
कुछ रंज-ओ-गम हैं सीने में
कुछ मुश्किल सी है जीने में

आज फिर
कोई हिचकी नहीं
किसी की सिसकी नहीं
कुछ दूर दूर से रह गए हम
कुछ मजबूर से रह गए हम

आज फिर
मोहब्बत परेशान सी ही
वफ़ा नादान सी है
कुछ है शायद इस दिल में भी
कुछ तेरा है इस दिल में भी

आज फिर
ऐसे ही गुजर गया सब
जो अपना है पर अपना नहीं
कुछ जो तुम्हे कहना था
कुछ जो तुमसे सुनना था

आज फिर
एक नाकाम सी कोशिश है
तुम्हे याद करने की
की शायद आये तुम्हे
कोई हिचकी
और तुम यकीन करो
वो मेरे कारन है
बस याद किये जा रहा हूँ
की शायद तुम्हे याद आऊं
वैसे ही जैसे याद आता था कभी

वैसे ही
याद आऊं
तुम्हे
आज फिर ,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

किसी के साथ


यूँ भी अजब जिन्दगी में खैरात मिली है
की मोहब्बत में जीने को एक रात मिली है

अजब हाल है की आशिकी खामोश बहुत है
और कहने को दिल की हर बात मिली है

मै मुकम्मल इश्क नहीं , पर्दा हूँ वफाओं का
न रोऊँ न हंसू ये अजब सौगात मिली है

वो मिलती है पर मिल के भी मिलती नहीं
जब भी मिली वो, किसी के साथ मिली है

मै मायूस नहीं ,ग़मज़दा भी नहीं हूँ ''अजीत''
ये बात भी क्या कम की ये रात मिली है ................ ''अजीत त्रिपाठी''

मगर याद नहीं

वो मौशिकी भी थी मगर याद नहीं
वो आशिकी भी थी मगर याद नहीं

वो निशां जिसका छुपा है दिल में
वो जिन्दगी भी थी मगर याद नहीं

वो जिसकी कुर्बतें इनायतें जिसकी
वो बंदगी भी थी मगर याद नहीं

वो जिसका रूठना बदनामी है मेरी
वो शर्मिंदगी भी थी मगर याद नहीं

वो जिसकी राह के कांटे भी चुन लिए
शायद, वो रुकी भी थी मगर याद नहीं

वो जो जान है जीने का सबब ''अजीत''
वो दिलनशीं भी थी मगर याद नहीं '' ''अजीत त्रिपाठी''

आया दिल में


बाद मुद्दतों ये सवाल आया दिल में
क्यूँकर रात तेरा ख्याल आया दिल में

एक उम्र हुए तुझसे बिछड़े हुए हमें , पर
जब आया तू , बेमिसाल आया दिल में

दिन गुजरे महीने भी गुजरते रहे यहाँ
पर याद तू हर साल आया दिल में

बरसों बिन साँसों के सांस लेते रहे हैं
जो तू आया, एक उछाल आया दिल में

थी तमन्ना तेरी दीद को ना जाने कबसे
''अजीत'' आज ये बड़ा कमाल आया दिल में ... ''अजीत त्रिपाठी''

सवर गया होगा


चांदनी रात में वो और सवर गया होगा
प्यार है दिल में धीरे से उतर गया होगा

मधुर मोहक है सम्मोहक इस कदर
छा गया होगा जिधर गया होगा

वो जिसके नूर से रोशन है जहाँ
आज चाँद पर वो भ्रमर गया होगा

वो जिसके दीद से सवरती है जिन्दगी
आज आईने में देख खुद तर गया होगा

वो शमा है जो दिल की धड़कन है
जला जो परवाना आज मर गया होगा

कोई कहाँ है तुझसा महफ़िल में यहाँ
मेरा , मै , जाने किधर गया होगा

न उदास हो महफ़िल तुझसे ही रहेंगी
ग़ज़लें''अजीत' तेरे नाम कर गया होगा ..''अजीत त्रिपाठी''

हौसले ईजाद हों


कब तलक यूँ याद और ,,कब तलक फ़रियाद हों
तुम नहीं हो पास तो , क्यूँ सनम बरबाद हों

क्यूँ गिरफ्तें यूँ मोहब्बत ,, की हमें हासिल रहें
अब जरा हम सांस लें की ,, फैसले आज़ाद हों

बेईमानी आशिकी और ,, बेवजह ज़ज्बात ये
हम रहे ना तुम रहे , क्यूँ यूँ ही नाशाद हों

हम गरीबों के हवाले , कब कहाँ एक नूर है
फिर नसीबों में यूँ ही , कुछ हौसले ईजाद हों

बात मानो या ना मानो 'अजीत' मोहब्बत क्या करना
और भी मसले बहुत ,, क्यूँ ऐसे ही बरबाद हों ......... ''अजीत त्रिपाठी''

कैसे आज सुनाऊं रब


अफसाना एक दर्द का है तुझे कैसे आज सुनाऊं रब
दर्द भरे इन गीतों से तुझे कैसे आज भुलाऊं रब

फूलों की खुशबू भी है और थोड़ी सी ख़ामोशी भी
चाक जिगर के टुकड़ों से तुझे कैसे आज सजाऊं रब

रंज बहुत हैं अरमां के और दिल भी जलता रहता है
खाक नशीं होकर अब मै तुझे कैसे आज बुलाऊं रब

कुछ ना मिला मुझे तुझसे भी तेरी दुनिया भी मेरी नहीं
क्यूँ सजदे करूँ, आयतें पढूं तुझे कैसे आज निभाऊं रब

मेरी किस्मत मेरी नहीं और मेरा मुझमे कुछ भी नहीं
मेरा दुःख साथी है मेरा ,तुझे कैसे आज बताऊँ रब

देना हो अगर तो गम दे दे यूँ खुशियाँ और ना देना अब
एक और नजर दे दे मुझको ,तुझे कैसे आज दिखाऊं रब ,, ''अजीत त्रिपाठी''

शायद

[blue]शायद
कुछ कह देती हो तन्हाई
या हंस पड़ते हो कभी
कुछ याद करके

शायद
आँखें भर आती हों
धड़कने बढ़ जाती हों
मेरी बात करके

शायद
याद करती हो मुझे
और गिर जाती हो एक लट
कोई फ़रियाद करके

शायद
कोई सुना देता हो
मेरी कोई ग़ज़ल
तुम्हारे नाम करके

शायद
शायद ऐसा होता हो
मै तो बस सोच सकता हूँ
रो सकता हूँ
तुम्हे याद करके
या लिख सकता हूँ
कोई ग़ज़ल
कोई नज़्म
तुम्हारे नाज पे ,, तुम्हारे नखरे पे
या शायद कह दूँ
अँधेरी रातों में
एक ठंडा सा झोंका हवा का तुम्हे
जो खो गया है
सुबह होते ही

शायद कोई बता दे तुम्हे
की
कितनी शिद्दत से
तुम्हे याद करता हूँ मै
शायद कोई बता दे तुम्हे
की
दिल धडकता है
अब भी तुम्हारे लिए
और जाग जाएँ
तुम्हारे भी जज्बात
मेरे लिए
पहले जैसे ही

शायद ऐसा हो ,,,,
शायद,,, ''अजीत त्रिपाठी'' [blue]