अनगढ़ सी
अनोखी से
सुरमई , सजीली आँखें
जो छुपा ले जाती है
हर भाव
जो जुड़ा हो मुझसे
और कह देती है
ऐसा कुछ नहीं
हमारे बीच
और कहते कहते
चूम लेती है
गाल के एक कोने पर
या काट देती है
कान पर
या बना देती है
एक निशान
अपने नाख़ून से
मेरे सीने पर
अनकहे से ये भाव ही
सम्पूर्णता हो जाते हैं तब
जब लगता है
कुछ मिले सुनने को ,,
और सुनाई देने लगती है
तेज धड़कने
और भड़कती हुई सांस ,,
दिखाई देती हैं
बंद होती बिल्लोरी आँखें
सिमटता हुआ
तुम्हारा जिस्म
गोल घेरे में
मेरी बाहों के
उसी वक़्त
मै समझ जाता हूँ
आज फिर
बड़े नाज़ से
तुम अठखेलियाँ करोगे
मुझ पर
और फिर कह दोगे
उसी अल्हड़ता से ,
सुनो
गलत मत समझना
ऐसा कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,
पर सुनो
तुम्हारा वो झूट भी सच होता है
उस वक़्त कुछ नहीं होता
हमारे बीच
ना कोई दीवार
ना कोइ नियम
और हवा भी नहीं
जो अलग कर दे हमें
मिलन के उस
पल से
तुम सच मै
सच कहती हो
कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
अनोखी से
सुरमई , सजीली आँखें
जो छुपा ले जाती है
हर भाव
जो जुड़ा हो मुझसे
और कह देती है
ऐसा कुछ नहीं
हमारे बीच
और कहते कहते
चूम लेती है
गाल के एक कोने पर
या काट देती है
कान पर
या बना देती है
एक निशान
अपने नाख़ून से
मेरे सीने पर
अनकहे से ये भाव ही
सम्पूर्णता हो जाते हैं तब
जब लगता है
कुछ मिले सुनने को ,,
और सुनाई देने लगती है
तेज धड़कने
और भड़कती हुई सांस ,,
दिखाई देती हैं
बंद होती बिल्लोरी आँखें
सिमटता हुआ
तुम्हारा जिस्म
गोल घेरे में
मेरी बाहों के
उसी वक़्त
मै समझ जाता हूँ
आज फिर
बड़े नाज़ से
तुम अठखेलियाँ करोगे
मुझ पर
और फिर कह दोगे
उसी अल्हड़ता से ,
सुनो
गलत मत समझना
ऐसा कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,
पर सुनो
तुम्हारा वो झूट भी सच होता है
उस वक़्त कुछ नहीं होता
हमारे बीच
ना कोई दीवार
ना कोइ नियम
और हवा भी नहीं
जो अलग कर दे हमें
मिलन के उस
पल से
तुम सच मै
सच कहती हो
कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''