Sunday, September 5, 2010

कैसे आज सुनाऊं रब


अफसाना एक दर्द का है तुझे कैसे आज सुनाऊं रब
दर्द भरे इन गीतों से तुझे कैसे आज भुलाऊं रब

फूलों की खुशबू भी है और थोड़ी सी ख़ामोशी भी
चाक जिगर के टुकड़ों से तुझे कैसे आज सजाऊं रब

रंज बहुत हैं अरमां के और दिल भी जलता रहता है
खाक नशीं होकर अब मै तुझे कैसे आज बुलाऊं रब

कुछ ना मिला मुझे तुझसे भी तेरी दुनिया भी मेरी नहीं
क्यूँ सजदे करूँ, आयतें पढूं तुझे कैसे आज निभाऊं रब

मेरी किस्मत मेरी नहीं और मेरा मुझमे कुछ भी नहीं
मेरा दुःख साथी है मेरा ,तुझे कैसे आज बताऊँ रब

देना हो अगर तो गम दे दे यूँ खुशियाँ और ना देना अब
एक और नजर दे दे मुझको ,तुझे कैसे आज दिखाऊं रब ,, ''अजीत त्रिपाठी''

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