Sunday, September 5, 2010

शायद

[blue]शायद
कुछ कह देती हो तन्हाई
या हंस पड़ते हो कभी
कुछ याद करके

शायद
आँखें भर आती हों
धड़कने बढ़ जाती हों
मेरी बात करके

शायद
याद करती हो मुझे
और गिर जाती हो एक लट
कोई फ़रियाद करके

शायद
कोई सुना देता हो
मेरी कोई ग़ज़ल
तुम्हारे नाम करके

शायद
शायद ऐसा होता हो
मै तो बस सोच सकता हूँ
रो सकता हूँ
तुम्हे याद करके
या लिख सकता हूँ
कोई ग़ज़ल
कोई नज़्म
तुम्हारे नाज पे ,, तुम्हारे नखरे पे
या शायद कह दूँ
अँधेरी रातों में
एक ठंडा सा झोंका हवा का तुम्हे
जो खो गया है
सुबह होते ही

शायद कोई बता दे तुम्हे
की
कितनी शिद्दत से
तुम्हे याद करता हूँ मै
शायद कोई बता दे तुम्हे
की
दिल धडकता है
अब भी तुम्हारे लिए
और जाग जाएँ
तुम्हारे भी जज्बात
मेरे लिए
पहले जैसे ही

शायद ऐसा हो ,,,,
शायद,,, ''अजीत त्रिपाठी'' [blue]

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