Sunday, September 5, 2010

इसीलिए नहीं लिखता मै


अक्सर बात हो जाती है
की नज़्म नहीं लिखता मै
परन्तु कथा ये है की
मेरी नज्मो की व्यथा ही कुछ और है
मै लिखना चाहता हूँ कुछ
पर सिमट जाता हूँ तुम में आकर

तुम्हारा प्यार
तुम पर ऐतबार
और अब तुम्हारा इन्तजार
स्थाई तत्व हैं
मेरी नज़्म के,
पर इसमें ऐसा कुछ नहीं
जो दूसरों ने
किसी के लिए
महसूस ना किया हो
हर पल कोई ,, कहीं तो जलता है
मेरे जैसे ही ,, कोई तो पलता है

तो मेरी नज़्म भी कहीं
कही सुनी ना हो जाए
इसलिए नहीं लिखता मै,,

और शायद वो हुनर आया ही नहीं मुझमे
तुम थी तो रोज लिख देता था
एक ग़ज़ल तुम पर
पर अब वो भी नहीं लिख पाता

तो अब कोशिश करता हूँ की
एक कविता लिखूं
वो जिसमे तुम्हारा नाम ना हो
पर मुमकिन कहाँ ये भी
बिना तुम्हारे
रूप विहीन , गुण विहीन
सारगर्भित नहीं किसी के प्रेम में
किसी के आलिंगन की शर्म नहीं
किसी के निश्छल प्रेम का मर्म नहीं ,,

तो सुनो ,,
बिन तुम्हारे
मेरी कविता का श्रृंगार कहाँ से होगा
जब तुम ही नहीं रहोगी उसमे
तो किसी को उस से प्यार क्या होगा

बस इसीलिए नहीं लिखता मै ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

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