मेरी सुबह
थोड़ी अलसाई सी
थोड़े नखरों से भरी
थोड़ी शर्म भी है
थोड़ी नादान सी है
मुझसे परेशान सी है
मेरी सुबह
गिरा लेती है
एक लट माथे पर
उसे यकीन है
यही लट है जो
खींच लेती है मुझे
उसकी तरफ
और चूम लेता हूँ मै
उसके चाँद से मुखड़े को ,
मेरी सुबह
रोज कह देती है कुछ
कुछ ऐसा जो सही नहीं
और मै हो जाता हूँ
नाराज उस से
तब वो हंस देती है
और कह देती है
की नाराज होकर ही
ज्यादा पास आ जाता हूँ मै
मेरी सुबह
जरा बौराई सी है
ख़्वाबों की अंगडाई सी है
जीवन धारा है मेरी
जीवन की पुरवाई सी है
मेरी सुबह
मेरी है
मै उसका हूँ
उसके नाज मेरे हैं
उसके नखरे मेरे हैं
मेरा प्यार उसका है
और मेरा गुस्सा
ये तो बस मिथक है
ऐसे ही
कसकर पकड़ लेने का
उसकी बाहों को
और बहाना है
उसे भर लेने का
बाहों में
और कहने का धीरे से
इस बार तो गले लगे है
अगली बार दो पड़ भी जायेंगे
और वो हंस देती है
जानती है
की ये बस बहाना है
उसे गले लगाने का
जाने मुझे कितना समझती है
मेरी सुबह
और सिमट जाती है मुझमे
हर सुबह
मेरी सुबह ,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
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