Monday, September 20, 2010

तुम हो


तुम हो
एक द्रण संकल्पित आस मेरी, एक गहरी निराशा भी
ह्रदय की सच्ची वेदना और मेरा तमाशा भी

तुम हो
खुशियाँ भी पीर भी पिपासा भी नीर भी
उंचाई भी गहराई भी
सच भी हो और एक सच्चाई भरमाई भी

तुम हो
इन आँखों में पलता अक्स और इसकी तलाश भी
मुझसे दूर होती जमीन पास आता आकाश भी

तुम हो
सितारों की चमक और उनमे छुपा अँधियारा भी
फूलों की डगर हो काँटों का गलियारा भी

तुम हो
सूरज का तेज भी चाँद की ठंडक भी
बचपन की अल्हड़ता जवानी का मंडप भी

तुम हो
मीठा सा संगीत मेरा दर्द भरी ग़ज़ल भी
दो बाहों का घर मेरा और ताजमहल भी

तुम हो
रास्ता भी मंजिल भी चलना जो चाहे वो दिल भी
सामने नहीं शामिल भी मुमकिन नहीं और हासिल भी

तुम हो
बा-असर भी बे-असर भी बेफिक्र और बा-फिकर भी
मंजिल हो रास्ता भी निश्चय भी अगर मगर भी

शर्माती सी शर्म मेरी खुलती हुयी कुछ बातें भी
अंगडाई सी उठती सुबह भी तन्हाई की रातें भी

संतोष हो तुम साथ हो तुम और डरता हुआ अकेलापन भी
तुम सहारा की प्यास और समंदर सा अपनापन भी

तुम हो
मेरी इबादतों की पवित्रता उनमे छुपा थोडा स्वार्थ भी
कुछ मांग लेना खुदा से कुछ मेरा यथार्थ भी

तुम हो
श्रृंगार सादगी का बेसिंगार अल्हड सुन्दरता भी
मेरे मन का प्यार और उसमे छुपी नीरवता भी

तुम हो
इस दुनिया का आनंद जन्नत की मुलाक़ात भी
सवाल करती खुद में और मेरे सवालात भी

तुम हो
खाली सी फुर्सत मेरी और व्यस्त से लम्हे भी
मेरा साथ मेरे बाद और मुझसे पहले भी

तुम हो
खिलखिलाती सी हंसी मेरी मेरा करुण रुदन भी
तुम मेरी आज़ादी का आगाज पाबन्दी का चलन भी

तुम हो
लड़ता मेरा वजूद मुझसे और मेरी मुझसे सुलह भी
मर जाने की हिम्मत हो और जीने की वजह भी

तुम हो
इस दिल का खालीपन और उसकी सम्पूर्णता भी
मेरे अहसासों का सूनापन और उनकी सम्पन्नता भी

तुम हो
आस मेरी ,प्यास मेरी, जान मेरी ,जहान मेरी
ईमान मेरा ,भगवान् मेरी
तमन्ना और तरुनता भी
तुम चाँद ,तुम दुनिया , मेरे होने की वजह
मेरी सादगी ,दीवानगी, मेरी अल्हड़ता भी

तुम हो
मेरा तन मन धन , मान सम्मान, मेरा दुलार भी
मेरी हंसीखुशी ,मेरी हस्ती ,मेरा हासिल मेरा प्यार भी ,,,,,,,,, , ''अजीत त्रिपाठी''

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