Thursday, September 16, 2010

कल याद तुम्हारी आई थी

कुछ सहमे सहमे जज्बे थे
कुछ महफ़िल में भी रुतबे थे
कुछ किस्से नए पुराने थे
कुछ ख़ामोशी तन्हाई थी .

कल याद तुम्हारी आई थी ,


कुछ चेहरे में शरमाहट थी
कुछ रिश्तों की गर्माहट थी
कुछ सीने में था जलता हुआ
कुछ रिश्तों की अगुवाई थी ,

कल याद तुम्हारी आई थी ,


कुछ घर भी अपना अपना था
कुछ मीठा सा वो सपना था
कुछ दिल की धड़कन भड़की थी
कुछ अनदेखी पुरवाई थी ,

कल याद तुम्हारी आई थी .


कुछ मीठी मीठी बातें थी
कुछ भीगी भीगी रातें थी
कुछ दिल के अरमा मचले थे
कुछ मौसम ने आग लगाईं थी ,

कल याद तुम्हारी आई थी .


कुछ सर्द भरी रवानी थी
कुछ दर्द भरी जवानी थी
कुछ साँसे उलझी उलझी थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी .

कल याद तुम्हारी आई थी .


कुछ कहना शायद चाह रहे थे
कुछ तुमको अपना मान रहे थे
कुछ रोती रोती दुनिया थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी ,

कल याद तुम्हारी आई थी ,


कुछ तू मेरी , मै तेरा था
कुछ अपना रैन बसेरा था
कुछ बातें सुनी सुनाई थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी
कल याद तुम्हारी आई थी .


कल याद तुम्हारी आई थी ............ ''अजीत त्रिपाठी''

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