जिन्दगी की भागमभाग में
भागता ही रहा
समझ ही नहीं पाया
कभी भी
तुम्हारी उर्वर आँखों की
नीरवता में बसा स्नेह
तुम्हारे कोमल मन का प्यार
तुम्हारे स्पर्श की गर्मी
तुम्हारे अहसासों की नरमी
कभी महसूस ही ना कर पाया
उन फूलों की खुशबू
जो दबे रह गए हैं कहीं
किताबों में वर्क से
कभी जान ही नहीं पाया
ख़ामोशी तुम्हारी
और उन अनकही बातों के
अद्भुत अर्थ को मै
बस चलता ही रहा
चलता ही रहा
और आज जब रुका
तो देखता हूँ
इतना पाकर भी
अकेला हूँ मै
ख़ुशी नहीं ,, गम नहीं
बस मै ही हूँ यहाँ
हम नहीं
आगे बढ़ने की
निर्मम हवस में
पीछे कुछ छूट ही नहीं पाया
जो इस पड़ाव में आकर
कुछ तसल्ली दे
जो रख ले
गोद में सर और कह दे कुछ
बड़े प्यार से
किसी से कोई तकरार नहीं अब
किसी से कोई प्यार नहीं
रह गया है तो
बस एक खालीपन और अकेलापन
स्वनिर्मित ,,
स्वयम के लिए
जीवन को गुजारने का अकेले ही
तुम्हारे दिए उन गुलाबों सा
जो दबे रह गए हैं
तुम्हारे दिल की किताब में
जो कभी पढ़ी ही ,, नहीं मैंने ,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
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