Friday, August 12, 2011

कल शाम से ही


कल शाम से ही
झगड़ रही हो
की क्या सोचता रहता हूँ
तुम्हारे सिवा
ऐसे ही
अकेले मैं बैठकर
और मै थक गया हूँ
बताते बताते
की कुछ नहीं
तुम्हारे सिवा
समझा करो
और क्या है
जिसे सीने से लगाकर
ख़ुशी की तरह
दर्द में भी हंसने की वजह जैसा
समझ सकूँ मै
तुम्हारे सिवा

देखो
सुन लो
जो लड़ रही हो ना इस तरह शाम से ही
तो कल रात
ख्वाब में भी नहीं आई तुम
वजह तुम ही हो
,,
मैंने तो देखा है
अपने अंतर्मन में
हमेशा
तुम्हे ही
मुस्कुराते हुए
तो
तुम ही बताओ
कैसे आओगी
मेरे ख़्वाबों में
जबकि तुम
कल शाम से ही
झगड़ रही हो ,,,,,,, '' अजीत त्रिपाठी ''

Tuesday, August 9, 2011

मै अजीत त्रिपाठी



कर्म विहीन ,,
कर्तव्य विहीन
नितांत एकांत में
ढूँढता हूँ
प्रतिउत्तर
एक अवांछित प्रश्न का
की कौन हूँ मै

जबकि पढ़ लिए वेड और पुराण
गीता और कुरआन भी
सभी ने बताया भी है
की ''मै'' कुछ नहीं
एक भ्रम मात्र है
होने का
यहाँ तो चराचर में
सभी हैं प्रायोजित
उस परमसत्ता से
किसी एक
सार्थक कर्म के लिए
किन्तु इस बात से भी
संतुष्ट नहीं हूँ
मै ''अजीत त्रिपाठी

ढूँढता हूँ
उत्तर
की प्रयोजन क्या है
मेरे होने का
और हर बार
हार जाता हूँ
उस परम सत्ता से
जो अनकहे ही
सुना जाती है
की '' मै '' को ढूँढना
मेरा प्रयोजन नहीं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Wednesday, July 6, 2011

अजीत'' मेरा होते हुए भी

लौट आया हूँ
एक अरसे बाद
उसी मकान में
जहाँ तुमने कह दिया था
की अब बस
बहुत हुआ
नहीं होगा
वैसा जैसा
चाहते हो तुम

और मै नादान
मान बैठा तुम्हारी
ये बात भी
की नहीं मिलोगी

तुम्हे मनाने का
अंतिम प्रयास भी
ना हुआ मुझसे
बस चला गया
और चलता रहा एक अरसे तक

और आज आया हूँ तो
सदी से सूनी पड़ी
दीवारें चीखने लगी हैं
मन आहत हुआ जा रहा है
इतने चीत्कार
कब मैंने छोड़े यहाँ
जो मुझे इस तरह से चिड़ा रहे हैं

की अचानक
सड़े दरवाजे से
झाँक उठा एक ख़त
जाने किसने भेजा होगा
दरवाजा खोलने को हुआ
की
समूचा गिर पड़ा
खवाबों के आशियाने सा

जाने कितने और ख़त थे
तुम्हारी खुशबू से भरे हुए
पड़े हुए सूने आँगन में
जहाँ बरसों तक
कोई आया ही ना था

बूढा डाकिया डाल जाता था
हर रोज तुम्हारा ख़त
जिसमे होता था
मान मनुहार
की लौट आऊं मै
तुम्हारी बाहों में
खेलने को तुम्हारे बालों से
भरने को तुम्हारा दामन
खुशियों से

और मै तो
वहां था ही नहीं

अचानक ही आँख भर उठी है
देखो
तुमने ही किया था मुझे
ऐसा
की तुम्हारी हर बात मान जाया करता था
उस अंतिम बार में
तुमने ही तो कहा था
की अब और नहीं तुम्हारा साथ
फिर क्या करता मै
उस जगह ,, जहाँ होकर ,,
तुम मेरी नहीं हो सकती
इस से अच्छा तो एकांत ही है

सुनो
अगर तुम्हे मान ही जाना था
तो
कर देती बस एक इशारा
उसी दिन
जब बड़ी देर तक रोते हुए
निकला था मै
इस जगह से
जहाँ मै आज खड़ा हूँ
रोते हुए
तुम्हारे उन खतों के साथ
जो आज
मेरे पास होकर भी
लग रहे हैं
की
ये मुझ तक पहुंचे ही नहीं
जैसे नहीं पहुंचा
तुम्हारा प्रेम मुझ तक
मेरा होते हुए भी ,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी '''

Tuesday, July 5, 2011

नव श्रृष्टि



अन्धकार
निरंतर नहीं है
वस्तुतः है ये
सिर्फ एक बिम्ब
जो बन गया है
रौशनी के
पलक में छुपते ही
हटना ही इसका
एकमात्र विकल्प है
बस करना है
तुम्हे स्वयं पर विश्वास
की हर स्वाश के साथ
ये अन्धकार कम होगा
अन्यथा
तुम्हारी साँसों की गर्मी
जलाकर इसे
दिव्य ज्योति सी बनेगी

बस रखना है तुम्हे विस्वास
की
तुम्हारी सामर्थ्य
तुम्हारा मनोबल
तुम्हारा पुरुषार्थ
तुम्हारा ध्यान
सर्वेष्ठ को पाने का
सर्वोत्तम साध्य है

बस इसी धेय से
आगे बढ़ मानव
नव श्रृष्टि
उजालों के सागर के साथ
इन्तजार में खड़ी है '' अजीत त्रिपाठी ''

Tuesday, June 28, 2011

मेरे बेटे ,,


विकल्प
कुछ नहीं होता
जब होते हो
जीवन संग्राम में
तब करना होता है
सिर्फ परिश्रम
अति से अति तक
सामर्थ्य के परे जाकर
रखकर सत्य का ध्यान
की जुडी है
अभिलाषाएं
आकांक्षाएं
मनौतियाँ
परिवार की

तब लेना होगा स्वयं तुम्हे
अपना निर्णय
मै शायद ना रहूँ
हर बार
चलने को तुम्हारे साथ
पकड़कर तुम्हारा हाथ

किन्तु
मेरे बेटे
ध्यान रहे
सत्य का भान करना
कर्तव्य के साथ
कदाचित भी
सत्य को
तर्क के
मोहपाश में बांधना मत
क्यूंकि
कर देता है
तर्क
बेमतलब और निरर्थक
सार्थक और सात्विक सत्य को

बुध्धि के साथ
परिवार को भी याद रखना
तभी जीवन
सफल होगा

मेरे बेटे
ये मेरे जीवन का सार नहीं
अपितु सार है
जो बताया था
मुझे
मेरे पिता ने

और
शायद तुम भी समझाते हो
मेरे प्रति ऐसा
जैसा मै जनता हूँ
की मेरे पिता
मुझसे झूठ नहीं बोलेंगे ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''

Sunday, May 29, 2011

मिल जाती थी जिन्दगी




कल शुबह
मिलेंगे शायद
वहीँ
अक्सर जहाँ
मिल जाती थी
जिन्दगी मुझे
तेरी आँखों से बहती हुई
चंचलता में

मिलता था शुकून जहाँ
तुम्हारी बाहों में
और कुछ दर्द
सीने में ,,
की शुबह
बीत जाएगी
और चले जाओगे ,,,

कल मिलोगे
तो शायद
मिल जायेगी
फिर जिन्दगी
जब
भर लूँगा तुम्हे
बाहों में
या
चूम लूँगा गाल पर
या
सो जाऊँगा
रखकर गोद में सर
या
कह दूंगा दिल की बात तुमसे

समझ नहीं आता
की बन क्या से क्या गए
हर लफ्ज ,, हर पल ,, हर सांस
जिन्दगी
तुम ही शामिल हो ,,

तो ऐसा करना
की मत ढकना
हाथों से अपना चेहरा
भले ही शरमा जाओ

बस देखने देना
मुझे
खुद को जिन्दगी
ताकि देख सकूँ
तुम्हारे चेहरे पर
की कितनी हसीं लगती है
जिन्दगी
जब चाँद से चेहरे में
छुपी बैठी रहती है ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

शुबह तुम्हारे लिए,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

Sunday, May 8, 2011

क्यूँ पूछते हो कौन हो


इस तरह क्यूँ मौन हो ,,
क्यूँ पूछते हो कौन हो

मन निछावर तुम पे है
तन पे तेरा नाम है
और ये जीवन भी मेरा
सिर्फ तेरे नाम है

आज तुझ पे वार दूँ
कल भी तुझको प्यार दूँ
तोड़कर मै रश्म सारी
आ नया संसार दूँ

व्यर्थ की चिंता तुझे है
व्यर्थ ही परेशान है
मै तेरे आगोश में हूँ
तू मेरा भगवान् है

क्यूँ भला तू रो रही है
क्यूँ ये आँहों का सिला
रख ले मुझे आँख में
साँसों से साँसें मिला

जब कभी कोई बात हो
सूनी सूनी रात हो
याद करना तुम मुझे
जब आँख से बरसात हो

मै हूँ तत्पर हर समय
हर घडी हर पल यहाँ
जो भी कहना हो कहो
चाहे यहाँ चाहे वहां

बस याद भर इतना रखो
ना पूछना मै कौन हूँ

मै कुछ नहीं तेरे बिना
तेरे सिवा कुछ भी नहीं
बस इसलिए मै मौन हूँ
मत पूछ की मै कौन हूँ ,,,,,,,,,,,, अजीत त्रिपाठी '''

Monday, May 2, 2011

मोहबत किस काम की

अगर तुम सी नहीं तो मोहबत किस काम की
अगर तुम्हारे साथ नहीं तो संगत किस काम की

कोई खुशबू नहीं होती गुलाब में भी मेरे यहाँ
गर तेरे पहलू में नहीं तो सोहबत किस काम की

किसी की आरजू ,हर्ज़ है, जो कर ले कोई यहाँ
गर तेरी ही नहीं, तो जुस्तजू किस काम की

मयकदे की मस्ती, तेरे होंठो की तपिश जैसी
गर वो भी नहीं हो ,तो मयकशी किस काम की

जिन्दगी की गली तेरे बालों सी घनी होनी है
गर हस्ती तू नहीं तो जिन्दगी किस काम की

''अजीत'' दिल लगाना शौक हो या महज ख्याल
दिल लगी तुझसे नहीं तो दिल्लगी किस काम की ,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

किसी से प्यार करते हो

किसी से प्यार करते हो
जिन्दगी खराब करते हो

आँखों ही आँखों में देखो
शरबत-ऐ-शराब करते हो

रोज देखते हो आसमां में
आफ़ताब, माहताब करते हो

छिपे रहते हो बाँहों में उनकी
खुद को गुलाब करते हो

''अजीत' बेमानी है जिन्दगी
उन्हें क्यूँ नाराज करते हो ,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

महिला ससक्तिकरण


क्यूँ
आखिर क्यूँ नहीं समझता
तुम्हारा लाडला

पिता दहक रहा था
बेचारी माँ पर
जिसका बेटा
किसी से प्यार करता था

आखिर क्यूँ
समझाती नहीं
की रुतबा है गली में मेरा
लोग झुक कर सलाम करते हैं
पंडित ही पंडित जी का गुणगान करते हैं

आखिर क्यूँ
नहीं समझता ये
की नीच जात की
छोरी अगर ले आया ये
तो कौन थमेगा
मेरी जवान बेटी का हाथ
कैसे मुह दिखाऊंगा मै
भरे समाज में

आखिर क्यूँ नहीं है
मेरे अपने खून को
मेरी इज्ज़त का ख़याल
प्यार करने की हिमाकत कैसे की इसने

अगर ये जिद पे अड़ा रहा तो
मौत ही है अंतिम उपचार मेरे पास
क्या चाहता है ये ,,
की मर जाऊं मै
अपनी नाक कटवाने के बाद ,

नहीं पिता जी,,
मुझे माफ़ करो

जैसे आप कहोगे वैसा ही करूँगा,,,

फिर सामजिक बन्धनों में फंस गया है कोइ

अरे समाज के ठेकेदारों
जो कहते रहते हो
की पुरुषों का समाज है ये
नारी की भी स्वतंत्रता चाहिए हैं

देख लो ,,
पुरुषों के समाज में
पुरूष ही आज़ाद नहीं
पुरूष ही सशक्त नहीं
और आप बात करते हो
महिला ससक्तिकरण की ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी'


एक छोटा सा चलचित्र देखने के बाद,,,,,,,,,,,,,,,,, इसे लिखा है तो पूर्णरूपें वही है ये ,

तुम्हारे इन्तजार में


अगर
कर सको मेरे लिए तो
रुक जाना
वहीँ
जहाँ पर
मैंने
एक उम्र गुजारी है
इस इन्तजार में की
तुम कहोगे आकर
की नहीं बन सकते मेरे
कहीं और है वो
जो मन में है तुम्हारे
किसी और के हो तुम

और इसीलिए जा रहे हो
तुम मेरी जिन्दगी से
दूर बहुत दूर

सुनो कभी मिले वक़्त
तो कह देना
फकत इतना ही
उस जगह से
जहाँ गुजारी है
मैंने एक उम्र
तुम्हारे इन्तजार में, ,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

बुनियाद मै हूँ



निशब्द
नितांत एकांत में
मन बावरा
झुलस उठता है
करता है
चीत्कार
व्याकुल होकर
खोकर पुरानी बातों में
याद कर
वो निर्मम रातें
वो भीगी आँखें
वो संतप्त मन
वो पिपासित
तप्त तन

वो भाव
नैराश्य का
छेड़ देता है
राग
की
कुछ हासिल नहीं
सिवाए
अजनबी यादों के
जिनका हिस्सा बस हूँ मै

अजब द्वन्द है
की सिर्फ हिस्सा हूँ
उन यादों का
जिनकी
बुनियाद मै हूँ ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

चल बसी है


निश्चित
वो मुस्कुराई होगी
देखकर जाते हुए
मुझको
हारकर समाज के पूर्वाग्रहों से
निभाने अपनी वो जिम्मेदारियां
जिन्हें मै निभा लेता
उसके साथ भी
पूरी शिद्दत से ,, दिल लगाकर

बस
जाने क्यूँ तब डर गया था
की कहीं समाज में रहना
दूभर ना हो जाए
बहनों को ब्याह लूँगा की नहीं
माँ मंदिर फिर जा पायेगी की नहीं
पिता का सर ऊंचा रहेगा की नहीं

ये रुतबा रहेगा की नहीं
ये हसियत कहीं गिरेगी तो नहीं

पता नहीं किन खोखले आदर्शों पर
बलिदान कर दी मैंने
अपनी खुशियाँ
और तुम्हारा जीवन

फिर भी दुःख इस बात का नहीं
की इन सबके लिए तुमसे दूर हुआ
अचरज तो इसका है
की
इन्ही बातों में आकर
बस गया किसी और के साथ

हे मेरे भगवान् मुझे माफ़ कर

मुझे पता है
मेरे हर काम पर खुश होने वाली
मेरे गृहस्ती बसते देख
ख़ुशी से
चल बसी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, '' अजीत त्रिपाठी ''

Thursday, March 10, 2011

गर्म रोटी

गर्म रोटी


तन
टूटता हुआ
हवा के झोंको से

पेट सिकुड़ता हुआ
अधिकता से भूख की

नजर एकटक
रोटी के टुकड़ों पर
जो रख आया है हरिया
बड़े साहब की थाली में
इस आस से की
आज किसी
मेज़ पर
बचेगा कुछ
और चख लेगा
की गर्म रोटी
होगी कैसी

बड़ा द्वन्द है ये
जीवन का भी
की रोज
हजारों को
सेंककर
गरमागरम रोटियां
खिलाने वाला हरिया
खुद नहीं जनता
स्वाद
मख्खन लगी
गर्म रोटी का ,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Thursday, February 24, 2011

आज साँझ ढले


आज साँझ ढले
पलकों पर
उतरेंगे
ख्वाब तेरे
फिर मै छू लूँगा
तपते हुए
तुम्हारे अधरों को
फिर आज
ख़्वाबों में
तुम शरमाकर
सिमट जाओगी
मेरी बाहों के आगोश में
फिर आज
तुम्हारी आँखों से
मेरी आँखे बात कर लेंगी
आज फिर
दूरियां दिलों की
कुछ कम होंगी

तुम्हारे नाज नखरे
तुम्हारा रूठना
हसना मुश्कुराना
सब होगा
मेरी आँखों के अन्दर
आज सांझ ढले
जब सो जाऊँगा मै
बस दुआ करना तुम
की आज नींद आ जाये
जिस दिन से
तुम्हे
देखना चाहा है ख़्वाबों में
तब से नींद नहीं आई
सच मानो शुबह
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, अजीत त्रिपाठी ''

Sunday, February 20, 2011

द्वितीय .......... अंतिम प्रयास में


द्वितीय
द्वितीय होने का भाव
तुम्हे किंचित ही भान हो शायद
की
किस तरह कचोटता रहता है
मन में
मस्तिष्क के तारों में
कैसे चुभता रहता है
ये भाव की
जीवन की विराट पारी
जिसमे
स्वयं और तुम्हारे लिए
एक ही था मै
किन्तु
वास्तविकता में
हमेशा ही द्वितीय रहा हूँ

माता पिता
जिनका अकेला था मै
पता नहीं किस खेत से
देख आए कोई ऐसा
जिसके जैसा मै बन नहीं पाया
और तुम
पता नहीं क्या चाहिए था तुम्हे
तुम्हारी नई पसंद से ज्ञात हुआ मुझे
की मै था ही नहीं कहीं
तुम्हारी खुशरंग दुनिया में
किन्तु सुनो
तुम तो सिर्फ एक थी
मेरी दुनिया के लिए
और उसमे ,
सिर्फ मै था तुम्हारे लिए
फिर क्यूँ ये द्वितीय होना

हमेशा सालता रहता है
चुभता रहता है मन में
वो कौन सा अक्स था
जो माँ बाप देखना चाहते थे मुझमे
और वो कौन सा शख्स है
जो तुम्हे मुझमे नहीं मिला
बताना जरूर

कम से कम मै
इस में
तो प्रथम रहूँ
की द्वितीय होने के बाद भी
पुनह दूँ
अपनी जिन्दगी की परीक्षा
ज्ञात कर अपनी कमजोरी
और गलतियाँ
ताकि आ सकूँ
अंतिम पड़ाव पर प्रथम
और
सो जाऊं शुकून से
अंतिम बार चिर निद्रा में
इस भाव से
की प्रथम आया हूँ मै
अंतिम प्रयास में ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Friday, February 18, 2011

मुश्किल


मुश्किल
जायज़ है
खड़े होने में
खुद के पैरों पर

पर
सोचने वाली बात है
की
खड़े होकर
विवश समाज में
एक
भला चंगा आदमी
झुक जाता है
घुटनों के बल
लेट जाता है
पेट जमीं पर रख
और
रखकर सर
किसी दबंग के
कदमो पर
सजा पाकर
स्वाभिमान से
खड़े होने की ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Wednesday, February 9, 2011

हंस देता था

नहीं रोऊंगा मै
आज की रात
कर लिया है किनारा मैंने
तुम्हारी
उन यादों से
उन बातों से
जो अक्सर आ जाती थी
याद मुझे
और परेशान हो जाता था मै

बल्कि आज से मै
करूँगा याद
किस तरह
मेरी उलझी हुई बातों से
तुम बिलखकर
लग जाते थे गले
और मै सुलझाते हुए तुम्हारे बाल
तुम्हे सँभालते हुए अपनी बाँहों में
तुम्हे समझाते हुए
प्यार का मतलब
तुम्हारे माथे को
हल्के से
चूमकर
हंस देता था ,,,,,,, 'अजीत त्रिपाठी ''

अर्ध विक्षिप्त


अर्ध रात्री में
अर्ध स्नान
आंशुओं से
अर्ध ज्ञान
प्रेम की परिवर्तन का
अर्ध मान
प्रेम की पराकाष्ठा का
और उस पर
अर्ध्य
अपने आराध्य को
विचारों के तांडव से
निकलती
तड़प की चिंगारियां
हसरतों की बारिश
हिज्र की रुसवाइयों से

संभालते हुए
खुद को
भिगोते हुए
लिहाफ और तकिये
सुबह के इन्तजार में
रोज सो जाता है
ये जिस्म
जिसे
आदत है
हर शुबह
करने की
अजीब हरकते
जिसे देखकर
लोग कहते हैं
कोई प्रेम मत करना
वरना हो जाओगे
इस के जैसे
प्रेम के कारन
अर्ध विक्षिप्त ,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

Saturday, February 5, 2011

इस बसंत फिर,



कहो
क्या करोगे
जब चला जाऊँगा
ऐसे ही छोड़कर
मचलते तुम्हारे अरमानों को
पिघलते जिस्म को
तडपते होंठों को
घेरे में बाहों के
फंसे चेहरे को

और उनसे भी परे
तुम्हारे भावों और अहसासों को

चला जाऊंगा
बिना बताये
की वजह क्या
मजबूरी क्या
बस चला ही जाऊँगा
अपनी जिन्दगी से
दूर
निर्मम एकांत में
जहाँ प्रेम का भाव तो होगा
पर किसी से प्रेम नहीं

बताओ तब क्या करोगी

जान ले लुंगी तुम्हारी
................
कह दिया था हंसकर उसने
जो जान है मेरी
उस पगली को तो
पता भी नहीं
मेरी जान उसमे में
और जाने का विचार
बस छलावा है
कसने का और जोर से
उसके अहसासों
और खुशबू भरे
अंग प्रत्यंग को
अपनी बाहों में
इस बसंत फिर,.
पिछले बसंत की तरह ......... '' अजीत त्रिपाठी ''

Thursday, January 20, 2011

बस विचार है


नूतन कुछ नहीं
बस विचार है
एक अदना सा
जो बन जाता है
वट वृक्ष सा
और जोड़ने लगता है
कई पुरानी
चीजों को
और हो जाता है
आविष्कार
एक नवीन
वस्तु का

एक सूक्ष्म सा विचार
बना देता है
छोटे छोटे से
पुराने
कलपुर्जों से
एक अद्भुत सौन्दर्य

वैसे ही जैसे
ईश्वर ने
पुरानी आत्मा ,
मिटटी , जल
अग्नि , वायु
से घढ़ दिया
है तुम्हे
देकर नए विचार
और उस से भी परे
मुझे दिया हुनर
परखने का
इस विचार को
प्रेम के
सानिध्य में

समझो
ईश्वर के इस विचार का
कोई
औचित्य नहीं था
जब तक
तुमसे प्रेम का
नूतन विचार
मेरे मन में ना होता
और
रह जाता तुम्हारा सौन्दर्य
अनसुना ,, अनकहा
अगर इस तरह
एक नए विचार की
उत्पत्ति के लिए
मैंने स्वयं को
ना जलाया होता
प्रेम की अग्नि में
और ना लिखा होता
आज तुम्हे
इस तरह
खुरच खुरच कर
अपने दिल पर ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''

मेरी है


सरल है सौम्य है मुझसी है मेरी है
वो सुन्दरता की मूरत है ,मेरी है

सजग है ,, सादगी में समाई है वो
विचारों का सुन्दर मंथन है ,मेरी है

अदभुत सौंदर्य की मलिका का वो
जो रूप सलोना रखती है , मेरी है

एक मनचाहा सा सपर्श है खुदा का
जो मुझे अपने मन में रखती है, मेरी है

सुलभ साधारण मधुरानी सी रंगत वाली
जो मनमंदिर की देवी है हमेशा, मेरी है

एक रूप है अनोखा मेरी आँखों में
जो ख्वाबों में रहती है मेरे , मेरी है ,, '' अजीत त्रिपाठी ''

Saturday, January 15, 2011

शब्द ,,, अर्थ ,,ज्ञान

नहीं होता
हर शब्द
एक अर्थ का मालिक
जब तक वाजिब शब्द
ना मिल जाएँ उसे
उसके जैसे

वैसे ही
जैसे
ज्ञान है अज्ञान
जब तक ना समझे कोई
ज्ञान को
ज्ञान की तरह ,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी'