अब नहीं है
कुछ लिखने ko
पास मेरे
तुम्हारे प्यार और मेरे दर्द को
बहुत लिख चूका हूँ मै
और खा चूका हूँ
अपना दिल बेचकर
बहुत सी रोटियां
बहुत नाम कमा लिया था
बहुत धन भी जोड़ लिया है
पर किस काम का ये
तुम नहीं तो
कोई आगे जुड़ भी नहीं पाया
और ना ही है
मेरे पास कोई अंश मेरा
जो जिए
वो जिन्दगी मेरी
जो मै जी नहीं पाया
और अब भी मै
किसी को जल्द
अपना बना नहीं पाता
पेड़ पत्ते , तालाब . नदी , वन
फूल , खुशबू , चितवन
इन पर तो लिखना भी नहीं आता मुझे
और अब तुम्हारी याद भी धुंधली है
उम्र के इस पड़ाव में
की लिख ही दूँ मै फिर एक बार
सच की कितनी खूबसूरत हो तुम
या
कितनी खूबसूरत थी तुम उस वक़्त
या
कितना सम्पूर्ण था मै
तुम्हारे होने से
उस वक़्त
या कितना अकेला हूँ मै
तुम्हारे बिना
इस वक़्त ,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
Thursday, December 16, 2010
वो पगली
मै रुका रहता हूँ ,
अक्सर वहीँ ,
जहाँ मिल जाती थीं ,
नजरें उस से ,
और वो मुस्कुरा देती थी .,
अब भी रहता हूँ ,
इन्तजार में , मै,
की निकलेगी कभी ,
फिर मिलेंगी नजरें
और , वो मुस्कुरा देगी
और
इसी पश-ओ-पेश में
मेरे ख्यालों में ,
मेरे पागलपन पर,
वो पगली ,
मुस्कुरा देती है ..,,''अजीत त्रिपाठी''
अक्सर वहीँ ,
जहाँ मिल जाती थीं ,
नजरें उस से ,
और वो मुस्कुरा देती थी .,
अब भी रहता हूँ ,
इन्तजार में , मै,
की निकलेगी कभी ,
फिर मिलेंगी नजरें
और , वो मुस्कुरा देगी
और
इसी पश-ओ-पेश में
मेरे ख्यालों में ,
मेरे पागलपन पर,
वो पगली ,
मुस्कुरा देती है ..,,''अजीत त्रिपाठी''
Monday, December 13, 2010
उर्वशी
ise likhne ke baad mai hi nahi padh paya ise
pahle kahani likhna chahta tha
fir kavita ki shakl de di,, to ab ye naa kahani hai naa kavita hai,, bas ek yatharth hai
ek kadwa sach,,
माँ बाप की लाडली थी
किन्तु थे
चेहरे पे अजीब से
चेचक के दाग
और काला रंग
बड़ी अजीब दुर्दशा थी
उर्वशी की
नाम को तो
रूपसी थी
किन्तु यथार्थ में
रूप था ही नहीं
पर यौवन
और उसकी पूर्नाता की महत्वकांक्षा
अन्दर थी समाहित कही
अहसास जगमग थे उसमे कहीं
हर बार कोई आ जाता था
मेहमाँ बनकर घर में
और देख लेता था लड़की
पर बदसूरती ,, और उसपर
चन्द सितारों से चेचक के दाग
किसी की पसंद नहीं बन पाई वो
पर गर्व था उसमे
और बन गई वो माँ बाप का बेटा
कुछ कमाने लगी
और व्यस्त रखकर खुद को
भूलने लगी अपने आप को ,,,,,,,,
................................................
दंगे भड़क चुके हैं सहर में
रेडिओ बज रहा है
शाम होने को है
सभी भाग रहे हैं अपने अपने घर
उर्वशी भी भागी जा रही है
मैदान के बीचों बीच
सोचकर अजीब सी बातें
की सुनाई देती है
अजीब सी आवाजें
पुरुषों की साथ चलते हुए
कुछ तेज करते हुए चल अपनी
दुपट्टे को सँभालते हुए
भागी जा रही है वो
अनिश्चय के दर से
की अचानक पकड़ लिया किसी ने उसका उसका हाथ
और अचानक ही
एक समूह
भूखे भेडियों का
टूट चूका था उस पर
मान को मर्यादा को
हर रहा था एक समूह
दर्द और व्याकुलता
साफ़ था उर्वशी के चेहरे पर
पर अचानक
एक चेहरा
जो मान मर्दन कर रहा था उसका
देखकर
अजीब सी सोच में पड़ गई
फिर जो हुआ
उसका ध्यान नहीं दिया उसने
कुछ पल गुजरे
और अपनी बेआबरू कमीज के साथ
सोचती जा रही थी
उर्वशी
वो आखिरी चेहरा
जो कुछ ही दिन पहले
दिन के उजाले में
उसके अपने सानिध्य के
लायक नहीं समझ रहा था
कैसे रात के अँधेरे में
जन्मजात सा
उसमे समां रहा था
अजीब सी ख़ुशी थी उर्वशी को
इस दुर्दशा के बाद भी
की उसका यौवन
व्यर्थ नहीं
वो दिन के उजाले में ही
कुरूप है
किन्तु रात होते ही
अँधेरे में
वो काबिल है किसी के भी ................. ''अजीत त्रिपाठी ''
pahle kahani likhna chahta tha
fir kavita ki shakl de di,, to ab ye naa kahani hai naa kavita hai,, bas ek yatharth hai
ek kadwa sach,,
माँ बाप की लाडली थी
किन्तु थे
चेहरे पे अजीब से
चेचक के दाग
और काला रंग
बड़ी अजीब दुर्दशा थी
उर्वशी की
नाम को तो
रूपसी थी
किन्तु यथार्थ में
रूप था ही नहीं
पर यौवन
और उसकी पूर्नाता की महत्वकांक्षा
अन्दर थी समाहित कही
अहसास जगमग थे उसमे कहीं
हर बार कोई आ जाता था
मेहमाँ बनकर घर में
और देख लेता था लड़की
पर बदसूरती ,, और उसपर
चन्द सितारों से चेचक के दाग
किसी की पसंद नहीं बन पाई वो
पर गर्व था उसमे
और बन गई वो माँ बाप का बेटा
कुछ कमाने लगी
और व्यस्त रखकर खुद को
भूलने लगी अपने आप को ,,,,,,,,
........................................
दंगे भड़क चुके हैं सहर में
रेडिओ बज रहा है
शाम होने को है
सभी भाग रहे हैं अपने अपने घर
उर्वशी भी भागी जा रही है
मैदान के बीचों बीच
सोचकर अजीब सी बातें
की सुनाई देती है
अजीब सी आवाजें
पुरुषों की साथ चलते हुए
कुछ तेज करते हुए चल अपनी
दुपट्टे को सँभालते हुए
भागी जा रही है वो
अनिश्चय के दर से
की अचानक पकड़ लिया किसी ने उसका उसका हाथ
और अचानक ही
एक समूह
भूखे भेडियों का
टूट चूका था उस पर
मान को मर्यादा को
हर रहा था एक समूह
दर्द और व्याकुलता
साफ़ था उर्वशी के चेहरे पर
पर अचानक
एक चेहरा
जो मान मर्दन कर रहा था उसका
देखकर
अजीब सी सोच में पड़ गई
फिर जो हुआ
उसका ध्यान नहीं दिया उसने
कुछ पल गुजरे
और अपनी बेआबरू कमीज के साथ
सोचती जा रही थी
उर्वशी
वो आखिरी चेहरा
जो कुछ ही दिन पहले
दिन के उजाले में
उसके अपने सानिध्य के
लायक नहीं समझ रहा था
कैसे रात के अँधेरे में
जन्मजात सा
उसमे समां रहा था
अजीब सी ख़ुशी थी उर्वशी को
इस दुर्दशा के बाद भी
की उसका यौवन
व्यर्थ नहीं
वो दिन के उजाले में ही
कुरूप है
किन्तु रात होते ही
अँधेरे में
वो काबिल है किसी के भी ................. ''अजीत त्रिपाठी ''
Tuesday, December 7, 2010
मै सत्य नहीं
मै सत्य नहीं
असत्य भी नहीं
निजता भी नहीं
स्वार्थ भी नहीं
बस एक यथार्थ हूँ मै
तू
साधारण मनुज
जीवन कहकर मुझे
कर लेता है
इतिश्री
अपने कर्तव्यों से
मानकर
की है भाग्य यही
किन्तु मै भाग्य नहीं
कर्म का भोग्य हूँ
भोग और प्रसाद हूँ मै
कर्मठता का
मै स्वतंत्रता नहीं
एक भाव हूँ
स्वातंत्र्य का
जिसे खोजना लक्ष्य है
जीव मात्र का
रस से , सुरस से
प्रेम से , पीड़ा से
प्रकृति से , पूर्णता से
परमात्मा ,, आत्मा से
परे हूँ मै
किन्तु सारगर्भित भी हूँ
इन्ही से मै
हे मनुज
मै जीवन हूँ
मृत्यु के पाश से मुक्त
किन्तु व्याकुल
मृत्यु के प्रतीक्षा में
परन्तु
उस से पहले
भोगने हैं तुझे
सारे कर्म सारे कर्तव्य
और करना है
निर्वहन
अपने दायित्यों का
उसके पहले
ना मै सार्थक हूँ तेरे लिए
ना तू परम भोग है मेरा
उस परम सत्ता के प्रति
जिसके प्रति
कर्तव्य है मेरा
की मै जीवन
तुझे
साधारण मनुज से
इंसान बनाऊं ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
Thursday, December 2, 2010
पापा ,,
पापा ,,
आपने सोचा ही नहीं
कितना दर्द होगा
आपके बिना
कितना अकेले होंगे हम
आपने सोचा ही नहीं
आज सुबह बिस्तर फिर
अजीब सी परेशानी में है
आज शाम फिर
अजीब सी हैरानी में है
कोई कह ही नहीं रहा है
शुबह उठने को जल्दी से
या शाम को
खेलने से मना करने को
पढने को
पापा
आपका हंसमुख चेहरा
वो शुबह को जाते वक्त की
हिदायतें
वो शाम को आते वक़्त की शिकायतें
हमेशा याद आती है
अब जब आप नहीं हैं
तो समझ आता है
की कितनी
जरूरी थी
आपकी डांट
आपकी फटकार
आज भाई तैयार होता है
आपकी तरह
जाने को काम पर
और याद करा जाता है
किस तरह
बरसते थे आप
माँ पर
की तैयार
क्यूँ नहीं है
कपडे और जूते अब तब तक
पापा आप बहुत याद आते हो
जब कोई कह देता है
कौन क्या करता है घर में
जैसे आज अजीत ने कह दिया
बताओ सीमा
क्या करते हैं
तुम्हारे पापा
पापा आप तो चले गए हैं
इस दुनिया के पार
पर क्या सोचा आपने
हम सभी भाई बहन हैं
आपकी निशानी
माँ को
कितने प्यारे हैं
आपकी ही तरह
फिर भी
आप क्यूँ चले गए
माँ को छोड़ कर
भगवान् के पास
जो आपको
भगवान् से भी
ज्यादा पसंद करती थी
जो आपको
भगवान् से भी बड़ा
भगवान् मानती थी ,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी;;
आपने सोचा ही नहीं
कितना दर्द होगा
आपके बिना
कितना अकेले होंगे हम
आपने सोचा ही नहीं
आज सुबह बिस्तर फिर
अजीब सी परेशानी में है
आज शाम फिर
अजीब सी हैरानी में है
कोई कह ही नहीं रहा है
शुबह उठने को जल्दी से
या शाम को
खेलने से मना करने को
पढने को
पापा
आपका हंसमुख चेहरा
वो शुबह को जाते वक्त की
हिदायतें
वो शाम को आते वक़्त की शिकायतें
हमेशा याद आती है
अब जब आप नहीं हैं
तो समझ आता है
की कितनी
जरूरी थी
आपकी डांट
आपकी फटकार
आज भाई तैयार होता है
आपकी तरह
जाने को काम पर
और याद करा जाता है
किस तरह
बरसते थे आप
माँ पर
की तैयार
क्यूँ नहीं है
कपडे और जूते अब तब तक
पापा आप बहुत याद आते हो
जब कोई कह देता है
कौन क्या करता है घर में
जैसे आज अजीत ने कह दिया
बताओ सीमा
क्या करते हैं
तुम्हारे पापा
पापा आप तो चले गए हैं
इस दुनिया के पार
पर क्या सोचा आपने
हम सभी भाई बहन हैं
आपकी निशानी
माँ को
कितने प्यारे हैं
आपकी ही तरह
फिर भी
आप क्यूँ चले गए
माँ को छोड़ कर
भगवान् के पास
जो आपको
भगवान् से भी
ज्यादा पसंद करती थी
जो आपको
भगवान् से भी बड़ा
भगवान् मानती थी ,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी;;
तुम्हे खोकर
जला दिया है
वो कागज़ का पुलिंदा
जिसे कहते थे
तुम प्रेम पत्र
दिल की धड़कन
तुम्हारी छुवन
तुम्हारी तडपन
जो याद दिलाते थे
गम में मुझे
की कितना खुश थी
तुम मुझे पाकर
और अब याद दिलाते हैं
कितना उदास हूँ मै
तुम्हे खोकर
''अजीत त्रिपाठी ''
वो कागज़ का पुलिंदा
जिसे कहते थे
तुम प्रेम पत्र
दिल की धड़कन
तुम्हारी छुवन
तुम्हारी तडपन
जो याद दिलाते थे
गम में मुझे
की कितना खुश थी
तुम मुझे पाकर
और अब याद दिलाते हैं
कितना उदास हूँ मै
तुम्हे खोकर
''अजीत त्रिपाठी ''
सोचता रह जाता हूँ मै
मेरी आँखों का तारा है
यही सुनते सुनते बड़ा हुआ
माँ है ,,, झूट भी नहीं बोलती
और उसके सच
परे कर देते हैं
सभी शंकाओं को
एक दिन उसने भी कह दिया था
हंसी ठिठोली में
गुलाबों से घिरे बाग़ में
बहुत सुन्दर हो ,, जवान हो
आँखें तुम्हारी
सब बोलती रहती हैं
कोई भी मर मिटेगी तुम पर
सोच में पड़ गया था
इतना ही सुन्दर था मै
की कोई भी मिल जाए
तो वो ही क्यूँ नहीं
क्यूँ नहीं समझ पाती
वो बोलती आँखों को
सोचता रह जाता हूँ मै
अक्सर
की सब होने के बाद भी
अकेला क्यूँ हूँ मै
और वो जो
किसी के लायक भी
कह देती है मुझे
अपने लायक क्यूँ नहीं समझती
सोचता रह जाता हूँ मै ,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी '' .
Monday, November 22, 2010
रूप गर्विता
निसंकोच कहो
पर याद रखो
भाव निर्मल हों
मन की कुटिलता
जीवन को व्यर्थ कर देती है
इर्ष्या की अग्नि
तुम्हे ही जलाएगी
यद्यपि तुम्हे यकीन ना हो
किन्तु
जो तुम्हारा विचार है
मेरे प्रति
महज आकर्षण है
विलासिता है
तुम मुझे भोग्य
समझते हो
या चरण रज में समेटना चाहते हो
निर्विकार हो कहो
बड़े ही सपष्ट भाव
से कहा था उसने
मेरे प्रणय निवेदन पर
मै आवाक था
निशब्द जड़ सा
खड़ा हुआ ,,
वहां पर ,,
किंचित ही इर्ष्या हो मुझे
उसे रूप उसके रंग से
शायद ही समझा हो
मैंने भोग्य उसे
मै तो प्रेम ही करता था
वैसे ही
जैसे कोई
ईश्वरीय तत्व से
जुड़ना चाहता था
मै भी उस से जुड़ना चाहता था
तुमसे प्रेम नहीं
कहते हुए
उलटे पावँ चला आया था मै
उस रूप गर्विता से प्रेम कैसा
जिसे इन आँखों में
प्रेम की जगह
विलासिता दिखती हो
इन अधरों की लपलपाहट
महज
कुछ कहने की
चंचलता न लगकर
भोगने की अभिलाषा लगती हो
संदेह से शुरू हुआ प्रेम
टूटे हुए माला सा होगा
मैंने सुना है कहीं
बस चला आया हूँ
यही सोचते सोचते
किसने समझाया है उसे
भोग और विलास का अर्थ
किसने कहा ,,
ये संभव है
सिर्फ स्त्री रूप के साथ
हमारी उजाड़ बीहड़
पुरानी कहानियों ने
या आईने ने
जिसमे स्वयम का
चलायमान रूप देखा हो उसने
और समझ लिया हो खुद को
रूप वान
और बन गई हो
रूप गर्विता ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
पर याद रखो
भाव निर्मल हों
मन की कुटिलता
जीवन को व्यर्थ कर देती है
इर्ष्या की अग्नि
तुम्हे ही जलाएगी
यद्यपि तुम्हे यकीन ना हो
किन्तु
जो तुम्हारा विचार है
मेरे प्रति
महज आकर्षण है
विलासिता है
तुम मुझे भोग्य
समझते हो
या चरण रज में समेटना चाहते हो
निर्विकार हो कहो
बड़े ही सपष्ट भाव
से कहा था उसने
मेरे प्रणय निवेदन पर
मै आवाक था
निशब्द जड़ सा
खड़ा हुआ ,,
वहां पर ,,
किंचित ही इर्ष्या हो मुझे
उसे रूप उसके रंग से
शायद ही समझा हो
मैंने भोग्य उसे
मै तो प्रेम ही करता था
वैसे ही
जैसे कोई
ईश्वरीय तत्व से
जुड़ना चाहता था
मै भी उस से जुड़ना चाहता था
तुमसे प्रेम नहीं
कहते हुए
उलटे पावँ चला आया था मै
उस रूप गर्विता से प्रेम कैसा
जिसे इन आँखों में
प्रेम की जगह
विलासिता दिखती हो
इन अधरों की लपलपाहट
महज
कुछ कहने की
चंचलता न लगकर
भोगने की अभिलाषा लगती हो
संदेह से शुरू हुआ प्रेम
टूटे हुए माला सा होगा
मैंने सुना है कहीं
बस चला आया हूँ
यही सोचते सोचते
किसने समझाया है उसे
भोग और विलास का अर्थ
किसने कहा ,,
ये संभव है
सिर्फ स्त्री रूप के साथ
हमारी उजाड़ बीहड़
पुरानी कहानियों ने
या आईने ने
जिसमे स्वयम का
चलायमान रूप देखा हो उसने
और समझ लिया हो खुद को
रूप वान
और बन गई हो
रूप गर्विता ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
''अजीत'' मै कौन हूँ
स्वयं नहीं पता मुझे
एक बेबाक सा
बेजुबान सा
इंसान ही हूँ
आप समझ लेते हो
की लिखने वाला है कोई
किन्तु दोस्तों
सच कहूँ
तो लिखता नहीं हूँ मै
ना ही कभी लिखता था मै
पहले एक नाजनी
बैठ जाती थी
पलकों में
तो लिख जाता था कुछ
उसके रूप श्रृंगार पर
कभी उसके नाज पर
कभी उसके प्यार पर
और अभी भी चल जाती है
कलम
एक अरसे बाद
देखकर
की गिर रही है वो
पलकों से
आंसू बनकर
एक दर्द की तरह
और वो दर्द उतर आता है
मेरी तहरीर में
मेरे लिखने में उतना ही प्यार था
जितना मुझे उस से प्यार है
और उतना ही दर्द है
जितना दर्द अब मुझ में है
सच मानो
प्रेम और दर्द
इसके इतर
कुछ नहीं लिखा है मैंने
और शायद लिखूं भी ना
कलियाँ फूल
तब तक ही हसीं थे
जब तक दे देता था
एक गुलाब हंसकर उसे
और छुपा लेती थी वो उसे
अपने सीने के मानिंद
किसी किताब में
और अब
गुलाब ही चुभ जाता है
बड़ी कशमकश में हूँ
समझ नहीं आता क्या रह गया हूँ
आप समझ लेना
और बता देना .
की .
क्या आगाज़ था मेरा क्या अंजाम होना है
किसके नाम का हूँ मै किसके नाम होना है
मेरी बेचारगी क्या है मेरी बरबादियाँ क्या हैं
मेरी आवारगी क्या,, क्या इलज़ाम होना है /........ ''अजीत त्रिपाठी '''
क्या जरूरी है
क्या जरूरी है की तुमको देखकर जीते रहे
क्या जरूरी है की तुमको देखकर मरते रहें
क्या जरूरी है तुम्हारी आह से ही आह हो
क्या जरूरी है तुम्हारी चाह से जलते रहें
क्या जरूरी है की अपना सब कुछ छोड़ दें
क्या जरूरी है तेरी परवाह से पलते रहे
क्या जरूरी है आशिकी महसूस हो
क्या जरूरी खुद को तेरी आह से भरते रहे
क्या जरूरी है यूँ लिखना ग़ज़लें तेरे नाम पर
क्या जरूरी है की तेरी वाह से डरते रहे
क्या जरूरी है की मेरे यार का दीदार हो
क्या जरूरी है की प्यार हम करते रहें
क्या जरूरी है ''अजीत'' की बस बात हो
क्या जरूरी है की तेरी याद से लड़ते रहें ......... ''अजीत त्रिपाठी''
क्या जरूरी है की तुमको देखकर मरते रहें
क्या जरूरी है तुम्हारी आह से ही आह हो
क्या जरूरी है तुम्हारी चाह से जलते रहें
क्या जरूरी है की अपना सब कुछ छोड़ दें
क्या जरूरी है तेरी परवाह से पलते रहे
क्या जरूरी है आशिकी महसूस हो
क्या जरूरी खुद को तेरी आह से भरते रहे
क्या जरूरी है यूँ लिखना ग़ज़लें तेरे नाम पर
क्या जरूरी है की तेरी वाह से डरते रहे
क्या जरूरी है की मेरे यार का दीदार हो
क्या जरूरी है की प्यार हम करते रहें
क्या जरूरी है ''अजीत'' की बस बात हो
क्या जरूरी है की तेरी याद से लड़ते रहें ......... ''अजीत त्रिपाठी''
वैराग्य भाव
निश्छल
किन्तु निर्मम
सर्व जग समाहित
किन्तु मेरे लिए कम
मेरी बातें सभी से
और वैराग्य भाव भी मुझसे
समझ नहीं आता मुझे
तुम्हारा यूँ दोहरा होना
एक तरफ तो लगा लेते हो
चुपके से
मेरे नाम का सिंदूर
और भेज देते हो
अगले ही पल मुझे
चिर वैधव्य भोगने के लिए
गिराकर
अपनी नजरों से मुझे
कहकर
प्रेम तो शास्वत है
किन्तु
प्रेम प्रदर्शन
वर्जित है
सभ्य समाज में
किन्तु प्रिये
बिन प्रदर्शन के प्रेम
तो नव सृजन
संभव ही नहीं ,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
किन्तु निर्मम
सर्व जग समाहित
किन्तु मेरे लिए कम
मेरी बातें सभी से
और वैराग्य भाव भी मुझसे
समझ नहीं आता मुझे
तुम्हारा यूँ दोहरा होना
एक तरफ तो लगा लेते हो
चुपके से
मेरे नाम का सिंदूर
और भेज देते हो
अगले ही पल मुझे
चिर वैधव्य भोगने के लिए
गिराकर
अपनी नजरों से मुझे
कहकर
प्रेम तो शास्वत है
किन्तु
प्रेम प्रदर्शन
वर्जित है
सभ्य समाज में
किन्तु प्रिये
बिन प्रदर्शन के प्रेम
तो नव सृजन
संभव ही नहीं ,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
तुम्हारी याद में
धुन्धलकी यादों से
उनकी परछाइयों से
अभी जागकर देखा है मैंने ,,
आँखे सुर्ख लाल थी मेरी
दिल जार जार कर जल रहा था मेरा
तुम्हारे ना होने से
मादकता तुम्हारे होने की
झलक रही थी अब भी
मेरी आँखों से
तुम्हारे प्रेम की ऊष्मा
भटक रही है
अब भी मेरी आँखों में
टपकते हुए मेरे आंसुओं से
बीते हुए लम्हों में
तुम्हे भरने को अपनी बाहों
के अहसास
अभी भी
तडपा जाते हैं मुझको
तो आज सुबह
उठकर ही
मैंने जलाई है
अपने ख्वाबों की चिता
और उसमे रख दिए हैं
तुम्हारी याद के कुछ ख़त
जो जल जाएँ
और कोई आखिरी निशानी भी
याद ना रहे मुझको
जिस से मैं जलता रहूँ
रात भर
तकिये के आगोश में .........
,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
उनकी परछाइयों से
अभी जागकर देखा है मैंने ,,
आँखे सुर्ख लाल थी मेरी
दिल जार जार कर जल रहा था मेरा
तुम्हारे ना होने से
मादकता तुम्हारे होने की
झलक रही थी अब भी
मेरी आँखों से
तुम्हारे प्रेम की ऊष्मा
भटक रही है
अब भी मेरी आँखों में
टपकते हुए मेरे आंसुओं से
बीते हुए लम्हों में
तुम्हे भरने को अपनी बाहों
के अहसास
अभी भी
तडपा जाते हैं मुझको
तो आज सुबह
उठकर ही
मैंने जलाई है
अपने ख्वाबों की चिता
और उसमे रख दिए हैं
तुम्हारी याद के कुछ ख़त
जो जल जाएँ
और कोई आखिरी निशानी भी
याद ना रहे मुझको
जिस से मैं जलता रहूँ
रात भर
तकिये के आगोश में .........
,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
व्याकुलता,,,,,
तुम नादान हो शायद
या मै समझने लगा हूँ
स्वयं को
स्वयं से विस्तृत
विस्तृत
ऐसी मनोस्थिति
जहाँ आकर
ज्ञान नहीं होता
की प्रेम क्या
व्याकुलता क्या
और क्या है
व्याकुलता
अक्सर तुम समझ लेती हो
आलिंगन बध्ध होकर
की यही इति है प्रेम की
या
यही है
मेरी कामुक
पिपासा जो शांत हो जाती है
तुम्हे भरकर
अंजुलियों में
और होकर करबध्ध
तुम्हारे अनुपम सौन्दर्य के लिए
किन्तु रुको
वो आलिंगन बध्ध
प्रणाम की मुद्रा
तुम्हारे यौवन को नहीं
अपितु है
ईश्वर को धन्यवाद
उसकी इस अनुपम कृति के लिए
जिसकी आँखों में मैंने देखा था
अपने लिए
प्रेम अपनत्व और वात्सल्य
जीवन के विविध रूप
एक अंश में समेटे हुए
और तब से ही प्रयत्न शील
हूँ मै
फिर देखने के लिए वही भाव
एक प्यास सा है ये मुझमे
कामुकता से परे
व्याकुलता बनकर
किन्तु
तुमने खो दिया है
मुझे पाकर
अपना वो अद्भुत सौन्दर्य
जो जिस्म के अन्दर था
जिसके लिए लालायित था मै
जिसकी छुवन तक पहुँचाना
जीवन का मर्म था
प्रेम जिस से था मुझे
अब तुम आलिंगन बध्ध होकर
इति कर लेती हो
अपने प्रेम प्रदर्शन की
सच मानो
मैंने जिया है तुम्हे
मेरी पिपासा ,,
कामुकता नहीं
अपितु है
एक व्याकुलता
इस उम्र में आकर
पाना और देखना
वही वात्सल्य
वही अपनापन
वही प्रेम
जो खो दिया है
तुमने
एक उम्र गुजारकर
मेरी बाहों में
इस निश्चिंतता में
की
नहीं जाऊँगा मै तुमसे परे
किन्तु याद रखो
मोक्ष और संतुष्टि
व्याकुलता के संतुष्ट होने में ही है
अब तुम पर है प्रिये
मैंने कह दिया है
या तो
प्रेम को कामुकता से अलग कर
प्रदर्शित करो
नयनो से वही भाव
या भेज दो मुझे
वैराग्य में
ढूँढने अपनी व्याकुलता
और उसका समाधान
एक बार अलग होकर
करने दो फिर मुझे प्रयत्न
तुम्हे पाने का
उसी रूप में
जिसमे पा लिया था मैंने
अपने लिए
साथी का अपनापन
उन्मुक्त और अनंत प्रेम साथी का
और अंतिम
किन्तु स्थायी वात्सल्य
और ममत्व ,,
जिससे शांत हो एक बार
मेरी व्याकुलता ,,
''''''''''''''''''''''''''''' ;;अजीत त्रिपाठी '';;;;;;;;;
या मै समझने लगा हूँ
स्वयं को
स्वयं से विस्तृत
विस्तृत
ऐसी मनोस्थिति
जहाँ आकर
ज्ञान नहीं होता
की प्रेम क्या
व्याकुलता क्या
और क्या है
व्याकुलता
अक्सर तुम समझ लेती हो
आलिंगन बध्ध होकर
की यही इति है प्रेम की
या
यही है
मेरी कामुक
पिपासा जो शांत हो जाती है
तुम्हे भरकर
अंजुलियों में
और होकर करबध्ध
तुम्हारे अनुपम सौन्दर्य के लिए
किन्तु रुको
वो आलिंगन बध्ध
प्रणाम की मुद्रा
तुम्हारे यौवन को नहीं
अपितु है
ईश्वर को धन्यवाद
उसकी इस अनुपम कृति के लिए
जिसकी आँखों में मैंने देखा था
अपने लिए
प्रेम अपनत्व और वात्सल्य
जीवन के विविध रूप
एक अंश में समेटे हुए
और तब से ही प्रयत्न शील
हूँ मै
फिर देखने के लिए वही भाव
एक प्यास सा है ये मुझमे
कामुकता से परे
व्याकुलता बनकर
किन्तु
तुमने खो दिया है
मुझे पाकर
अपना वो अद्भुत सौन्दर्य
जो जिस्म के अन्दर था
जिसके लिए लालायित था मै
जिसकी छुवन तक पहुँचाना
जीवन का मर्म था
प्रेम जिस से था मुझे
अब तुम आलिंगन बध्ध होकर
इति कर लेती हो
अपने प्रेम प्रदर्शन की
सच मानो
मैंने जिया है तुम्हे
मेरी पिपासा ,,
कामुकता नहीं
अपितु है
एक व्याकुलता
इस उम्र में आकर
पाना और देखना
वही वात्सल्य
वही अपनापन
वही प्रेम
जो खो दिया है
तुमने
एक उम्र गुजारकर
मेरी बाहों में
इस निश्चिंतता में
की
नहीं जाऊँगा मै तुमसे परे
किन्तु याद रखो
मोक्ष और संतुष्टि
व्याकुलता के संतुष्ट होने में ही है
अब तुम पर है प्रिये
मैंने कह दिया है
या तो
प्रेम को कामुकता से अलग कर
प्रदर्शित करो
नयनो से वही भाव
या भेज दो मुझे
वैराग्य में
ढूँढने अपनी व्याकुलता
और उसका समाधान
एक बार अलग होकर
करने दो फिर मुझे प्रयत्न
तुम्हे पाने का
उसी रूप में
जिसमे पा लिया था मैंने
अपने लिए
साथी का अपनापन
उन्मुक्त और अनंत प्रेम साथी का
और अंतिम
किन्तु स्थायी वात्सल्य
और ममत्व ,,
जिससे शांत हो एक बार
मेरी व्याकुलता ,,
''''''''''''''''''''''''''''' ;;अजीत त्रिपाठी '';;;;;;;;;
मौन स्वीकृति
बहुत हुआ
ये प्रणय निवेदन
और ये करुण रुदन
तुम्हारी बेरुखी पर
यूँ मौन रहकर
स्वीकृति का भाव भी
तब दिखे
जब रूह के और पास
आ जाऊं मै
या तुम लग जाओ
छतनार सी
मेरे सीने पर
और आ जाओ
मेरी रूह के करीब
शायद तब दिख जाएँ
भाव अनकहे से
लिपटे हुए
तुम्हारे बालों से
या सिमटते हुए
तुम्हारे अहसासों से
मेरे सीने में
शायद तुम्हारी
बंद होती आँखों से
या शायद
तुम्हारी डबडबाई
भरी आँखों से
कोई मोती गिरे
और कह जाए
की लज्जा है तुम में
तुम मुझ सा
यूँ सर-ऐ-महफ़िल
नहीं पकड़ सकते
हाथ मेरा
तब शायद मै समझ जाऊं
और ढूंड लाऊं
एकांत हमारे लिए
जहाँ तुम
और सिर्फ तुम रहो
नितांत अकेले
और समझ जाओ तुम
की तुम्हारे
मौन के आगे
कितना निरीह
निसहाय
और अकेला हूँ मैं
और कितना जरूरी है
यूँ
एक मौन स्वीकृति के लिए
निश्वास
भाव सहित
स्वीकृति का चिन्ह
जो हो
बिलकुल मौन
और मिले
शायद तुम्हारे बालों से
आँखों से
आलिंगन से
मौन रहकर
मौन कर के मुझे
मौन स्वीकृति
मेरे प्रणय निवेदन की
मेरे जीवन के लिए
तुम्हारे प्रेम की
तुम्हारे साथ की
मौन स्वीकृति ............ ''अजीत त्रिपाठी''
ये प्रणय निवेदन
और ये करुण रुदन
तुम्हारी बेरुखी पर
यूँ मौन रहकर
स्वीकृति का भाव भी
तब दिखे
जब रूह के और पास
आ जाऊं मै
या तुम लग जाओ
छतनार सी
मेरे सीने पर
और आ जाओ
मेरी रूह के करीब
शायद तब दिख जाएँ
भाव अनकहे से
लिपटे हुए
तुम्हारे बालों से
या सिमटते हुए
तुम्हारे अहसासों से
मेरे सीने में
शायद तुम्हारी
बंद होती आँखों से
या शायद
तुम्हारी डबडबाई
भरी आँखों से
कोई मोती गिरे
और कह जाए
की लज्जा है तुम में
तुम मुझ सा
यूँ सर-ऐ-महफ़िल
नहीं पकड़ सकते
हाथ मेरा
तब शायद मै समझ जाऊं
और ढूंड लाऊं
एकांत हमारे लिए
जहाँ तुम
और सिर्फ तुम रहो
नितांत अकेले
और समझ जाओ तुम
की तुम्हारे
मौन के आगे
कितना निरीह
निसहाय
और अकेला हूँ मैं
और कितना जरूरी है
यूँ
एक मौन स्वीकृति के लिए
निश्वास
भाव सहित
स्वीकृति का चिन्ह
जो हो
बिलकुल मौन
और मिले
शायद तुम्हारे बालों से
आँखों से
आलिंगन से
मौन रहकर
मौन कर के मुझे
मौन स्वीकृति
मेरे प्रणय निवेदन की
मेरे जीवन के लिए
तुम्हारे प्रेम की
तुम्हारे साथ की
मौन स्वीकृति ............ ''अजीत त्रिपाठी''
मै चुप हो जाता हूँ
क्या जरूरी है
हर वक़्त इजहार करना
जुबान से
जबकि आँखे
बोलती ही रहती हैं
वो हर बात
जो मै कहना चाहता हूँ
पर कह नहीं पाता
की कहीं
उमंग में कुछ गलत ना कह जाऊं
तुम्हारे आँखों को
सागर कहते कहते
कह ना दू
कहीं मधुशाला
या तुम्हारे होंठो के बोलों को
उनकी छुवन को
कह दूँ प्याला
तुम्हारे गेसुओं को
कह ना दूँ कभी
अपने प्रेम पाश से इतर
एक बंधन खुद का
तुम्हे भाहों में भरने के
मोहक अंदाज को
सिर्फ जिस्मानी ना कह दूँ
तुम्हारे नाज को नखरे को
कहीं कोई बोझ ना कह दूँ
तुम्हारी हंसी
और होंठों के बीच जुड़ते से तिल को
कहीं अपनी बेचारगी का सबब ना कह दूँ
कहीं कुछ ऐसा ना कह जाऊं
मिलन की बेला को
की नाराज हो जाओ तुम
सुनो
मनाना नहीं आता मुझे
पहली बार
प्यार हुआ है ना
बस इसलिए चुप रहता हूँ
और कुछ कहने से पहले ही
चूम लेता हूँ
की शायद मिल जाए
जवाब तुम्हे
मेरी खामोशी से ही
मेरी बोलती आँखों से
तुम समझ जाओ
की क्या है मुझमे
जो तुम्हे चाहता है
और क्या है तुममे
जो बांधे रखता है मुझे
तुम में
तुम उन्मुक्त यौवन
की सूरा सरिता
क्यूँ मै डूबा रहता हूँ
तुम्हारे ही खयालात में
शायद तुम समझ जाओ
शायद समझोगी
इसलिए सब कहता हूँ मै
आँखों से
और होंठों को सी लेता हूँ
तुम्हारे होंठो से
और
चुप हो जाता हूँ
शायद
सारे अरमान निकालकर
सारे अहसास लिखकर
तुम्हारे होंठों पर
मै चुप हो जाता हूँ ..................... ''अजीत त्रिपाठी ''
हर वक़्त इजहार करना
जुबान से
जबकि आँखे
बोलती ही रहती हैं
वो हर बात
जो मै कहना चाहता हूँ
पर कह नहीं पाता
की कहीं
उमंग में कुछ गलत ना कह जाऊं
तुम्हारे आँखों को
सागर कहते कहते
कह ना दू
कहीं मधुशाला
या तुम्हारे होंठो के बोलों को
उनकी छुवन को
कह दूँ प्याला
तुम्हारे गेसुओं को
कह ना दूँ कभी
अपने प्रेम पाश से इतर
एक बंधन खुद का
तुम्हे भाहों में भरने के
मोहक अंदाज को
सिर्फ जिस्मानी ना कह दूँ
तुम्हारे नाज को नखरे को
कहीं कोई बोझ ना कह दूँ
तुम्हारी हंसी
और होंठों के बीच जुड़ते से तिल को
कहीं अपनी बेचारगी का सबब ना कह दूँ
कहीं कुछ ऐसा ना कह जाऊं
मिलन की बेला को
की नाराज हो जाओ तुम
सुनो
मनाना नहीं आता मुझे
पहली बार
प्यार हुआ है ना
बस इसलिए चुप रहता हूँ
और कुछ कहने से पहले ही
चूम लेता हूँ
की शायद मिल जाए
जवाब तुम्हे
मेरी खामोशी से ही
मेरी बोलती आँखों से
तुम समझ जाओ
की क्या है मुझमे
जो तुम्हे चाहता है
और क्या है तुममे
जो बांधे रखता है मुझे
तुम में
तुम उन्मुक्त यौवन
की सूरा सरिता
क्यूँ मै डूबा रहता हूँ
तुम्हारे ही खयालात में
शायद तुम समझ जाओ
शायद समझोगी
इसलिए सब कहता हूँ मै
आँखों से
और होंठों को सी लेता हूँ
तुम्हारे होंठो से
और
चुप हो जाता हूँ
शायद
सारे अरमान निकालकर
सारे अहसास लिखकर
तुम्हारे होंठों पर
मै चुप हो जाता हूँ ..................... ''अजीत त्रिपाठी ''
हमारे बीच
अनगढ़ सी
अनोखी से
सुरमई , सजीली आँखें
जो छुपा ले जाती है
हर भाव
जो जुड़ा हो मुझसे
और कह देती है
ऐसा कुछ नहीं
हमारे बीच
और कहते कहते
चूम लेती है
गाल के एक कोने पर
या काट देती है
कान पर
या बना देती है
एक निशान
अपने नाख़ून से
मेरे सीने पर
अनकहे से ये भाव ही
सम्पूर्णता हो जाते हैं तब
जब लगता है
कुछ मिले सुनने को ,,
और सुनाई देने लगती है
तेज धड़कने
और भड़कती हुई सांस ,,
दिखाई देती हैं
बंद होती बिल्लोरी आँखें
सिमटता हुआ
तुम्हारा जिस्म
गोल घेरे में
मेरी बाहों के
उसी वक़्त
मै समझ जाता हूँ
आज फिर
बड़े नाज़ से
तुम अठखेलियाँ करोगे
मुझ पर
और फिर कह दोगे
उसी अल्हड़ता से ,
सुनो
गलत मत समझना
ऐसा कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,
पर सुनो तुम्हारा वो झूट भी सच होता है
उस वक़्त कुछ नहीं होता
हमारे बीच
ना कोई दीवार
ना कोइ नियम
और हवा भी नहीं
जो अलग कर दे हमें
मिलन के उस
पल से
तुम सच मै
सच कहती हो
कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
अनोखी से
सुरमई , सजीली आँखें
जो छुपा ले जाती है
हर भाव
जो जुड़ा हो मुझसे
और कह देती है
ऐसा कुछ नहीं
हमारे बीच
और कहते कहते
चूम लेती है
गाल के एक कोने पर
या काट देती है
कान पर
या बना देती है
एक निशान
अपने नाख़ून से
मेरे सीने पर
अनकहे से ये भाव ही
सम्पूर्णता हो जाते हैं तब
जब लगता है
कुछ मिले सुनने को ,,
और सुनाई देने लगती है
तेज धड़कने
और भड़कती हुई सांस ,,
दिखाई देती हैं
बंद होती बिल्लोरी आँखें
सिमटता हुआ
तुम्हारा जिस्म
गोल घेरे में
मेरी बाहों के
उसी वक़्त
मै समझ जाता हूँ
आज फिर
बड़े नाज़ से
तुम अठखेलियाँ करोगे
मुझ पर
और फिर कह दोगे
उसी अल्हड़ता से ,
सुनो
गलत मत समझना
ऐसा कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,
पर सुनो तुम्हारा वो झूट भी सच होता है
उस वक़्त कुछ नहीं होता
हमारे बीच
ना कोई दीवार
ना कोइ नियम
और हवा भी नहीं
जो अलग कर दे हमें
मिलन के उस
पल से
तुम सच मै
सच कहती हो
कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
तुम हो
एक द्रण संकल्पित आस मेरी, एक गहरी निराशा भी
ह्रदय की सच्ची वेदना और मेरा तमाशा भी
तुम हो
खुशियाँ भी पीर भी पिपासा भी नीर भी
उंचाई भी गहराई भी
सच भी हो और एक सच्चाई भरमाई भी
तुम हो
इन आँखों में पलता अक्स और इसकी तलाश भी
मुझसे दूर होती जमीन पास आता आकाश भी
तुम हो
सितारों की चमक और उनमे छुपा अँधियारा भी
फूलों की डगर हो काँटों का गलियारा भी
तुम हो
सूरज का तेज भी चाँद की ठंडक भी
बचपन की अल्हड़ता जवानी का मंडप भी
तुम हो
मीठा सा संगीत मेरा दर्द भरी ग़ज़ल भी
दो बाहों का घर मेरा और ताजमहल भी
तुम हो
रास्ता भी मंजिल भी चलना जो चाहे वो दिल भी
सामने नहीं शामिल भी मुमकिन नहीं और हासिल भी
तुम हो
बा-असर भी बे-असर भी बेफिक्र और बा-फिकर भी
मंजिल हो रास्ता भी निश्चय भी अगर मगर भी
शर्माती सी शर्म मेरी खुलती हुयी कुछ बातें भी
अंगडाई सी उठती सुबह भी तन्हाई की रातें भी
संतोष हो तुम साथ हो तुम और डरता हुआ अकेलापन भी
तुम सहारा की प्यास और समंदर सा अपनापन भी
तुम हो
मेरी इबादतों की पवित्रता उनमे छुपा थोडा स्वार्थ भी
कुछ मांग लेना खुदा से कुछ मेरा यथार्थ भी
तुम हो
श्रृंगार सादगी का बेसिंगार अल्हड सुन्दरता भी
मेरे मन का प्यार और उसमे छुपी नीरवता भी
तुम हो
इस दुनिया का आनंद जन्नत की मुलाक़ात भी
सवाल करती खुद में और मेरे सवालात भी
तुम हो
खाली सी फुर्सत मेरी और व्यस्त से लम्हे भी
मेरा साथ मेरे बाद और मुझसे पहले भी
तुम हो
खिलखिलाती सी हंसी मेरी मेरा करुण रुदन भी
तुम मेरी आज़ादी का आगाज पाबन्दी का चलन भी
तुम हो
लड़ता मेरा वजूद मुझसे और मेरी मुझसे सुलह भी
मर जाने की हिम्मत हो और जीने की वजह भी
तुम हो
इस दिल का खालीपन और उसकी सम्पूर्णता भी
मेरे अहसासों का सूनापन और उनकी सम्पन्नता भी
तुम हो
आस मेरी ,प्यास मेरी, जान मेरी ,जहान मेरी
ईमान मेरा ,भगवान् मेरी
तमन्ना और तरुनता भी
तुम चाँद ,तुम दुनिया , मेरे होने की वजह
मेरी सादगी ,दीवानगी, मेरी अल्हड़ता भी
तुम हो
मेरा तन मन धन , मान सम्मान, मेरा दुलार भी
मेरी हंसीखुशी ,मेरी हस्ती ,मेरा हासिल मेरा प्यार भी ,,,,,,,,, , ''अजीत त्रिपाठी''
Friday, November 12, 2010
तुम्हारी याद में
धुन्धलकी यादों से
उनकी परछाइयों से
अभी जागकर देखा है मैंने ,,
आँखे सुर्ख लाल थी मेरी
दिल जार जार कर जल रहा था मेरा
तुम्हारे ना होने से
मादकता तुम्हारे होने की
झलक रही थी अब भी
मेरी आँखों से
तुम्हारे प्रेम की ऊष्मा
भटक रही है
अब भी मेरी आँखों में
टपकते हुए मेरे आंसुओं से
बीते हुए लम्हों में
तुम्हे भरने को अपनी बाहों
के अहसास
अभी भी तडपा जाते हैं मुझको
तो आज सुबह
उठकर ही
मैंने जलाई है
अपने ख्वाबों की चिता
और उसमे रख दिए हैं
तुम्हारी याद के कुछ ख़त
जो जल जाएँ
और कोई आखिरी निशानी भी
याद ना रहे मुझको
जिस से मैं जलता रहूँ
रात भर
तकिये के आगोश में .........
तुम्हारी याद में ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
उनकी परछाइयों से
अभी जागकर देखा है मैंने ,,
आँखे सुर्ख लाल थी मेरी
दिल जार जार कर जल रहा था मेरा
तुम्हारे ना होने से
मादकता तुम्हारे होने की
झलक रही थी अब भी
मेरी आँखों से
तुम्हारे प्रेम की ऊष्मा
भटक रही है
अब भी मेरी आँखों में
टपकते हुए मेरे आंसुओं से
बीते हुए लम्हों में
तुम्हे भरने को अपनी बाहों
के अहसास
अभी भी तडपा जाते हैं मुझको
तो आज सुबह
उठकर ही
मैंने जलाई है
अपने ख्वाबों की चिता
और उसमे रख दिए हैं
तुम्हारी याद के कुछ ख़त
जो जल जाएँ
और कोई आखिरी निशानी भी
याद ना रहे मुझको
जिस से मैं जलता रहूँ
रात भर
तकिये के आगोश में .........
तुम्हारी याद में ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
Monday, October 4, 2010
मौन स्वीकृति
बहुत हुआ
ये प्रणय निवेदन
और ये करुण रुदन
तुम्हारी बेरुखी पर
यूँ मौन रहकर
स्वीकृति का भाव भी
तब दिखे
जब रूह के और पास
आ जाऊं मै
या तुम लग जाओ
छतनार सी
मेरे सीने पर
और आ जाओ
मेरी रूह के करीब
शायद तब दिख जाएँ
भाव अनकहे से
लिपटे हुए
तुम्हारे बालों से
या सिमटते हुए
तुम्हारे अहसासों से
मेरे सीने में
शायद तुम्हारी
बंद होती आँखों से
या शायद
तुम्हारी डबडबाई
भरी आँखों से
कोई मोती गिरे
और कह जाए
की लज्जा है तुम में
तुम मुझ सा
यूँ सर-ऐ-महफ़िल
नहीं पकड़ सकते
हाथ मेरा
तब शायद मै समझ जाऊं
और ढूंड लाऊं
एकांत हमारे लिए
जहाँ तुम
और सिर्फ तुम रहो
नितांत अकेले
और समझ जाओ तुम
की तुम्हारे
मौन के आगे
कितना निरीह
निसहाय
और अकेला हूँ मैं
और कितना जरूरी है
यूँ
एक मौन स्वीकृति के लिए
निश्वास
भाव सहित
स्वीकृति का चिन्ह
जो हो
बिलकुल मौन
और मिले
शायद तुम्हारे बालों से
आँखों से
आलिंगन से
मौन रहकर
मौन कर के मुझे
मेरे प्रणय निवेदन की
मेरे जीवन के लिए
तुम्हारे प्रेम की
तुम्हारे साथ की
मौन स्वीकृति ............ ''अजीत त्रिपाठी''
ये प्रणय निवेदन
और ये करुण रुदन
तुम्हारी बेरुखी पर
यूँ मौन रहकर
स्वीकृति का भाव भी
तब दिखे
जब रूह के और पास
आ जाऊं मै
या तुम लग जाओ
छतनार सी
मेरे सीने पर
और आ जाओ
मेरी रूह के करीब
शायद तब दिख जाएँ
भाव अनकहे से
लिपटे हुए
तुम्हारे बालों से
या सिमटते हुए
तुम्हारे अहसासों से
मेरे सीने में
शायद तुम्हारी
बंद होती आँखों से
या शायद
तुम्हारी डबडबाई
भरी आँखों से
कोई मोती गिरे
और कह जाए
की लज्जा है तुम में
तुम मुझ सा
यूँ सर-ऐ-महफ़िल
नहीं पकड़ सकते
हाथ मेरा
तब शायद मै समझ जाऊं
और ढूंड लाऊं
एकांत हमारे लिए
जहाँ तुम
और सिर्फ तुम रहो
नितांत अकेले
और समझ जाओ तुम
की तुम्हारे
मौन के आगे
कितना निरीह
निसहाय
और अकेला हूँ मैं
और कितना जरूरी है
यूँ
एक मौन स्वीकृति के लिए
निश्वास
भाव सहित
स्वीकृति का चिन्ह
जो हो
बिलकुल मौन
और मिले
शायद तुम्हारे बालों से
आँखों से
आलिंगन से
मौन रहकर
मौन कर के मुझे
मेरे प्रणय निवेदन की
मेरे जीवन के लिए
तुम्हारे प्रेम की
तुम्हारे साथ की
मौन स्वीकृति ............ ''अजीत त्रिपाठी''
Sunday, October 3, 2010
निर्मम निर्वात
बेचैन दिल ,, धड़कन रुकी हुई
एक उलझन , एक कशमकश
खुद को तलाशने की खुद में
तनहा वजूद को यादों में लपेटे
बाँहों से गिरती आरजू की लकीर
और इनसे बनता
स्वयं में स्वयं सा
स्वा निर्मित , सहृदयी
शोक संतप्त जीवन का
जीवन को जीने का तुम्हारे बिना
साँसों के बीच का
निर्मम निर्वात ,,... ''अजीत त्रिपाठी
Saturday, October 2, 2010
मै चुप हो जाता हूँ
क्या जरूरी है
हर वक़्त इजहार करना
जुबान से
जबकि आँखे
बोलती ही रहती हैं
वो हर बात
जो मै कहना चाहता हूँ
पर कह नहीं पाता
की कहीं
उमंग में कुछ गलत ना कह जाऊं
तुम्हारे आँखों को
सागर कहते कहते
कह ना दू
कहीं मधुशाला
या तुम्हारे होंठो के बोलों को
उनकी छुवन को
कह दूँ प्याला
तुम्हारे गेसुओं को
कह ना दूँ कभी
अपने प्रेम पाश से इतर
एक बंधन खुद का
तुम्हे भाहों में भरने के
मोहक अंदाज को
सिर्फ जिस्मानी ना कह दूँ
तुम्हारे नाज को नखरे को
कहीं कोई बोझ ना कह दूँ
तुम्हारी हंसी
और होंठों के बीच जुड़ते से तिल को
कहीं अपनी बेचारगी का सबब ना कह दूँ
कहीं कुछ ऐसा ना कह जाऊं
मिलन की बेला को
की नाराज हो जाओ तुम
सुनो
मनाना नहीं आता मुझे
पहली बार
प्यार हुआ है ना
बस इसलिए चुप रहता हूँ
और कुछ कहने से पहले ही
चूम लेता हूँ
की शायद मिल जाए
जवाब तुम्हे
मेरी खामोशी से ही
मेरी बोलती आँखों से
तुम समझ जाओ
की क्या है मुझमे
जो तुम्हे चाहता है
और क्या है तुममे
जो बांधे रखता है मुझे
तुम में
तुम उन्मुक्त यौवन
की सूरा सरिता
क्यूँ मै डूबा रहता हूँ
तुम्हारे ही खयालात में
शायद तुम समझ जाओ
शायद समझोगी
इसलिए सब कहता हूँ मै
आँखों से
और होंठों को सी लेता हूँ
तुम्हारे होंठो से
और
चुप हो जाता हूँ
शायद
सारे अरमान निकालकर
सारे अहसास लिखकर
तुम्हारे होंठों पर
मै चुप हो जाता हूँ ..................... ''अजीत त्रिपाठी ''
हर वक़्त इजहार करना
जुबान से
जबकि आँखे
बोलती ही रहती हैं
वो हर बात
जो मै कहना चाहता हूँ
पर कह नहीं पाता
की कहीं
उमंग में कुछ गलत ना कह जाऊं
तुम्हारे आँखों को
सागर कहते कहते
कह ना दू
कहीं मधुशाला
या तुम्हारे होंठो के बोलों को
उनकी छुवन को
कह दूँ प्याला
तुम्हारे गेसुओं को
कह ना दूँ कभी
अपने प्रेम पाश से इतर
एक बंधन खुद का
तुम्हे भाहों में भरने के
मोहक अंदाज को
सिर्फ जिस्मानी ना कह दूँ
तुम्हारे नाज को नखरे को
कहीं कोई बोझ ना कह दूँ
तुम्हारी हंसी
और होंठों के बीच जुड़ते से तिल को
कहीं अपनी बेचारगी का सबब ना कह दूँ
कहीं कुछ ऐसा ना कह जाऊं
मिलन की बेला को
की नाराज हो जाओ तुम
सुनो
मनाना नहीं आता मुझे
पहली बार
प्यार हुआ है ना
बस इसलिए चुप रहता हूँ
और कुछ कहने से पहले ही
चूम लेता हूँ
की शायद मिल जाए
जवाब तुम्हे
मेरी खामोशी से ही
मेरी बोलती आँखों से
तुम समझ जाओ
की क्या है मुझमे
जो तुम्हे चाहता है
और क्या है तुममे
जो बांधे रखता है मुझे
तुम में
तुम उन्मुक्त यौवन
की सूरा सरिता
क्यूँ मै डूबा रहता हूँ
तुम्हारे ही खयालात में
शायद तुम समझ जाओ
शायद समझोगी
इसलिए सब कहता हूँ मै
आँखों से
और होंठों को सी लेता हूँ
तुम्हारे होंठो से
और
चुप हो जाता हूँ
शायद
सारे अरमान निकालकर
सारे अहसास लिखकर
तुम्हारे होंठों पर
मै चुप हो जाता हूँ ..................... ''अजीत त्रिपाठी ''
Friday, October 1, 2010
मुझे मनाने आओगे ना
अनजाने से दर्द की प्यास बुझाओगे ना
मेरे सिरहाने मुझे मनाने आओगे ना
एक बाल-सुलभ है दिल मेरा
तुम बिन रिक्त है दिल मेरा
एक प्रेम कुटी बनवाओगे
तुम मुझसे मिलने आओगे ना
मै प्रेम पथिक परवाज रहूँ
तुम सरल सौम्य आगाज़ रहो
तुम सुरा बनो जब यौवन की
तुम मेरे दिल में छाओगे ना
तुम बनना मेरी परम मित्र
तुम मेरा आधा रूप रहो
जब कोमल प्रेम गुलाब बनो
तुम मेरा दिल महकाओगे ना
तुम जीवन दर्शन बन जाना
तुम मेरा जीवन बन जाना
तुम रहना दुर्लभ दुनिया को.. पर
तुम मेरा दिल महकाओगे ना
जब तनहा रहूँगा मै प्रियतम
तुम मुझे गले से लगाओगे ना ,, ''अजीत त्रिपाठी''
मेरे सिरहाने मुझे मनाने आओगे ना
एक बाल-सुलभ है दिल मेरा
तुम बिन रिक्त है दिल मेरा
एक प्रेम कुटी बनवाओगे
तुम मुझसे मिलने आओगे ना
मै प्रेम पथिक परवाज रहूँ
तुम सरल सौम्य आगाज़ रहो
तुम सुरा बनो जब यौवन की
तुम मेरे दिल में छाओगे ना
तुम बनना मेरी परम मित्र
तुम मेरा आधा रूप रहो
जब कोमल प्रेम गुलाब बनो
तुम मेरा दिल महकाओगे ना
तुम जीवन दर्शन बन जाना
तुम मेरा जीवन बन जाना
तुम रहना दुर्लभ दुनिया को.. पर
तुम मेरा दिल महकाओगे ना
जब तनहा रहूँगा मै प्रियतम
तुम मुझे गले से लगाओगे ना ,, ''अजीत त्रिपाठी''
मुझे मनाने आओगे ना
अनजाने से दर्द की प्यास बुझाओगे ना
मेरे सिरहाने मुझे मनाने आओगे ना
एक बाल-सुलभ है दिल मेरा
तुम बिन रिक्त है दिल मेरा
एक प्रेम कुटी बनवाओगे
तुम मुझसे मिलने आओगे ना
मै प्रेम पथिक परवाज रहूँ
तुम सरल सौम्य आगाज़ रहो
तुम सुरा बनो जब यौवन की
तुम मेरे दिल में छाओगे ना
तुम बनना मेरी परम मित्र
तुम मेरा आधा रूप रहो
जब कोमल प्रेम गुलाब बनो
तुम मेरा दिल महकाओगे ना
तुम जीवन दर्शन बन जाना
तुम मेरा जीवन बन जाना
तुम रहना दुर्लभ दुनिया को.. पर
तुम मेरा दिल महकाओगे ना
जब तनहा रहूँगा मै प्रियतम
तुम मुझे गले से लगाओगे ना ,, ''अजीत त्रिपाठी''
मेरे सिरहाने मुझे मनाने आओगे ना
एक बाल-सुलभ है दिल मेरा
तुम बिन रिक्त है दिल मेरा
एक प्रेम कुटी बनवाओगे
तुम मुझसे मिलने आओगे ना
मै प्रेम पथिक परवाज रहूँ
तुम सरल सौम्य आगाज़ रहो
तुम सुरा बनो जब यौवन की
तुम मेरे दिल में छाओगे ना
तुम बनना मेरी परम मित्र
तुम मेरा आधा रूप रहो
जब कोमल प्रेम गुलाब बनो
तुम मेरा दिल महकाओगे ना
तुम जीवन दर्शन बन जाना
तुम मेरा जीवन बन जाना
तुम रहना दुर्लभ दुनिया को.. पर
तुम मेरा दिल महकाओगे ना
जब तनहा रहूँगा मै प्रियतम
तुम मुझे गले से लगाओगे ना ,, ''अजीत त्रिपाठी''
Tuesday, September 28, 2010
हमारे बीच
अनगढ़ सी
अनोखी से
सुरमई , सजीली आँखें
जो छुपा ले जाती है
हर भाव
जो जुड़ा हो मुझसे
और कह देती है
ऐसा कुछ नहीं
हमारे बीच
और कहते कहते
चूम लेती है
गाल के एक कोने पर
या काट देती है
कान पर
या बना देती है
एक निशान
अपने नाख़ून से
मेरे सीने पर
अनकहे से ये भाव ही
सम्पूर्णता हो जाते हैं तब
जब लगता है
कुछ मिले सुनने को ,,
और सुनाई देने लगती है
तेज धड़कने
और भड़कती हुई सांस ,,
दिखाई देती हैं
बंद होती बिल्लोरी आँखें
सिमटता हुआ
तुम्हारा जिस्म
गोल घेरे में
मेरी बाहों के
उसी वक़्त
मै समझ जाता हूँ
आज फिर
बड़े नाज़ से
तुम अठखेलियाँ करोगे
मुझ पर
और फिर कह दोगे
उसी अल्हड़ता से ,
सुनो
गलत मत समझना
ऐसा कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,
पर सुनो
तुम्हारा वो झूट भी सच होता है
उस वक़्त कुछ नहीं होता
हमारे बीच
ना कोई दीवार
ना कोइ नियम
और हवा भी नहीं
जो अलग कर दे हमें
मिलन के उस
पल से
तुम सच मै
सच कहती हो
कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
अनोखी से
सुरमई , सजीली आँखें
जो छुपा ले जाती है
हर भाव
जो जुड़ा हो मुझसे
और कह देती है
ऐसा कुछ नहीं
हमारे बीच
और कहते कहते
चूम लेती है
गाल के एक कोने पर
या काट देती है
कान पर
या बना देती है
एक निशान
अपने नाख़ून से
मेरे सीने पर
अनकहे से ये भाव ही
सम्पूर्णता हो जाते हैं तब
जब लगता है
कुछ मिले सुनने को ,,
और सुनाई देने लगती है
तेज धड़कने
और भड़कती हुई सांस ,,
दिखाई देती हैं
बंद होती बिल्लोरी आँखें
सिमटता हुआ
तुम्हारा जिस्म
गोल घेरे में
मेरी बाहों के
उसी वक़्त
मै समझ जाता हूँ
आज फिर
बड़े नाज़ से
तुम अठखेलियाँ करोगे
मुझ पर
और फिर कह दोगे
उसी अल्हड़ता से ,
सुनो
गलत मत समझना
ऐसा कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,
पर सुनो
तुम्हारा वो झूट भी सच होता है
उस वक़्त कुछ नहीं होता
हमारे बीच
ना कोई दीवार
ना कोइ नियम
और हवा भी नहीं
जो अलग कर दे हमें
मिलन के उस
पल से
तुम सच मै
सच कहती हो
कुछ नहीं है
हमारे बीच ,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
Monday, September 20, 2010
तुम हो
एक द्रण संकल्पित आस मेरी, एक गहरी निराशा भी
ह्रदय की सच्ची वेदना और मेरा तमाशा भी
तुम हो
खुशियाँ भी पीर भी पिपासा भी नीर भी
उंचाई भी गहराई भी
सच भी हो और एक सच्चाई भरमाई भी
तुम हो
इन आँखों में पलता अक्स और इसकी तलाश भी
मुझसे दूर होती जमीन पास आता आकाश भी
तुम हो
सितारों की चमक और उनमे छुपा अँधियारा भी
फूलों की डगर हो काँटों का गलियारा भी
तुम हो
सूरज का तेज भी चाँद की ठंडक भी
बचपन की अल्हड़ता जवानी का मंडप भी
तुम हो
मीठा सा संगीत मेरा दर्द भरी ग़ज़ल भी
दो बाहों का घर मेरा और ताजमहल भी
तुम हो
रास्ता भी मंजिल भी चलना जो चाहे वो दिल भी
सामने नहीं शामिल भी मुमकिन नहीं और हासिल भी
तुम हो
बा-असर भी बे-असर भी बेफिक्र और बा-फिकर भी
मंजिल हो रास्ता भी निश्चय भी अगर मगर भी
शर्माती सी शर्म मेरी खुलती हुयी कुछ बातें भी
अंगडाई सी उठती सुबह भी तन्हाई की रातें भी
संतोष हो तुम साथ हो तुम और डरता हुआ अकेलापन भी
तुम सहारा की प्यास और समंदर सा अपनापन भी
तुम हो
मेरी इबादतों की पवित्रता उनमे छुपा थोडा स्वार्थ भी
कुछ मांग लेना खुदा से कुछ मेरा यथार्थ भी
तुम हो
श्रृंगार सादगी का बेसिंगार अल्हड सुन्दरता भी
मेरे मन का प्यार और उसमे छुपी नीरवता भी
तुम हो
इस दुनिया का आनंद जन्नत की मुलाक़ात भी
सवाल करती खुद में और मेरे सवालात भी
तुम हो
खाली सी फुर्सत मेरी और व्यस्त से लम्हे भी
मेरा साथ मेरे बाद और मुझसे पहले भी
तुम हो
खिलखिलाती सी हंसी मेरी मेरा करुण रुदन भी
तुम मेरी आज़ादी का आगाज पाबन्दी का चलन भी
तुम हो
लड़ता मेरा वजूद मुझसे और मेरी मुझसे सुलह भी
मर जाने की हिम्मत हो और जीने की वजह भी
तुम हो
इस दिल का खालीपन और उसकी सम्पूर्णता भी
मेरे अहसासों का सूनापन और उनकी सम्पन्नता भी
तुम हो
आस मेरी ,प्यास मेरी, जान मेरी ,जहान मेरी
ईमान मेरा ,भगवान् मेरी
तमन्ना और तरुनता भी
तुम चाँद ,तुम दुनिया , मेरे होने की वजह
मेरी सादगी ,दीवानगी, मेरी अल्हड़ता भी
तुम हो
मेरा तन मन धन , मान सम्मान, मेरा दुलार भी
मेरी हंसीखुशी ,मेरी हस्ती ,मेरा हासिल मेरा प्यार भी ,,,,,,,,, , ''अजीत त्रिपाठी''
Thursday, September 16, 2010
कल याद तुम्हारी आई थी
कुछ सहमे सहमे जज्बे थे
कुछ महफ़िल में भी रुतबे थे
कुछ किस्से नए पुराने थे
कुछ ख़ामोशी तन्हाई थी .
कल याद तुम्हारी आई थी ,
कुछ चेहरे में शरमाहट थी
कुछ रिश्तों की गर्माहट थी
कुछ सीने में था जलता हुआ
कुछ रिश्तों की अगुवाई थी ,
कल याद तुम्हारी आई थी ,
कुछ घर भी अपना अपना था
कुछ मीठा सा वो सपना था
कुछ दिल की धड़कन भड़की थी
कुछ अनदेखी पुरवाई थी ,
कल याद तुम्हारी आई थी .
कुछ मीठी मीठी बातें थी
कुछ भीगी भीगी रातें थी
कुछ दिल के अरमा मचले थे
कुछ मौसम ने आग लगाईं थी ,
कल याद तुम्हारी आई थी .
कुछ सर्द भरी रवानी थी
कुछ दर्द भरी जवानी थी
कुछ साँसे उलझी उलझी थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी .
कल याद तुम्हारी आई थी .
कुछ कहना शायद चाह रहे थे
कुछ तुमको अपना मान रहे थे
कुछ रोती रोती दुनिया थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी ,
कल याद तुम्हारी आई थी ,
कुछ तू मेरी , मै तेरा था
कुछ अपना रैन बसेरा था
कुछ बातें सुनी सुनाई थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी
कल याद तुम्हारी आई थी .
कल याद तुम्हारी आई थी ............ ''अजीत त्रिपाठी''
कुछ महफ़िल में भी रुतबे थे
कुछ किस्से नए पुराने थे
कुछ ख़ामोशी तन्हाई थी .
कल याद तुम्हारी आई थी ,
कुछ चेहरे में शरमाहट थी
कुछ रिश्तों की गर्माहट थी
कुछ सीने में था जलता हुआ
कुछ रिश्तों की अगुवाई थी ,
कल याद तुम्हारी आई थी ,
कुछ घर भी अपना अपना था
कुछ मीठा सा वो सपना था
कुछ दिल की धड़कन भड़की थी
कुछ अनदेखी पुरवाई थी ,
कल याद तुम्हारी आई थी .
कुछ मीठी मीठी बातें थी
कुछ भीगी भीगी रातें थी
कुछ दिल के अरमा मचले थे
कुछ मौसम ने आग लगाईं थी ,
कल याद तुम्हारी आई थी .
कुछ सर्द भरी रवानी थी
कुछ दर्द भरी जवानी थी
कुछ साँसे उलझी उलझी थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी .
कल याद तुम्हारी आई थी .
कुछ कहना शायद चाह रहे थे
कुछ तुमको अपना मान रहे थे
कुछ रोती रोती दुनिया थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी ,
कल याद तुम्हारी आई थी ,
कुछ तू मेरी , मै तेरा था
कुछ अपना रैन बसेरा था
कुछ बातें सुनी सुनाई थी
कुछ आँख मेरी भर आई थी
कल याद तुम्हारी आई थी .
कल याद तुम्हारी आई थी ............ ''अजीत त्रिपाठी''
माफ़ करना
जिन्दगी की भागमभाग में
भागता ही रहा
समझ ही नहीं पाया
कभी भी
तुम्हारी उर्वर आँखों की
नीरवता में बसा स्नेह
तुम्हारे कोमल मन का प्यार
तुम्हारे स्पर्श की गर्मी
तुम्हारे अहसासों की नरमी
कभी महसूस ही ना कर पाया
उन फूलों की खुशबू
जो दबे रह गए हैं कहीं
किताबों में वर्क से
कभी जान ही नहीं पाया
ख़ामोशी तुम्हारी
और उन अनकही बातों के
अद्भुत अर्थ को मै
बस चलता ही रहा
चलता ही रहा
और आज जब रुका
तो देखता हूँ
इतना पाकर भी
अकेला हूँ मै
ख़ुशी नहीं ,, गम नहीं
बस मै ही हूँ यहाँ
हम नहीं
आगे बढ़ने की
निर्मम हवस में
पीछे कुछ छूट ही नहीं पाया
जो इस पड़ाव में आकर
कुछ तसल्ली दे
जो रख ले
गोद में सर और कह दे कुछ
बड़े प्यार से
किसी से कोई तकरार नहीं अब
किसी से कोई प्यार नहीं
रह गया है तो
बस एक खालीपन और अकेलापन
स्वनिर्मित ,,
स्वयम के लिए
जीवन को गुजारने का अकेले ही
तुम्हारे दिए उन गुलाबों सा
जो दबे रह गए हैं
तुम्हारे दिल की किताब में
जो कभी पढ़ी ही ,, नहीं मैंने ,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
Monday, September 6, 2010
मेरी सुबह
मेरी सुबह
थोड़ी अलसाई सी
थोड़े नखरों से भरी
थोड़ी शर्म भी है
थोड़ी नादान सी है
मुझसे परेशान सी है
मेरी सुबह
गिरा लेती है
एक लट माथे पर
उसे यकीन है
यही लट है जो
खींच लेती है मुझे
उसकी तरफ
और चूम लेता हूँ मै
उसके चाँद से मुखड़े को ,
मेरी सुबह
रोज कह देती है कुछ
कुछ ऐसा जो सही नहीं
और मै हो जाता हूँ
नाराज उस से
तब वो हंस देती है
और कह देती है
की नाराज होकर ही
ज्यादा पास आ जाता हूँ मै
मेरी सुबह
जरा बौराई सी है
ख़्वाबों की अंगडाई सी है
जीवन धारा है मेरी
जीवन की पुरवाई सी है
मेरी सुबह
मेरी है
मै उसका हूँ
उसके नाज मेरे हैं
उसके नखरे मेरे हैं
मेरा प्यार उसका है
और मेरा गुस्सा
ये तो बस मिथक है
ऐसे ही
कसकर पकड़ लेने का
उसकी बाहों को
और बहाना है
उसे भर लेने का
बाहों में
और कहने का धीरे से
इस बार तो गले लगे है
अगली बार दो पड़ भी जायेंगे
और वो हंस देती है
जानती है
की ये बस बहाना है
उसे गले लगाने का
जाने मुझे कितना समझती है
मेरी सुबह
और सिमट जाती है मुझमे
हर सुबह
मेरी सुबह ,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
थोड़ी अलसाई सी
थोड़े नखरों से भरी
थोड़ी शर्म भी है
थोड़ी नादान सी है
मुझसे परेशान सी है
मेरी सुबह
गिरा लेती है
एक लट माथे पर
उसे यकीन है
यही लट है जो
खींच लेती है मुझे
उसकी तरफ
और चूम लेता हूँ मै
उसके चाँद से मुखड़े को ,
मेरी सुबह
रोज कह देती है कुछ
कुछ ऐसा जो सही नहीं
और मै हो जाता हूँ
नाराज उस से
तब वो हंस देती है
और कह देती है
की नाराज होकर ही
ज्यादा पास आ जाता हूँ मै
मेरी सुबह
जरा बौराई सी है
ख़्वाबों की अंगडाई सी है
जीवन धारा है मेरी
जीवन की पुरवाई सी है
मेरी सुबह
मेरी है
मै उसका हूँ
उसके नाज मेरे हैं
उसके नखरे मेरे हैं
मेरा प्यार उसका है
और मेरा गुस्सा
ये तो बस मिथक है
ऐसे ही
कसकर पकड़ लेने का
उसकी बाहों को
और बहाना है
उसे भर लेने का
बाहों में
और कहने का धीरे से
इस बार तो गले लगे है
अगली बार दो पड़ भी जायेंगे
और वो हंस देती है
जानती है
की ये बस बहाना है
उसे गले लगाने का
जाने मुझे कितना समझती है
मेरी सुबह
और सिमट जाती है मुझमे
हर सुबह
मेरी सुबह ,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
Sunday, September 5, 2010
मुझे भूल जाना तुम
अब के मिलना मुझसे और मुझे भूल जाना तुम
बस हमें याद रखना ,और मुझे भूल जाना तुम
बहुत बरस हुए नहीं रोये हैं खुशियों में हम
छुपा लेना आचल में और मुझे भूल जाना तुम
तुमको पता है नाराज नहीं हूँ तुमसे , मगर सुनो
प्यार से मना लेना चूमकर और मुझे भूल जाना तुम
मै ऐसे ही रह जाता हूँ बिना कहे बहुत कुछ ,तो
मेरी आँखों में पढ़ लेना और मुझे भूल जाना तुम
यकीन हो तो साथ चलो इस सफ़र-ऐ-मोहबत में
हमसफ़र मेरे ही रहना और मुझे भूल जाना तुम
वक़्त बेवक्त का नशा है, ग़ज़ल का लिखना यूँ
खुद को पढना मेरी आँखों में और मुझे भूल जाना तुम
तुमसे खुशियाँ और तुमसे ही दुनिया है मेरी ''अजीत''
समेट लेना मुझे खुद में और मुझे भूल जाना तुम ,,, ''अजीत त्रिपाठी''
बस हमें याद रखना ,और मुझे भूल जाना तुम
बहुत बरस हुए नहीं रोये हैं खुशियों में हम
छुपा लेना आचल में और मुझे भूल जाना तुम
तुमको पता है नाराज नहीं हूँ तुमसे , मगर सुनो
प्यार से मना लेना चूमकर और मुझे भूल जाना तुम
मै ऐसे ही रह जाता हूँ बिना कहे बहुत कुछ ,तो
मेरी आँखों में पढ़ लेना और मुझे भूल जाना तुम
यकीन हो तो साथ चलो इस सफ़र-ऐ-मोहबत में
हमसफ़र मेरे ही रहना और मुझे भूल जाना तुम
वक़्त बेवक्त का नशा है, ग़ज़ल का लिखना यूँ
खुद को पढना मेरी आँखों में और मुझे भूल जाना तुम
तुमसे खुशियाँ और तुमसे ही दुनिया है मेरी ''अजीत''
समेट लेना मुझे खुद में और मुझे भूल जाना तुम ,,, ''अजीत त्रिपाठी''
इसीलिए नहीं लिखता मै
अक्सर बात हो जाती है
की नज़्म नहीं लिखता मै
परन्तु कथा ये है की
मेरी नज्मो की व्यथा ही कुछ और है
मै लिखना चाहता हूँ कुछ
पर सिमट जाता हूँ तुम में आकर
तुम्हारा प्यार
तुम पर ऐतबार
और अब तुम्हारा इन्तजार
स्थाई तत्व हैं
मेरी नज़्म के,
पर इसमें ऐसा कुछ नहीं
जो दूसरों ने
किसी के लिए
महसूस ना किया हो
हर पल कोई ,, कहीं तो जलता है
मेरे जैसे ही ,, कोई तो पलता है
तो मेरी नज़्म भी कहीं
कही सुनी ना हो जाए
इसलिए नहीं लिखता मै,,
और शायद वो हुनर आया ही नहीं मुझमे
तुम थी तो रोज लिख देता था
एक ग़ज़ल तुम पर
पर अब वो भी नहीं लिख पाता
तो अब कोशिश करता हूँ की
एक कविता लिखूं
वो जिसमे तुम्हारा नाम ना हो
पर मुमकिन कहाँ ये भी
बिना तुम्हारे
रूप विहीन , गुण विहीन
सारगर्भित नहीं किसी के प्रेम में
किसी के आलिंगन की शर्म नहीं
किसी के निश्छल प्रेम का मर्म नहीं ,,
तो सुनो ,,
बिन तुम्हारे
मेरी कविता का श्रृंगार कहाँ से होगा
जब तुम ही नहीं रहोगी उसमे
तो किसी को उस से प्यार क्या होगा
बस इसीलिए नहीं लिखता मै ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
की नज़्म नहीं लिखता मै
परन्तु कथा ये है की
मेरी नज्मो की व्यथा ही कुछ और है
मै लिखना चाहता हूँ कुछ
पर सिमट जाता हूँ तुम में आकर
तुम्हारा प्यार
तुम पर ऐतबार
और अब तुम्हारा इन्तजार
स्थाई तत्व हैं
मेरी नज़्म के,
पर इसमें ऐसा कुछ नहीं
जो दूसरों ने
किसी के लिए
महसूस ना किया हो
हर पल कोई ,, कहीं तो जलता है
मेरे जैसे ही ,, कोई तो पलता है
तो मेरी नज़्म भी कहीं
कही सुनी ना हो जाए
इसलिए नहीं लिखता मै,,
और शायद वो हुनर आया ही नहीं मुझमे
तुम थी तो रोज लिख देता था
एक ग़ज़ल तुम पर
पर अब वो भी नहीं लिख पाता
तो अब कोशिश करता हूँ की
एक कविता लिखूं
वो जिसमे तुम्हारा नाम ना हो
पर मुमकिन कहाँ ये भी
बिना तुम्हारे
रूप विहीन , गुण विहीन
सारगर्भित नहीं किसी के प्रेम में
किसी के आलिंगन की शर्म नहीं
किसी के निश्छल प्रेम का मर्म नहीं ,,
तो सुनो ,,
बिन तुम्हारे
मेरी कविता का श्रृंगार कहाँ से होगा
जब तुम ही नहीं रहोगी उसमे
तो किसी को उस से प्यार क्या होगा
बस इसीलिए नहीं लिखता मै ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
आज फिर
आज फिर
कुछ सपने टूटे हैं
कुछ अपने रूठें है
कुछ नमी है आँखों में
कुछ कमी हैं बातों में
आज फिर
रात रोती रही
बात होती रही
कुछ ख्वाब अलग से आये थे
कुछ याद हमें वो आये थे
आज फिर
दिन गुजरता नहीं
सफ़र कटता नहीं
कुछ रंज-ओ-गम हैं सीने में
कुछ मुश्किल सी है जीने में
आज फिर
कोई हिचकी नहीं
किसी की सिसकी नहीं
कुछ दूर दूर से रह गए हम
कुछ मजबूर से रह गए हम
आज फिर
मोहब्बत परेशान सी ही
वफ़ा नादान सी है
कुछ है शायद इस दिल में भी
कुछ तेरा है इस दिल में भी
आज फिर
ऐसे ही गुजर गया सब
जो अपना है पर अपना नहीं
कुछ जो तुम्हे कहना था
कुछ जो तुमसे सुनना था
आज फिर
एक नाकाम सी कोशिश है
तुम्हे याद करने की
की शायद आये तुम्हे
कोई हिचकी
और तुम यकीन करो
वो मेरे कारन है
बस याद किये जा रहा हूँ
की शायद तुम्हे याद आऊं
वैसे ही जैसे याद आता था कभी
वैसे ही
याद आऊं
तुम्हे
आज फिर ,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
किसी के साथ
यूँ भी अजब जिन्दगी में खैरात मिली है
की मोहब्बत में जीने को एक रात मिली है
अजब हाल है की आशिकी खामोश बहुत है
और कहने को दिल की हर बात मिली है
मै मुकम्मल इश्क नहीं , पर्दा हूँ वफाओं का
न रोऊँ न हंसू ये अजब सौगात मिली है
वो मिलती है पर मिल के भी मिलती नहीं
जब भी मिली वो, किसी के साथ मिली है
मै मायूस नहीं ,ग़मज़दा भी नहीं हूँ ''अजीत''
ये बात भी क्या कम की ये रात मिली है ................ ''अजीत त्रिपाठी''
की मोहब्बत में जीने को एक रात मिली है
अजब हाल है की आशिकी खामोश बहुत है
और कहने को दिल की हर बात मिली है
मै मुकम्मल इश्क नहीं , पर्दा हूँ वफाओं का
न रोऊँ न हंसू ये अजब सौगात मिली है
वो मिलती है पर मिल के भी मिलती नहीं
जब भी मिली वो, किसी के साथ मिली है
मै मायूस नहीं ,ग़मज़दा भी नहीं हूँ ''अजीत''
ये बात भी क्या कम की ये रात मिली है ................ ''अजीत त्रिपाठी''
मगर याद नहीं
वो मौशिकी भी थी मगर याद नहीं
वो आशिकी भी थी मगर याद नहीं
वो निशां जिसका छुपा है दिल में
वो जिन्दगी भी थी मगर याद नहीं
वो जिसकी कुर्बतें इनायतें जिसकी
वो बंदगी भी थी मगर याद नहीं
वो जिसका रूठना बदनामी है मेरी
वो शर्मिंदगी भी थी मगर याद नहीं
वो जिसकी राह के कांटे भी चुन लिए
शायद, वो रुकी भी थी मगर याद नहीं
वो जो जान है जीने का सबब ''अजीत''
वो दिलनशीं भी थी मगर याद नहीं '' ''अजीत त्रिपाठी''
वो आशिकी भी थी मगर याद नहीं
वो निशां जिसका छुपा है दिल में
वो जिन्दगी भी थी मगर याद नहीं
वो जिसकी कुर्बतें इनायतें जिसकी
वो बंदगी भी थी मगर याद नहीं
वो जिसका रूठना बदनामी है मेरी
वो शर्मिंदगी भी थी मगर याद नहीं
वो जिसकी राह के कांटे भी चुन लिए
शायद, वो रुकी भी थी मगर याद नहीं
वो जो जान है जीने का सबब ''अजीत''
वो दिलनशीं भी थी मगर याद नहीं '' ''अजीत त्रिपाठी''
आया दिल में
बाद मुद्दतों ये सवाल आया दिल में
क्यूँकर रात तेरा ख्याल आया दिल में
एक उम्र हुए तुझसे बिछड़े हुए हमें , पर
जब आया तू , बेमिसाल आया दिल में
दिन गुजरे महीने भी गुजरते रहे यहाँ
पर याद तू हर साल आया दिल में
बरसों बिन साँसों के सांस लेते रहे हैं
जो तू आया, एक उछाल आया दिल में
थी तमन्ना तेरी दीद को ना जाने कबसे
''अजीत'' आज ये बड़ा कमाल आया दिल में ... ''अजीत त्रिपाठी''
क्यूँकर रात तेरा ख्याल आया दिल में
एक उम्र हुए तुझसे बिछड़े हुए हमें , पर
जब आया तू , बेमिसाल आया दिल में
दिन गुजरे महीने भी गुजरते रहे यहाँ
पर याद तू हर साल आया दिल में
बरसों बिन साँसों के सांस लेते रहे हैं
जो तू आया, एक उछाल आया दिल में
थी तमन्ना तेरी दीद को ना जाने कबसे
''अजीत'' आज ये बड़ा कमाल आया दिल में ... ''अजीत त्रिपाठी''
सवर गया होगा
चांदनी रात में वो और सवर गया होगा
प्यार है दिल में धीरे से उतर गया होगा
मधुर मोहक है सम्मोहक इस कदर
छा गया होगा जिधर गया होगा
वो जिसके नूर से रोशन है जहाँ
आज चाँद पर वो भ्रमर गया होगा
वो जिसके दीद से सवरती है जिन्दगी
आज आईने में देख खुद तर गया होगा
वो शमा है जो दिल की धड़कन है
जला जो परवाना आज मर गया होगा
कोई कहाँ है तुझसा महफ़िल में यहाँ
मेरा , मै , जाने किधर गया होगा
न उदास हो महफ़िल तुझसे ही रहेंगी
ग़ज़लें''अजीत' तेरे नाम कर गया होगा ..''अजीत त्रिपाठी''
प्यार है दिल में धीरे से उतर गया होगा
मधुर मोहक है सम्मोहक इस कदर
छा गया होगा जिधर गया होगा
वो जिसके नूर से रोशन है जहाँ
आज चाँद पर वो भ्रमर गया होगा
वो जिसके दीद से सवरती है जिन्दगी
आज आईने में देख खुद तर गया होगा
वो शमा है जो दिल की धड़कन है
जला जो परवाना आज मर गया होगा
कोई कहाँ है तुझसा महफ़िल में यहाँ
मेरा , मै , जाने किधर गया होगा
न उदास हो महफ़िल तुझसे ही रहेंगी
ग़ज़लें''अजीत' तेरे नाम कर गया होगा ..''अजीत त्रिपाठी''
हौसले ईजाद हों
कब तलक यूँ याद और ,,कब तलक फ़रियाद हों
तुम नहीं हो पास तो , क्यूँ सनम बरबाद हों
क्यूँ गिरफ्तें यूँ मोहब्बत ,, की हमें हासिल रहें
अब जरा हम सांस लें की ,, फैसले आज़ाद हों
बेईमानी आशिकी और ,, बेवजह ज़ज्बात ये
हम रहे ना तुम रहे , क्यूँ यूँ ही नाशाद हों
हम गरीबों के हवाले , कब कहाँ एक नूर है
फिर नसीबों में यूँ ही , कुछ हौसले ईजाद हों
बात मानो या ना मानो 'अजीत' मोहब्बत क्या करना
और भी मसले बहुत ,, क्यूँ ऐसे ही बरबाद हों ......... ''अजीत त्रिपाठी''
तुम नहीं हो पास तो , क्यूँ सनम बरबाद हों
क्यूँ गिरफ्तें यूँ मोहब्बत ,, की हमें हासिल रहें
अब जरा हम सांस लें की ,, फैसले आज़ाद हों
बेईमानी आशिकी और ,, बेवजह ज़ज्बात ये
हम रहे ना तुम रहे , क्यूँ यूँ ही नाशाद हों
हम गरीबों के हवाले , कब कहाँ एक नूर है
फिर नसीबों में यूँ ही , कुछ हौसले ईजाद हों
बात मानो या ना मानो 'अजीत' मोहब्बत क्या करना
और भी मसले बहुत ,, क्यूँ ऐसे ही बरबाद हों ......... ''अजीत त्रिपाठी''
कैसे आज सुनाऊं रब
अफसाना एक दर्द का है तुझे कैसे आज सुनाऊं रब
दर्द भरे इन गीतों से तुझे कैसे आज भुलाऊं रब
फूलों की खुशबू भी है और थोड़ी सी ख़ामोशी भी
चाक जिगर के टुकड़ों से तुझे कैसे आज सजाऊं रब
रंज बहुत हैं अरमां के और दिल भी जलता रहता है
खाक नशीं होकर अब मै तुझे कैसे आज बुलाऊं रब
कुछ ना मिला मुझे तुझसे भी तेरी दुनिया भी मेरी नहीं
क्यूँ सजदे करूँ, आयतें पढूं तुझे कैसे आज निभाऊं रब
मेरी किस्मत मेरी नहीं और मेरा मुझमे कुछ भी नहीं
मेरा दुःख साथी है मेरा ,तुझे कैसे आज बताऊँ रब
देना हो अगर तो गम दे दे यूँ खुशियाँ और ना देना अब
एक और नजर दे दे मुझको ,तुझे कैसे आज दिखाऊं रब ,, ''अजीत त्रिपाठी''
दर्द भरे इन गीतों से तुझे कैसे आज भुलाऊं रब
फूलों की खुशबू भी है और थोड़ी सी ख़ामोशी भी
चाक जिगर के टुकड़ों से तुझे कैसे आज सजाऊं रब
रंज बहुत हैं अरमां के और दिल भी जलता रहता है
खाक नशीं होकर अब मै तुझे कैसे आज बुलाऊं रब
कुछ ना मिला मुझे तुझसे भी तेरी दुनिया भी मेरी नहीं
क्यूँ सजदे करूँ, आयतें पढूं तुझे कैसे आज निभाऊं रब
मेरी किस्मत मेरी नहीं और मेरा मुझमे कुछ भी नहीं
मेरा दुःख साथी है मेरा ,तुझे कैसे आज बताऊँ रब
देना हो अगर तो गम दे दे यूँ खुशियाँ और ना देना अब
एक और नजर दे दे मुझको ,तुझे कैसे आज दिखाऊं रब ,, ''अजीत त्रिपाठी''
शायद
[blue]शायद
कुछ कह देती हो तन्हाई
या हंस पड़ते हो कभी
कुछ याद करके
शायद
आँखें भर आती हों
धड़कने बढ़ जाती हों
मेरी बात करके
शायद
याद करती हो मुझे
और गिर जाती हो एक लट
कोई फ़रियाद करके
शायद
कोई सुना देता हो
मेरी कोई ग़ज़ल
तुम्हारे नाम करके
शायद
शायद ऐसा होता हो
मै तो बस सोच सकता हूँ
रो सकता हूँ
तुम्हे याद करके
या लिख सकता हूँ
कोई ग़ज़ल
कोई नज़्म
तुम्हारे नाज पे ,, तुम्हारे नखरे पे
या शायद कह दूँ
अँधेरी रातों में
एक ठंडा सा झोंका हवा का तुम्हे
जो खो गया है
सुबह होते ही
शायद कोई बता दे तुम्हे
की
कितनी शिद्दत से
तुम्हे याद करता हूँ मै
शायद कोई बता दे तुम्हे
की
दिल धडकता है
अब भी तुम्हारे लिए
और जाग जाएँ
तुम्हारे भी जज्बात
मेरे लिए
पहले जैसे ही
शायद ऐसा हो ,,,,
शायद,,, ''अजीत त्रिपाठी'' [blue]
कुछ कह देती हो तन्हाई
या हंस पड़ते हो कभी
कुछ याद करके
शायद
आँखें भर आती हों
धड़कने बढ़ जाती हों
मेरी बात करके
शायद
याद करती हो मुझे
और गिर जाती हो एक लट
कोई फ़रियाद करके
शायद
कोई सुना देता हो
मेरी कोई ग़ज़ल
तुम्हारे नाम करके
शायद
शायद ऐसा होता हो
मै तो बस सोच सकता हूँ
रो सकता हूँ
तुम्हे याद करके
या लिख सकता हूँ
कोई ग़ज़ल
कोई नज़्म
तुम्हारे नाज पे ,, तुम्हारे नखरे पे
या शायद कह दूँ
अँधेरी रातों में
एक ठंडा सा झोंका हवा का तुम्हे
जो खो गया है
सुबह होते ही
शायद कोई बता दे तुम्हे
की
कितनी शिद्दत से
तुम्हे याद करता हूँ मै
शायद कोई बता दे तुम्हे
की
दिल धडकता है
अब भी तुम्हारे लिए
और जाग जाएँ
तुम्हारे भी जज्बात
मेरे लिए
पहले जैसे ही
शायद ऐसा हो ,,,,
शायद,,, ''अजीत त्रिपाठी'' [blue]
Thursday, April 29, 2010
तेरा क्या हूँ मैं
[red]
आँखें नम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
एक सितम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
मै दूर हूँ तुझसे यकीन कर अभी इसका
एक भरम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
मै नासूर हूँ तेरा तू ख़ुशी समझती है
इस वहम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
मै खेल हूँ जिसने खेला है तेरे दिल से
इस करम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
कोई पूछे मेरा नाम तो रो देना तुम
आखिर ग़म के सिवा तेरा क्या हूँ मैं ,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''' [red]
आँखें नम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
एक सितम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
मै दूर हूँ तुझसे यकीन कर अभी इसका
एक भरम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
मै नासूर हूँ तेरा तू ख़ुशी समझती है
इस वहम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
मै खेल हूँ जिसने खेला है तेरे दिल से
इस करम के सिवा तेरा क्या हूँ मैं
कोई पूछे मेरा नाम तो रो देना तुम
आखिर ग़म के सिवा तेरा क्या हूँ मैं ,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''' [red]
Wednesday, April 14, 2010
YE MAKAAN HAI MERA GHAR NAHI
EANT PATHTHAR ME MERA AB GUJAR NAHI
KYUNKI YE MAKAAN HAI MERA GHAR NAHI
AKSAR RUK JAATE HAIN KADAM
DEKHKAR KISI KO GHAR SE NIKALATE
MAAN MANUHAAR SE KOI BHEJTA HAI
SATH DUA KE SATH KI SHAM GHAR JALDI AANA..
PAR APNI TO KISI KO FIKAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAKAAN HAI GHAR NAHI
KOI GALE SE LIPTATA HAI TO KOI
CHHOR DETA HAI HONTHON PE HONTHO KE NISHA
KABHI NAJUK UNGLIYAN GHOOM JATI HAIN
SEENE SE DIL KE AAR PAAR
PAR MERI TO MUJHE HI KADAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAAKAN HAI GHAR NAHI
AB AKSAR SOCHTA HUN
TUM RAH JATI TO
MERI SHUBAH BHI ITHLAATI
MERI SHAAM BHI SHARMAATI
SHUBAH GHAR SE NIKALATA MAI
AUR SHAM JALDI LAUTNE KI WAJAH HOTI
BAHON ME TUMHARI TAPAN HOTI
SANSO ME TUMHARI DHADKAN HOTI
PAR TUM MILE HI NAHI
IS MAAN MANUHAAR KO
MAI TARASATA HI RAH GAYA
PAHLE TUMHARE AB APNE PYAAR KO
TUMHARA JAANA MUJHE TANHA KAR GAYA
MAI KHUD KA NAHI RAHA
KISI AUR KAA BHI NAHI BAN PAYA
KYUN AAKHIR , KIS BAAT KI KAMEE THI
SAB TO THA
AUR AB BHI HAI
SIRF TUM NAHI HO
TUMHE PATA HAI
TUM MUJHSE DOOR NAHI HO
BAHUT DOOR HO
JAHAN MERI ROOH BHI NAA PAHUNCH SAKE
IN EANT PATHTHRON ME RAHTE TO AB
MERE JAZBAATON ME BHI KOI ASAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAAKAN HAI GHAR NAHI
GHAR NAHI,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''AJIT TRIPATHI''
KYUNKI YE MAKAAN HAI MERA GHAR NAHI
AKSAR RUK JAATE HAIN KADAM
DEKHKAR KISI KO GHAR SE NIKALATE
MAAN MANUHAAR SE KOI BHEJTA HAI
SATH DUA KE SATH KI SHAM GHAR JALDI AANA..
PAR APNI TO KISI KO FIKAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAKAAN HAI GHAR NAHI
KOI GALE SE LIPTATA HAI TO KOI
CHHOR DETA HAI HONTHON PE HONTHO KE NISHA
KABHI NAJUK UNGLIYAN GHOOM JATI HAIN
SEENE SE DIL KE AAR PAAR
PAR MERI TO MUJHE HI KADAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAAKAN HAI GHAR NAHI
AB AKSAR SOCHTA HUN
TUM RAH JATI TO
MERI SHUBAH BHI ITHLAATI
MERI SHAAM BHI SHARMAATI
SHUBAH GHAR SE NIKALATA MAI
AUR SHAM JALDI LAUTNE KI WAJAH HOTI
BAHON ME TUMHARI TAPAN HOTI
SANSO ME TUMHARI DHADKAN HOTI
PAR TUM MILE HI NAHI
IS MAAN MANUHAAR KO
MAI TARASATA HI RAH GAYA
PAHLE TUMHARE AB APNE PYAAR KO
TUMHARA JAANA MUJHE TANHA KAR GAYA
MAI KHUD KA NAHI RAHA
KISI AUR KAA BHI NAHI BAN PAYA
KYUN AAKHIR , KIS BAAT KI KAMEE THI
SAB TO THA
AUR AB BHI HAI
SIRF TUM NAHI HO
TUMHE PATA HAI
TUM MUJHSE DOOR NAHI HO
BAHUT DOOR HO
JAHAN MERI ROOH BHI NAA PAHUNCH SAKE
IN EANT PATHTHRON ME RAHTE TO AB
MERE JAZBAATON ME BHI KOI ASAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAAKAN HAI GHAR NAHI
GHAR NAHI,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''AJIT TRIPATHI''
अश्क बस बहेंगे ''अजीत'' हंसेगा
अब के बिछड़े तो फिर मिलेंगे नहीं
ये जख्म दिल के फिर सिलेंगे नहीं
सूखा रह जायेगा ये गुलिश्तां सारा
फूल खुशियों के फिर खिलेंगे नहीं
हमको याद रहेगी मुहब्बत अपनी
बस धड़कन ये फिर हिलेगी नहीं
तुम हो तो ऐतबार है हमें खुदका
तुम्हारे बिना मुहब्बत फिर करेंगे नहीं
अश्क बस बहेंगे ''अजीत'' हंसेगा
जिन्दगी में निन्दगी फिर मिलेंगी नहीं ,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
ये जख्म दिल के फिर सिलेंगे नहीं
सूखा रह जायेगा ये गुलिश्तां सारा
फूल खुशियों के फिर खिलेंगे नहीं
हमको याद रहेगी मुहब्बत अपनी
बस धड़कन ये फिर हिलेगी नहीं
तुम हो तो ऐतबार है हमें खुदका
तुम्हारे बिना मुहब्बत फिर करेंगे नहीं
अश्क बस बहेंगे ''अजीत'' हंसेगा
जिन्दगी में निन्दगी फिर मिलेंगी नहीं ,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
कविता की तरह
कविता की तलाश में
हर शुबह उठता हूँ मै
एक कविता जिसमे तुम हो
जो सिर्फ तुम्हारी हो
तुम्हारे चलने से लेकर
तुम्हारे रुकने तक
सब कुछ कविता मय हो
कविता के आधार से लेकर भाव तक
बस तुम्हारी बात हो
और रहो तुम मेरी कविता बनकर
मेरे तकिये की नीचे पन्नो पर
या रहो कविता बनकर
लिपटी ,, छतनार सी
मेरे सीने पर
पर सुनो अगर ना बन सको मेरी तो
उसकी ही बनना
जो तुम्हारी आँख को संदल कहे
जो तुम्हारी जुल्फ को दुनिया कहे
जो तुम्हारी अंगड़ाई को ताज कहे
जो तुम्हारी बाहों को
दुनिया का आगाज़ कहे
सुनो तुम रहो किसी की भी
पर कविता बनकर ही रहना
कविता होना तुम्हारा दायित्व है
चाहे मेरे सफल प्रेम के वर्णन से
या मेरे किंचित भाग्य की कल्पना से
बस तुम्हे कविता ही होना है
ताकि दुनिया जानती रहे
की ''अजीत'' की भी एक कविता है
चाहे लिखी हुई हो मेरी
या तस्वीर में दिखे
मेरी बाँहों में
सिमटी हुई,,
कविता की तरह ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
हर शुबह उठता हूँ मै
एक कविता जिसमे तुम हो
जो सिर्फ तुम्हारी हो
तुम्हारे चलने से लेकर
तुम्हारे रुकने तक
सब कुछ कविता मय हो
कविता के आधार से लेकर भाव तक
बस तुम्हारी बात हो
और रहो तुम मेरी कविता बनकर
मेरे तकिये की नीचे पन्नो पर
या रहो कविता बनकर
लिपटी ,, छतनार सी
मेरे सीने पर
पर सुनो अगर ना बन सको मेरी तो
उसकी ही बनना
जो तुम्हारी आँख को संदल कहे
जो तुम्हारी जुल्फ को दुनिया कहे
जो तुम्हारी अंगड़ाई को ताज कहे
जो तुम्हारी बाहों को
दुनिया का आगाज़ कहे
सुनो तुम रहो किसी की भी
पर कविता बनकर ही रहना
कविता होना तुम्हारा दायित्व है
चाहे मेरे सफल प्रेम के वर्णन से
या मेरे किंचित भाग्य की कल्पना से
बस तुम्हे कविता ही होना है
ताकि दुनिया जानती रहे
की ''अजीत'' की भी एक कविता है
चाहे लिखी हुई हो मेरी
या तस्वीर में दिखे
मेरी बाँहों में
सिमटी हुई,,
कविता की तरह ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
**PAGALPAN,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
pahle hi batana chahunga ki ye ek FRENCH kavita se prerit hai
us kavita ki poori jaankari nahi rah gai hai ab
par kuchh dhundhlaka to rah hi jata hai,,,,,,,,,,, aasha hai aapko pasand aaye,,
********************************************
KYUN
AAKHIR KYUN KAHTI HO
NAA LIKHUN TUM PAR
TUM HI BATAO NA
AAGAR MAI NAA LIKHUN TO DUNIYA KO
PATA KAISE CHALEGA
KI KITNA ADBHUT THA
MERE LIYE
TUMHARA SAUNDRYA
AUR KITNA AAWARA THA
TUMHARE PRATI
MERE DIL AUR JAHAAN KA
**PAGALPAN,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, '' AJIT TRIPATHI & UNKNOWN ''
us kavita ki poori jaankari nahi rah gai hai ab
par kuchh dhundhlaka to rah hi jata hai,,,,,,,,,,, aasha hai aapko pasand aaye,,
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KYUN
AAKHIR KYUN KAHTI HO
NAA LIKHUN TUM PAR
TUM HI BATAO NA
AAGAR MAI NAA LIKHUN TO DUNIYA KO
PATA KAISE CHALEGA
KI KITNA ADBHUT THA
MERE LIYE
TUMHARA SAUNDRYA
AUR KITNA AAWARA THA
TUMHARE PRATI
MERE DIL AUR JAHAAN KA
**PAGALPAN,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Friday, April 9, 2010
मयकदे से आया हूँ अभी
मै लौटकर मयकदे से आया हूँ अभी
तोड़कर पीने के कायदे आया हूँ अभी
तेरी याद आ गई थी पीने से पहले मुझे
छोड़कर पीने के फायदे ,आया हूँ अभी
कह दिया था सकी से आज की रात उसका हूँ
मोड़कर मुह अपने वायदे से आया हूँ अभी
लोग कहते रहे ये दवा है दर्द-ऐ-दिल की
तो तेरे नाम की भी राय दे आया हूँ अभी
''अजीत'' सुकून है की आज रंगीन होगी रात
ग़मों को अपने, अपनी हाय दे आया हूँ अभी ,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
मयकदे से आया हूँ अभी
मै लौटकर मयकदे से आया हूँ अभी
तोड़कर पीने के कायदे आया हूँ अभी
तेरी याद आ गई थी पीने से पहले मुझे
छोड़कर पीने के फायदे ,आया हूँ अभी
कह दिया था सकी से आज की रात उसका हूँ
मोड़कर मुह अपने वायदे से आया हूँ अभी
लोग कहते रहे ये दवा है दर्द-ऐ-दिल की
तो तेरे नाम की भी राय दे आया हूँ अभी
''अजीत'' सुकून है की आज रंगीन होगी रात
ग़मों को अपने, अपनी हाय दे आया हूँ अभी ,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी ''
Wednesday, April 7, 2010
YE MAKAAN HAI MERA GHAR NAHI
EANT PATHTHAR ME MERA AB GUJAR NAHI
KYUNKI YE MAKAAN HAI MERA GHAR NAHI
AKSAR RUK JAATE HAIN KADAM
DEKHKAR KISI KO GHAR SE NIKALATE
MAAN MANUHAAR SE KOI BHEJTA HAI
SATH DUA KE SATH KI SHAM GHAR JALDI AANA..
PAR APNI TO KISI KO FIKAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAKAAN HAI GHAR NAHI
KOI GALE SE LIPTATA HAI TO KOI
CHHOR DETA HAI HONTHON PE HONTHO KE NISHA
KABHI NAJUK UNGLIYAN GHOOM JATI HAIN
SEENE SE DIL KE AAR PAAR
PAR MERI TO MUJHE HI KADAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAAKAN HAI GHAR NAHI
AB AKSAR SOCHTA HUN
TUM RAH JATI TO
MERI SHUBAH BHI ITHLAATI
MERI SHAAM BHI SHARMAATI
SHUBAH GHAR SE NIKALATA MAI
AUR SHAM JALDI LAUTNE KI WAJAH HOTI
BAHON ME TUMHARI TAPAN HOTI
SANSO ME TUMHARI DHADKAN HOTI
PAR TUM MILE HI NAHI
IS MAAN MANUHAAR KO
MAI TARASATA HI RAH GAYA
PAHLE TUMHARE AB APNE PYAAR KO
TUMHARA JAANA MUJHE TANHA KAR GAYA
MAI KHUD KA NAHI RAHA
KISI AUR KAA BHI NAHI BAN PAYA
KYUN AAKHIR , KIS BAAT KI KAMEE THI
SAB TO THA
AUR AB BHI HAI
SIRF TUM NAHI HO
TUMHE PATA HAI
TUM MUJHSE DOOR NAHI HO
BAHUT DOOR HO
JAHAN MERI ROOH BHI NAA PAHUNCH SAKE
IN EANT PATHTHRON ME RAHTE TO AB
MERE JAZBAATON ME BHI KOI ASAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAAKAN HAI GHAR NAHI
GHAR NAHI,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''AJIT TRIPATHI''
KYUNKI YE MAKAAN HAI MERA GHAR NAHI
AKSAR RUK JAATE HAIN KADAM
DEKHKAR KISI KO GHAR SE NIKALATE
MAAN MANUHAAR SE KOI BHEJTA HAI
SATH DUA KE SATH KI SHAM GHAR JALDI AANA..
PAR APNI TO KISI KO FIKAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAKAAN HAI GHAR NAHI
KOI GALE SE LIPTATA HAI TO KOI
CHHOR DETA HAI HONTHON PE HONTHO KE NISHA
KABHI NAJUK UNGLIYAN GHOOM JATI HAIN
SEENE SE DIL KE AAR PAAR
PAR MERI TO MUJHE HI KADAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAAKAN HAI GHAR NAHI
AB AKSAR SOCHTA HUN
TUM RAH JATI TO
MERI SHUBAH BHI ITHLAATI
MERI SHAAM BHI SHARMAATI
SHUBAH GHAR SE NIKALATA MAI
AUR SHAM JALDI LAUTNE KI WAJAH HOTI
BAHON ME TUMHARI TAPAN HOTI
SANSO ME TUMHARI DHADKAN HOTI
PAR TUM MILE HI NAHI
IS MAAN MANUHAAR KO
MAI TARASATA HI RAH GAYA
PAHLE TUMHARE AB APNE PYAAR KO
TUMHARA JAANA MUJHE TANHA KAR GAYA
MAI KHUD KA NAHI RAHA
KISI AUR KAA BHI NAHI BAN PAYA
KYUN AAKHIR , KIS BAAT KI KAMEE THI
SAB TO THA
AUR AB BHI HAI
SIRF TUM NAHI HO
TUMHE PATA HAI
TUM MUJHSE DOOR NAHI HO
BAHUT DOOR HO
JAHAN MERI ROOH BHI NAA PAHUNCH SAKE
IN EANT PATHTHRON ME RAHTE TO AB
MERE JAZBAATON ME BHI KOI ASAR NAHI
KYUNKI MERE PAAS MAAKAN HAI GHAR NAHI
GHAR NAHI,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''AJIT TRIPATHI''
कविता की तरह
हर शुबह उठता हूँ मै
एक कविता जिसमे तुम हो
जो सिर्फ तुम्हारी हो
तुम्हारे चलने से लेकर
तुम्हारे रुकने तक
सब कुछ कविता मय हो
कविता के आधार से लेकर भाव तक
बस तुम्हारी बात हो
और रहो तुम मेरी कविता बनकर
मेरे तकिये की नीचे पन्नो पर
या रहो कविता बनकर
लिपटी ,, छतनार सी
मेरे सीने पर
पर सुनो अगर ना बन सको मेरी तो
उसकी ही बनना
जो तुम्हारी आँख को संदल कहे
जो तुम्हारी जुल्फ को दुनिया कहे
जो तुम्हारी अंगड़ाई को ताज कहे
जो तुम्हारी बाहों को
दुनिया का आगाज़ कहे
सुनो तुम रहो किसी की भी
पर कविता बनकर ही रहना
कविता होना तुम्हारा दायित्व है
चाहे मेरे सफल प्रेम के वर्णन से
या मेरे किंचित भाग्य की कल्पना से
बस तुम्हे कविता ही होना है
ताकि दुनिया जानती रहे
की ''अजीत'' की भी एक कविता है
चाहे लिखी हुई हो मेरी
या तस्वीर में दिखे
मेरी बाँहों में
सिमटी हुई,,
कविता की तरह ,,,,,,,,,,,,,,,,,,, ''अजीत त्रिपाठी''
WITH LOVE
MAY
OUR LOVE BLOOMS
WITH BRINGING
AN AREA OF PLEASANT SURPRISES
FROM THE MOMENT
I LOVED U
I WANTED TO SHARE
MY LIFE WITH U
&
FROM THAT MOMENT
TO THIS ONE
&
FOR ALL THE MOMENTS TO COME
IN
MY LIFE
I WILL LOVE U
WITH ALL MY HEARTS
AGAIN I LOVE U
LOVE U JAAN
OUR LOVE BLOOMS
WITH BRINGING
AN AREA OF PLEASANT SURPRISES
FROM THE MOMENT
I LOVED U
I WANTED TO SHARE
MY LIFE WITH U
&
FROM THAT MOMENT
TO THIS ONE
&
FOR ALL THE MOMENTS TO COME
IN
MY LIFE
I WILL LOVE U
WITH ALL MY HEARTS
AGAIN I LOVE U
LOVE U JAAN
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